अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच कर्जदारों की ईएमआई बढ़ने की संभावना नजर आ रही है। वित्तीय विश्लेषकों और बैंकिंग क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक आगामी अक्टूबर की बैठक में रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी का फैसला ले सकता है। 16 अर्थशास्त्रियों और वरिष्ठ बैंक अधिकारियों के एक ताजा सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि यदि मौद्रिक नीति समिति ब्याज दरों में यह वृद्धि करती है, तो यह देश की ब्याज दर व्यवस्था में एक बड़े नीतिगत मोड़ का स्पष्ट संकेत होगा।
रेपो दर का पिछला रिकॉर्ड और मौजूदा स्थिति
केंद्रीय बैंक की दरों के पिछले इतिहास पर नजर डालें तो रेपो दर में आखिरी बार कटौती दिसंबर 2025 में दर्ज की गई थी। उस कटौती के बाद से ही नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत के स्तर पर स्थिर बनी हुई है। वहीं अगर पिछली बढ़ोतरी की बात करें, तो वह फरवरी 2023 में की गई थी, जब नीतिगत दर को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत तक पहुंचाया गया था। इसके बाद पूरे वित्तीय वर्ष 2023-24 में केंद्रीय बैंक ने दरों में कोई फेरबदल नहीं किया और यथास्थिति बनाए रखी। इसके पश्चात 2025 में जाकर दरों में कटौती का सिलसिला शुरू हुआ था, जिसके चलते वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक की रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर टिकी हुई है।
पश्चिम एशिया संकट और जिंसों की कीमतों का दबाव
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की मुख्य आर्थिक सलाहकार कनिका पसरीचा के अनुसार, वैश्विक स्तर पर विभिन्न केंद्रीय बैंकों द्वारा नीतिगत दरों में की जा रही वृद्धि, मुद्रास्फीति के बढ़ते जोखिम और आर्थिक वृद्धि की मजबूत रफ्तार नीति-निर्माताओं को दरें बढ़ाने का ठोस आधार प्रदान करती हैं।
इसी तरह की राय क्रिसिल की मुख्य अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे ने भी व्यक्त की है। उनका कहना है कि पिछली मौद्रिक समीक्षा के बाद से हालात तेजी से बदले हैं। मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में संघर्ष फिर से भड़कने, ऊर्जा संकट और जिंसों के दामों में आई तेजी ने महंगाई के दबाव को काफी तेज कर दिया है। यदि यह भू-राजनीतिक और मूल्य दबाव आगे भी बना रहता है, तो आगामी दिनों में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
मांग जनित मुद्रास्फीति पर मतभेद
हालांकि वित्तीय जगत के सभी विशेषज्ञ दर वृद्धि को लेकर पूरी तरह एकमत नहीं हैं। लार्सन एंड टुब्रो के समूह मुख्य अर्थशास्त्री सच्चिदानंद शुक्ला का विश्लेषण इससे अलग रुख दिखाता है। उनका मानना है कि केंद्रीय बैंक इस बार भी रेपो दर को 5.25 प्रतिशत के मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखने का विकल्प चुन सकता है। उन्होंने इसके पीछे यह तर्क दिया है कि घरेलू अर्थव्यवस्था में फिलहाल मांग-आधारित महंगाई का कोई पुख्ता प्रमाण सामने नहीं आया है, इसलिए नीतिगत दरों में इजाफा करने से पहले केंद्रीय बैंक कुछ समय के लिए इंतजार कर सकता है।
वित्त वर्ष 2026-27 में कई बार दर वृद्धि की संभावना
बाजार के अधिकांश विश्लेषकों का व्यापक अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान रेपो दर में कम से कम 2 बार की वृद्धि की जा सकती है। कई विश्लेषक तो पूरे वित्तीय वर्ष में कुल मिलाकर 2 से 3 बार तक ब्याज दरें बढ़ने की संभावना देख रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्य मुद्रास्फीति में लगातार हो रही बढ़ोतरी को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीति के रुख को धीरे-धीरे सामान्य स्तर पर लाना आवश्यक हो सकता है।
कच्चे तेल का 100 डॉलर पार जाना और ईंधन की कीमतें
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, खाद्य वस्तुओं में महंगाई का जोखिम और चौतरफा लागत दबाव केंद्रीय बैंक के अनुमानों को बदलने पर मजबूर कर सकते हैं। जानकारों का अनुमान है कि भारतीय रिजर्व बैंक वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने खुदरा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति अनुमान में संशोधन करते हुए इसे बढ़ा सकता है।
इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, ''हाल ही में कच्चे तेल के भाव 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर जाने से पेट्रोल और डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे मुद्रास्फीति का दबाव और गहराएगा। इस स्थिति के चलते खुदरा महंगाई के अनुमानों में ऊपर की ओर संशोधन करना जरूरी हो जाएगा।'' पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर रोजमर्रा के सामानों की कीमतों पर पड़ना तय माना जा रहा है।
















