देश के सबसे बड़े कारोबारी घरानों में शुमार टाटा समूह के लिए उसके नए दांव ही अब मुश्किल की सबसे बड़ी वजह बनते जा रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में समूह की उन 16 निजी कंपनियों का सामूहिक घाटा करीब दोगुना बढ़कर ₹27,854 करोड़ पर पहुंच गया, जो अब तक शेयर बाजार में सूचीबद्ध नहीं हैं। ठीक एक साल पहले यही आंकड़ा ₹15,311 करोड़ था। टाटा संस की सालाना रिपोर्ट में सामने आए ये नंबर बता रहे हैं कि नई जमीन तोड़ने की कोशिश समूह की जेब पर कितनी भारी पड़ रही है।
किसने डुबोया और किसने संभाला
घाटे में रहने वाली कंपनियों की सूची में एयर इंडिया, टाटा डिजिटल, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, एग्राटास, टाटा प्रोजेक्ट्स, टाटा रियल्टी एंड इंफ्रास्ट्रक्चर और टाटा प्ले शामिल हैं। राहत की बात सिर्फ इतनी रही कि इसी दायरे की 9 निजी कंपनियां मुनाफे में बनी रहीं। लेकिन दिलचस्प यह है कि जिन इकाइयों पर समूह सबसे ज्यादा भरोसा और पैसा लगा रहा है, वही सबसे गहरी चोट दे रही हैं।
एयर इंडिया बनी सबसे बड़ी चिंता
इस वक्त पूरे समूह का असली सिरदर्द एयर इंडिया है। अकेले इस एयरलाइन का घाटा ही ₹22,238 करोड़ तक जा पहुंचा है। अहमदाबाद में हुए विमान हादसे, अमेरिका और ईरान के बीच टकराव से जेट ईंधन के दाम चढ़ने और हवाई क्षेत्र बंद होने जैसी वजहों ने इसकी कमाई पर सीधा असर डाला। नतीजा यह रहा कि एयरलाइन का राजस्व 10% घटकर ₹71,870 करोड़ रह गया।
जहां पैसा ज्यादा, वहां नुकसान भी ज्यादा
सालाना रिपोर्ट का साफ इशारा है कि सबसे भारी घाटा ठीक उन्हीं कंपनियों में दर्ज हुआ, जिनमें समूह ने सबसे ज्यादा पूंजी झोंकी। एयर इंडिया के बाद टाटा डिजिटल, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और एग्राटास पर सबसे बड़ा निवेश हुआ। टाटा नियु ऐप चलाने वाली टाटा डिजिटल को ₹4,974 करोड़ का नुकसान झेलना पड़ा। जून में ही टाटा संस ने इस कंपनी में ₹2,970 करोड़ और लगा दिए थे।
बैटरी बनाने के कारोबार में उतरी एग्राटास का घाटा बढ़कर ₹1,101 करोड़ हो गया। वहीं आईफोन और सेमीकंडक्टर बनाने वाली टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का नुकसान ₹70 करोड़ से छलांग लगाकर ₹1,611 करोड़ पर पहुंच गया। हालांकि इसी कंपनी की एक उपलब्धि चौंकाने वाली रही, इसने ₹1.3 लाख करोड़ का रिकॉर्ड राजस्व दर्ज किया और एयर इंडिया को पीछे छोड़ते हुए समूह की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली कंपनी बन गई।
बोर्ड रूम में बढ़ी तनातनी
नए कारोबार में लगातार बहते पैसे और मोटे घाटे ने टाटा संस के बोर्ड रूम का माहौल भी गरमा दिया है। फरवरी की बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने घाटे वाली इन इकाइयों में हुए बड़े निवेश पर तीखे सवाल खड़े किए थे। उनके इसी सख्त तेवर के चलते चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के तीसरे पांच साल के कार्यकाल पर आखिरी मुहर लगाने का फैसला टल गया। चंद्रशेखरन फरवरी 2017 में टाटा संस की कमान संभाल चुके हैं और उनका दूसरा कार्यकाल फरवरी 2027 में पूरा होगा।
चंद्रशेखरन का पलटवार
दूसरी ओर, चंद्रशेखरन ने इस भारी निवेश का खुलकर बचाव भी किया। उन्होंने इसकी तुलना टाटा के उन ऐतिहासिक फैसलों से की, जब समूह ने आईआईएससी की नींव रखी, इस्पात उद्योग खड़ा किया और आईटी सेवाओं में कदम रखा। शेयरधारकों को लिखे पत्र में उन्होंने कहा, “इन्हें सफल साबित होने में दशकों लगे, लेकिन बाद में यही देश की जरूरत साबित हुए।” उनका तर्क है कि अपने दौर में हर बड़ा दांव जोखिम भरा और गैर-व्यावहारिक ही लगता था।



















