झारखंड के गोड्डा में इस साल का दुर्गा उत्सव एक अनूठे विवाद के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है। बीते 21 अक्टूबर को पूरे देश में विजया दशमी के पावन पर्व पर मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन संपन्न हो चुका है, लेकिन गोड्डा के प्रसिद्ध कालीपीठ में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा अब भी अपने पंडाल में ही विराजमान है। विसर्जन की प्रक्रिया में आ रही अड़चनों और स्थानीय प्रशासन के बदलते रुख के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है, जिससे आयोजकों और श्रद्धालुओं में गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है। मंदिर कमेटी और जिला प्रशासन के बीच उपजे इस मतभेद के चलते गोड्डा में माहौल गरमा गया है और इस पूरे प्रकरण ने अब राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया है।
विसर्जन स्थल बदलने पर शुरू हुआ पूरा विवाद
गोड्डा के इस प्रतिष्ठित कालीपीठ में पिछले चार वर्षों से लगातार दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन किया जा रहा है। मंदिर कमेटी के सदस्यों का कहना है कि प्रशासन ने पहले आगामी 22 अक्टूबर को राजकचहरी तालाब में प्रतिमा विसर्जन करने की आधिकारिक अनुमति प्रदान की थी। इस पूर्व निर्धारित आदेश के आधार पर ही आयोजकों ने सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली थीं। लेकिन, कुछ ही दिनों के बाद जिला प्रशासन ने अचानक अपने पूर्व के निर्णय में फेरबदल कर दिया। आयोजकों को राजकचहरी तालाब के बजाय एक दूसरे और नजदीकी तालाब में प्रतिमा को विसर्जित करने का निर्देश दिया गया। प्रशासन के इस अचानक आए फैसले के बाद से ही असमंजस की स्थिति बन गई और दोनों पक्षों के बीच विवाद की नींव पड़ी।
रास्ते की समस्या और प्रतिमा खंडित होने का खतरा
मंदिर कमेटी ने जिला प्रशासन के नए निर्देश पर कड़ी आपत्ति जताई है। आयोजकों का मुख्य तर्क यह है कि प्रशासन की तरफ से जिस वैकल्पिक तालाब में विसर्जन करने के लिए कहा गया है, वहां तक पहुंचने के लिए कोई सुगम रास्ता ही नहीं है। इतनी विशाल और भारी-भरकम प्रतिमा को बिना रास्ते के उस तालाब तक सुरक्षित पहुंचाना असंभव सा प्रतीत होता है। कमेटी का साफ तौर पर कहना है कि ऐसे असमतल और दुर्गम रास्तों से प्रतिमा को ले जाने के दौरान उसके खंडित होने का भारी जोखिम बना हुआ है। आयोजकों का पक्ष है कि वे मां दुर्गा की प्रतिमा का अत्यंत आदर और सम्मान के साथ विसर्जन करना चाहते हैं, परंतु प्रशासन के इस अदूरदर्शी फैसले ने उनके सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
वंदना दुबे के सेवा कार्यों और पंडाल से जुड़ा प्रसंग
कालीपीठ में आयोजित होने वाले इस दुर्गा उत्सव की एक खास पहचान वंदना दुबे से जुड़ी हुई है, जो लंबे समय से समाज सेवा और मानव कल्याण के कार्यों में सक्रिय रही हैं। वंदना दुबे को अनाथ बच्चों की बेहतरीन देखभाल और उनके उत्थान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बड़े सम्मान मिल चुके हैं। उनके द्वारा संचालित अनाथ आश्रम के माध्यम से अब तक सैकड़ों बेसहारा बच्चों का लालन-पालन किया गया है। ऐसे सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति के पंडाल में मां दुर्गा की प्रतिमा का इस तरह रुका रहना आयोजकों के लिए बेहद पीड़ादायक है। कमेटी का आरोप है कि यदि प्रशासन ने समय रहते इस मामले पर कोई सकारात्मक कदम उठाया होता, तो आज यह नौबत नहीं आती।
राजनीतिक गलियारों में गरमाया मामला और भाजपा की प्रतिक्रिया
इस पूरे प्रशासनिक गतिरोध के बाद यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। भारतीय जनता पार्टी ने इस घटनाक्रम को लेकर जिला प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अजय साह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी बात रखते हुए प्रशासन के इस रवैये को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि पहले राजकचहरी तालाब में विसर्जन की अनुमति देना और बाद में उसे निरस्त कर देना, तथा फिर जमीन विवाद का हवाला देकर आयोजकों को परेशान करना कई गंभीर शंकाओं को जन्म देता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या यह महज एक इत्तेफाक है या फिर किसी बाहरी दबाव का नतीजा है। अजय साह ने जोर देकर कहा कि आम जनता की आस्था, संस्कृति और पारंपरिक आयोजनों के साथ ऐसा बर्ताव कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि वह अपनी स्थिति स्पष्ट करे और मंदिर कमेटी के साथ मिलकर जल्द से जल्द शांतिपूर्ण तथा सम्मानजनक विसर्जन का मार्ग प्रशस्त करे।
समाधान के लिए मंदिर के पास की जा रही है नए तालाब की खुदाई
इस तमाम गतिरोध और प्रशासनिक उदासीनता के बीच मंदिर कमेटी ने खुद ही इस समस्या का समाधान निकालने का निर्णय लिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, विवाद का कोई अन्य हल निकलता न देख अब मंदिर के बिलकुल नजदीक ही एक नए तालाब की खुदाई का काम शुरू करवा दिया गया है। कमेटी का ऐसा मानना है कि जब इस नए तालाब की खुदाई का कार्य पूरी तरह संपन्न हो जाएगा, तब इसी स्थान पर मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। हालांकि, इस सारे घटनाक्रम के बीच अब तक जिला प्रशासन की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या पक्ष सामने नहीं आया है। यह सवाल अभी भी अपनी जगह कायम है कि प्रशासन ने शुरुआत में राजकचहरी तालाब की अनुमति क्यों दी थी और फिर अचानक अपना फैसला क्यों बदला, जिसका जवाब मिलने का सभी को इंतजार है।



















