लखीमपुर खीरी जिले में कृषि गतिविधियों का दायरा काफी बड़ा है और यहां के किसान बड़े पैमाने पर गन्ने की फसल उगाते हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था में गन्ने की खेती का बहुत बड़ा योगदान है, जिस पर जिले की एक बड़ी आबादी की आजीविका निर्भर करती है। वर्तमान में क्षेत्र में शीतकालीन गन्ने की बुवाई का दौर शुरू हो चुका है। किसान बेहतर पैदावार और ज्यादा मुनाफे की उम्मीद में अपने खेतों की जुताई और तैयारी में जुटे हुए हैं। कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि गन्ने की उन्नत किस्मों का चयन और सही कृषि तकनीकों का इस्तेमाल किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
दो दशकों का अनुभव रखते हैं छत्रपाल
जिले के प्रगतिशील किसान छत्रपाल पिछले 20 वर्षों से लगातार गन्ने की खेती करते आ रहे हैं। इतने लंबे समय के कृषि अनुभव के कारण उन्हें गन्ने की बुवाई, फसल की नियमित देखभाल और पैदावार बढ़ाने से जुड़े हर पहलू की गहरी समझ है। छत्रपाल बताते हैं कि वह इन दिनों मुख्य रूप से सीओजे 85 (COJ 85) किस्म के गन्ने की बुवाई पर जोर दे रहे हैं। उनके अनुसार, यह गन्ने की एक अगेती पकने वाली किस्म है, जिसकी खेती करने से किसानों को समय पर अच्छी पैदावार मिलने की पूरी संभावना रहती है।
बीज की मात्रा और खेत की तैयारी
किसान छत्रपाल के बताए आंकड़ों के अनुसार, एक बीघा खेत में गन्ने की बुवाई के लिए लगभग पांच क्विंटल बीज की आवश्यकता होती है। बुवाई के समय बीज की सही मात्रा का हिसाब खेत की तत्कालीन स्थिति, अपनाने वाली बुवाई की विधि और गन्ने के टुकड़ों की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। उनका कहना है कि गन्ने की फसल में शुरुआत से ही उचित प्रंबधन का होना अनिवार्य है। खेत की उन्नत तैयारी और पूरी तरह स्वस्थ बीजों का चयन पौधों की बेहतर बढ़वार को सुनिश्चित करता है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे बुवाई से पहले अपनी स्थानीय मिट्टी और जलवायु के अनुकूल ही गन्ने की किस्मों का चयन करें।
उत्पादन और प्रबंधन के तौर-तरीके
छत्रपाल का दावा है कि सीओजे 85 किस्म की बदौलत एक बीघा खेत से करीब 70 क्विंटल से ज्यादा गन्ने का उत्पादन आसानी से निकाला जा सकता है। हालांकि, यह वास्तविक पैदावार खेत की प्राकृतिक उर्वरता, समय पर सिंचाई की सुविधा, मौसमी बदलाव और समग्र फसल प्रबंधन पर भी निर्भर करती है, जिसके कारण यह कम या ज्यादा भी हो सकती है। यदि किसान वैज्ञानिक तरीकों से फसल की देखभाल करें, समय पर उचित रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करें और खेत के भीतर पर्याप्त नमी बनाए रखें, तो पैदावार के आंकड़े और भी अधिक ऊंचे जा सकते हैं।


















