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मैन्‍युफैक्‍चरिंग की रफ्तार पर लगा ब्रेक, जून में चार साल की दूसरी सबसे धीमी ग्रोथ, विदेशी ऑर्डर भी घटेव्यापार
3 घंटे पहले· 2

मैन्‍युफैक्‍चरिंग की रफ्तार पर लगा ब्रेक, जून में चार साल की दूसरी सबसे धीमी ग्रोथ, विदेशी ऑर्डर भी घटे

जून में भारत की मैन्‍युफैक्‍चरिंग पीएमआई घटकर 54.2 पर आ गई, जो मई में 55 थी। नए ऑर्डर, निर्यात और भर्ती की सुस्‍त रफ्तार ने सेक्‍टर की चमक फीकी कर दी।

अमित पटेलअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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देश के कारखानों में इस बार पहले जैसी हलचल नहीं दिखी। जून के दौरान भारत के मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर की ग्रोथ की रफ्तार धीमी पड़ गई। नए कारोबारी ऑर्डर और विदेशी बिक्री की बढ़ोतरी नरम रहने का सीधा असर खरीद, रोजगार और उत्पादन पर पड़ा और ये सभी मोर्चे सुस्‍त नजर आए। एचएसबीसी इंडिया की ओर से बुधवार को जारी मैन्‍युफैक्‍चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर इंडेक्‍स यानी पीएमआई बताता है कि यह बीते चार साल में सेक्‍टर की दूसरी सबसे धीमी ग्रोथ है।

आंकड़ों के मुताबिक जून में भारत की मैन्‍युफैक्‍चरिंग पीएमआई घटकर 54.2 पर आ गई, जबकि मई में यह 55 के स्‍तर पर थी। साल 2022 के मध्य के बाद से यह इस सेक्‍टर का दूसरा सबसे कमजोर प्रदर्शन है।

कैसे तैयार होता है यह इंडेक्‍स

यह मासिक रिपोर्ट नए ऑर्डर, उत्पादन, रोजगार, आपूर्तिकर्ताओं की डिलीवरी अवधि और खरीदे गए माल के भंडार जैसे कई संकेतकों को जोड़कर बनाई जाती है। इसमें 50 से ऊपर का आंकड़ा गतिविधियों के बढ़ने और 50 से नीचे का आंकड़ा गिरावट का संकेत देता है। सर्वेक्षण में शामिल कई कंपनियों ने मांग की स्थिति सुधरने की बात मानी, जबकि कुछ ने अपने उत्पादों की कमजोर डिमांड और बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा की शिकायत की।

आखिर क्‍यों थमी रफ्तार

एचएसबीसी की मुख्य अर्थशास्त्री (भारत) प्रांजुल भंडारी के मुताबिक भारत की मैन्‍युफैक्‍चरिंग पीएमआई मई के 55.0 से घटकर जून में 54.2 पर पहुंच गई। यह आंकड़ा विस्‍तार तो दिखाता है, लेकिन रफ्तार पहले से धीमी है। उनका कहना है कि पश्चिम एशिया के संघर्ष से जुड़ी पहले की तेजी के बाद अब डिमांड में थोड़ी नरमी आ गई है। इसी वजह से उत्पादन, नए ऑर्डर, निर्यात ऑर्डर और रोजगार, हर मोर्चे पर बढ़ोतरी की चाल सुस्‍त रही। ग्‍लोबल मार्केट की बात करें तो बिक्री में मार्च 2023 के बाद की सबसे कमजोर बढ़ोतरी दर्ज हुई है।

विदेशी बाजारों से घटी मांग

रिपोर्ट बताती है कि जून में भारतीय वस्‍तुओं की अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ी जरूर, लेकिन इसकी रफ्तार 39 महीनों में सबसे कमजोर रही। इसके पीछे कुछ यूरोपीय बाजारों में सुस्‍त बिक्री को बड़ी वजह माना जा रहा है। कीमतों के मामले में भी हालात अलग नहीं रहे। मांग की बढ़ोतरी कमजोर पड़ने से वस्‍तु उत्पादक दाम बढ़ाने में हिचकिचाते नजर आए। यही वजह रही कि उत्पादन कीमतों में बढ़ोतरी सीमित रही और पिछले तीन महीनों में सबसे कम दर्ज की गई।

भर्ती पर लगा ब्रेक, कारोबारी भरोसा डगमगाया

रोजगार के मोर्चे पर कार्यभार स्थिर रहा और मांग का कोई खास दबाव न होने से कंपनियों ने नई नियुक्तियां या तो रोक दीं या घटा दीं। क्षमता पर बोझ न होने के कारण वित्तवर्ष की पहली तिमाही के आखिर में भर्ती की गतिविधियां सीमित रहीं। इस बीच मांग और बाजार की सूरत को लेकर बनी चिंता ने जून में निवेशकों और कारोबारियों का भरोसा कमजोर कर दिया। हालत यह रही कि अगले एक साल में उत्पादन बढ़ने की उम्‍मीद जताने वाली कंपनियों का अनुपात मई के मुकाबले घटकर आधा रह गया। कारोबारियों की बेहतरी की उम्‍मीद भी लुढ़ककर पांच महीने के सबसे निचले स्‍तर पर आ गई है।

इसका आप पर असर

  • भारत में: फैक्‍टरी ऑर्डर और भर्ती की सुस्‍त रफ्तार का मतलब है कि नौकरी ढूंढ रहे लोगों के लिए मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर में नए मौके फिलहाल सीमित रह सकते हैं।
  • निवेशकों और कारोबारियों के लिए: कमजोर डिमांड और गिरता भरोसा आने वाले महीनों में उत्पादन और कमाई की रफ्तार पर असर डाल सकता है।

सवाल-जवाब

जून में भारत की मैन्‍युफैक्‍चरिंग पीएमआई कितनी रही?
जून में यह घटकर 54.2 पर आ गई, जबकि मई में यह 55 के स्‍तर पर थी।
पीएमआई का 50 से ऊपर या नीचे होना क्‍या दर्शाता है?
50 से ऊपर का स्‍तर गतिविधियों के बढ़ने और 50 से नीचे का स्‍तर गिरावट का संकेत देता है।
मैन्‍युफैक्‍चरिंग की रफ्तार क्‍यों धीमी पड़ी?
पश्चिम एशिया के संघर्ष से जुड़ी पहले की तेजी के बाद डिमांड में नरमी आई, जिससे उत्पादन, नए ऑर्डर, निर्यात और रोजगार सभी की रफ्तार सुस्‍त रही।
विदेशी मांग को लेकर क्‍या हालात रहे?
भारतीय वस्‍तुओं की अंतरराष्ट्रीय मांग जून में बढ़ी तो, लेकिन इसकी रफ्तार 39 महीनों में सबसे कमजोर रही, जिसकी बड़ी वजह कुछ यूरोपीय बाजारों में सुस्‍त बिक्री रही।
रोजगार पर इसका क्‍या असर पड़ा?
मांग का दबाव न होने से कंपनियों ने नई भर्तियां रोक दीं या घटा दीं, जिससे पहली तिमाही के अंत में भर्ती गतिविधियां सीमित रहीं।
कारोबारियों का भरोसा किस स्‍तर पर पहुंचा?
कारोबारियों की बेहतरी की उम्‍मीद गिरकर पांच महीने के सबसे निचले स्‍तर पर आ गई, और उत्पादन बढ़ने की उम्‍मीद जताने वाली कंपनियों का अनुपात मई के मुकाबले आधा रह गया।
अमित पटेल
लेखक के बारे मेंअमित पटेलबिज़नेस संवाददाता दिल्ली
विशेषज्ञताबिज़नेस समाचार, वित्तीय बाज़ार, शेयर बाज़ार विश्लेषण, कॉर्पोरेट मामले, स्टार्टअप, उद्यमिता, आर्थिक रुझान, टेक्नोलॉजी बिज़नेस, निवेश, वैश्विक अर्थव्यवस्था

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, स्टार्टअप, तकनीक और आर्थिक रुझानों को कवर करते हैं। वे आधुनिक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले कारोबार और उद्योगों की ख़बरें, बाज़ार विश्लेषण और अंतर्दृष्टि देते हैं।

अमित पटेल एक बिज़नेस संवाददाता हैं जो वैश्विक बाज़ार, वित्त, उद्यमिता, तकनीक और आर्थिक घटनाक्रमों को कवर करते हैं। वे ब्रेकिंग बिज़नेस न्यूज़, कॉर्पोरेट रणनीतियों, शेयर बाज़ार के रुझानों, स्टार्टअप इकोसिस्टम और वैश्विक अर्थव्यवस्था को आकार देने वाले औद्योगिक नवाचारों पर रिपोर्ट करते हैं। सटीकता, स्पष्टता और गहन विश्लेषण पर ज़ोर देते हुए अमित पाठकों को जटिल कारोबारी विषयों और उनके वास्तविक असर को समझने में मदद करते हैं। उनकी कवरेज वित्तीय बाज़ार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, उभरते उद्योगों, आर्थिक नीति, निवेश रुझानों और डिजिटल बदलाव तक फैली है।

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