दीपावली के आगमन के साथ ही चारों ओर रोशनी और उल्लास का माहौल बनने लगता है। आधुनिक समय में बिजली की झालरों, चाइनीज लाइटों और कृत्रिम सजावटी सामानों ने बाजारों पर कब्जा जमा लिया है, लेकिन सनातन परंपरा में मिट्टी के दीयों की लौ का महत्व आज भी अक्षुण्ण माना जाता है। इसके बावजूद इन पारंपरिक दीयों को तैयार करने वाले कारीगरों के जीवन की हकीकत बेहद कठिन हो चुकी है। हरियाणा के अंबाला छावनी की ऐतिहासिक कुम्हार मंडी में पुश्तैनी काम को जारी रखना अब कारीगरों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। अत्यधिक महंगाई, कच्ची मिट्टी की आसमान छूती कीमतें, पकाने के लिए जरूरी ईंधन का अभाव और दिन-रात के कड़े परिश्रम का उचित मेहनताना न मिलने के चलते यह पारंपरिक हुनर दम तोड़ रहा है। कभी सैकड़ों परिवारों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाली इस मंडी में अब बमुश्किल 7 से 10 कारीगर ही अपने पैतृक व्यवसाय में सक्रिय बचे हैं, जबकि बाकी परिवार रोजी-रोटी के अन्य साधनों की तलाश में इस काम को अलविदा कह चुके हैं।
फरवरी से शुरू होती है दीयों को गढ़ने की लंबी तपस्या
अंबाला छावनी स्थित इस मंडी में मिट्टी के चाक पर पसीना बहा रहे राहुल प्रजापति आज भी अपने पूर्वजों की इस अनमोल विरासत को जीवित रखने की जद्दोजहद में जुटे हैं। उनके परिवार में कई पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन, दीये और पूजा से जुड़ी पारंपरिक वस्तुएं तैयार की जाती रही हैं। राहुल बताते हैं कि दीपावली का सीजन भले ही साल के अंत में आता है, लेकिन उसके लिए मिट्टी जुटाने और सांचे ढालने का काम वे हर साल फरवरी महीने से ही प्रारंभ कर देते हैं। कई महीनों की अनवरत मेहनत के बाद छोटे-बड़े दीये, मिट्टी के कलात्मक मंदिर, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं तथा करवा चौथ के लिए करवे तैयार किए जाते हैं।
इस मंडी में बने मिट्टी के बर्तनों की साख केवल हरियाणा के स्थानीय बाजारों तक ही सीमित नहीं है। पड़ोसी राज्यों पंजाब और हिमाचल प्रदेश से भी छोटे-बड़े व्यापारी हर साल त्योहारों की थोक खरीदारी करने के लिए अंबाला छावनी पहुंचते हैं। हालांकि अंतरराज्यीय मांग होने के बावजूद कारीगरों की जेब तक वाजिब मुनाफा नहीं पहुंच पाता। राहुल के अनुसार कच्ची चिकनी मिट्टी काफी महंगी हो चुकी है और भट्ठी में बर्तनों को पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले लकड़ी के बुरादे यानी ईंधन की किल्लत और उसकी ऊंची दरें लागत को लगातार बढ़ा रही हैं।
मेहनत कारीगर की और भारी मुनाफा बटोर रहे बिचौलिए
कुम्हारों के आर्थिक संकट की सबसे बड़ी वजह थोक और खुदरा कीमतों के बीच का भारी अंतर है। राहुल प्रजापति के अनुसार, जिस बड़े मिट्टी के दीये को वे अपनी भट्ठी से निकालकर थोक में लगभग 5 रुपये में बेचते हैं, वही दीया खुदरा बाजारों में आम ग्राहकों को करीब 15 रुपये तक में बेचा जाता है। छोटे दीयों के मामले में भी यह आर्थिक असंतुलन साफ नजर आता है। कुम्हारों को 1,000 छोटे दीयों का पूरा लॉट लगभग 600 रुपये की मामूली कीमत पर व्यापारियों को सौंपना पड़ता है, जबकि खुदरा बाजार में दुकानदार उसी 1,000 दीयों की खेप को करीब 1,200 रुपये तक में बेचकर दोगुना मुनाफा कमाते हैं।
मिट्टी को खदान से मंगवाने, उसे छानकर गूंधने, चाक पर मनचाहा आकार देने, धूप में कई दिनों तक सुखाने और फिर भट्ठी की तपिश में पकाने का सारा जोखिम कारीगर उठाता है। इस लंबी प्रक्रिया में कई दीये टूट भी जाते हैं, लेकिन खुदरा बिक्री से होने वाली मोटी कमाई का कोई भी हिस्सा इन पसीना बहाने वाले परिवारों की झोली में नहीं गिरता।
कच्चे माल की ढुलाई और चार पीढ़ियों का संघर्ष
इसी मंडी में काम करने वाले 40 वर्षीय मुकेश प्रजापति बचपन से ही चाक के पहिए के साथ बड़े हुए हैं। उनके अनुसार उनका परिवार बीते चार पीढ़ियों से मिट्टी को सुंदर आकारों में ढालने की इस कला से जुड़ा हुआ है। मुकेश बताते हैं कि त्योहारी सीजन की आपाधापी को देखते हुए वे दीपावली से करीब चार महीने पहले पूरी शिद्दत से जुट जाते हैं। इस दौरान छोटे-बड़े दीये, करवा चौथ के करवे, मिट्टी के मंदिर और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां गढ़ने में परिवार का हर सदस्य दिन-रात जुटा रहता है।
मुकेश के अनुसार मिट्टी से कोई भी वस्तु तैयार करना बेहद श्रमसाध्य कार्य है। सबसे पहले मिट्टी खरीदी जाती है, फिर उसे कई दिनों तक पानी में भिगोकर तैयार किया जाता है और उसके बाद ही चाक पर काम शुरू होता है। केवल मिट्टी लाने के लिए इस्तेमाल होने वाले रेहड़े का भाड़ा ही प्रति चक्कर 1,000 रुपये से अधिक बैठ जाता है। जब इतनी भारी लागत और हफ्तों के शारीरिक परिश्रम के बदले बाजार में सम्मानजनक दाम नहीं मिलते, तो घर की युवा पीढ़ी का इस काम से मोहभंग होना स्वाभाविक है। मुकेश को आशंका है कि यदि यही हालात बने रहे तो आने वाले चंद वर्षों में यह पारंपरिक हुनर पूरी तरह सिमट जाएगा। उनका सुझाव है कि यदि सरकार कुम्हारों को रियायती दरों पर मिट्टी उपलब्ध कराने की व्यवस्था करे, तो इस पुश्तैनी कला को दम तोड़ने से बचाया जा सकता है।
सदर बाजार के छोटे रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं की भी रोजी-रोटी
अंबाला छावनी की कुम्हार मंडी केवल कारीगरों का पेट ही नहीं भरती, बल्कि आसपास के छोटे खुदरा दुकानदारों के लिए भी आजीविका का बड़ा आधार है। अंबाला की रहने वाली सोनी शर्मा पिछले 13 सालों से लगातार इस मंडी से मिट्टी के दीये, मंदिर और त्योहार से जुड़ी अन्य सामग्रियां खरीदने आ रही हैं। इस बार वे करवा चौथ के उपलक्ष्य में मिट्टी के करवे खरीदने यहां पहुंची हैं, जिन्हें वे सदर बाजार में अपनी रेहड़ी पर रखकर बेचेंगी और अपने परिवार का भरण-पोषण करेंगी।
सोनी देवी बताती हैं कि कुम्हार मंडी में उन्हें उच्च गुणवत्ता वाली मिट्टी की वस्तुएं अपेक्षाकृत कम और थोक दरों पर मिल जाती हैं। उनके मुताबिक यदि कोई छोटा व्यापारी यहां से 10,000 रुपये का मिट्टी का सामान खरीदता है, तो खुदरा बाजार में उसे करीब 15,000 रुपये तक में बेचने का अवसर मिल जाता है। इस प्रकार यह मंडी छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों को त्योहार के सीजन में 5,000 रुपये तक का मुनाफा कमाने का जरिया प्रदान करती है।
मिट्टी की सोंधी महक और विलुप्त होती कारीगरी
अंबाला छावनी की यह कुम्हार मंडी केवल चाक पर घूमती मिट्टी का केंद्र नहीं है, बल्कि उन मेहनती हाथों की जीवंत दास्तान है जो पीढ़ियों से खुद अंधेरे और धुएं में रहकर दूसरों के आंगन को रोशन करते आए हैं। आज जब लागत लगातार बढ़ रही है और कमाई घट रही है, तब यह सवाल बेहद गंभीर हो जाता है कि आने वाले समय में इन पारंपरिक दीयों को कौन गढ़ेगा। दीपावली पर बाजार से मिट्टी के दीये खरीदना केवल एक रस्म पूरी करना नहीं है, बल्कि उस लुप्तप्राय लोककला और उन कारीगर परिवारों को संबल देना है जिनकी बदौलत हमारी सांस्कृतिक विरासत सांस ले रही है।



















