ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के साथ पशुपालन आजीविका का मुख्य आधार बना हुआ है। हाल के वर्षों में कई किसानों ने व्यावसायिक स्तर पर डेयरी फार्मिंग शुरू की है ताकि अपनी आय में बढ़ोतरी कर सकें। आधुनिक तकनीकों और शेड व्यवस्था के जरिए मवेशियों का रखरखाव किया जा रहा है, लेकिन उचित प्रशिक्षण न होने के कारण कई बार मवेशी पालकों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है। जहानाबाद जिला पशुपालन कार्यालय में पदस्थ पशु चिकित्सक सह सहायक कुक्कुट पदाधिकारी डॉ. प्रकाश चंद्र हिमांशु बताते हैं कि बिना वैज्ञानिक जानकारी और प्रशिक्षण के कोई भी व्यवसाय शुरू करना पशुओं के स्वास्थ्य और किसान के बजट दोनों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।
प्रशिक्षण का महत्व और डेयरी संचालन की बुनियादी बातें
डेयरी व्यवसाय की सफलता काफी हद तक वैज्ञानिक देखरेख और मवेशियों की सही दिनचर्या पर निर्भर करती है। अक्सर देखा जाता है कि लोग उत्सुकता में गाय और भैंस तो खरीद लेते हैं, लेकिन प्रसव और नवजात की देखरेख से जुड़ी बुनियादी जानकारियों पर ध्यान नहीं देते। डॉक्टर हिमांशु का कहना है कि यदि पशुपालक शुरुआत से ही प्रशिक्षण हासिल करें, तो प्रसव के समय उत्पन्न होने वाली आकस्मिक समस्याओं का सामना आसानी से कर सकते हैं। सही समय पर सही कदम उठाने से न केवल मवेशी का स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है, बल्कि दूध उत्पादन पर भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
प्रसव के बाद नवजात बछड़े को अलग रखने की गलत परंपरा
ग्रामीण इलाकों में एक पुरानी भ्रांति फैली हुई है कि जब तक गाय या भैंस का प्लेसेंटा यानी झाड़ बाहर न निकल जाए, तब तक नवजात बछड़े को मां का दूध नहीं पिलाना चाहिए। कई किसान प्लेसेंटा गिरने का इंतजार करते हैं और बछड़े को मवेशी से दूर बांध देते हैं। विशेषज्ञ इस तरीके को वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह गलत और नुकसानदेह मानते हैं। बछड़े को प्रसव के तुरंत बाद दूध न मिलने से उसके शरीर को शुरुआती पोषक तत्व नहीं मिल पाते। इस वजह से नवजात की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और वह भविष्य में विभिन्न प्रकार के रोगों की चपेट में आ जाता है।
ऑक्सीटोसिन हार्मोन का जैविक प्रभाव और प्राकृतिक प्लेसेंटा निकासी
जैविक प्रक्रिया के अनुसार, जैसे ही नवजात बछड़ा मां के थन में मुंह लगाता है और दूध पीना शुरू करता है, मवेशी के शरीर में तुरंत ऑक्सीटोसिन हार्मोन का स्राव होने लगता है। यह हार्मोन बच्चेदानी के मुंह को फैलाने में मदद करता है, जिससे प्लेसेंटा स्वाभाविक रूप से और बिना किसी बाधा के बाहर निकल जाता है। यदि बछड़े को दूध पीने से रोका जाता है, तो इस हार्मोन का स्राव बाधित होता है और प्लेसेंटा निकलने की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी होती है।
अप्रशिक्षित प्रैक्टिशनर से प्लेसेंटा निकलवाने के जोखिम
प्रसव के बाद प्लेसेंटा न निकलने पर पशु असहनीय पीड़ा से गुजरता है। ऐसी स्थिति में घबराकर कई किसान आसपास के अप्रशिक्षित प्रैक्टिशनर को बुला लेते हैं और हाथ डालकर प्लेसेंटा बाहर निकलवाते हैं। डॉ. प्रकाश चंद्र हिमांशु चेतावनी देते हैं कि जबरन प्लेसेंटा बाहर खींचना मवेशी के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। इस प्रक्रिया से गर्भाशय में गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। संक्रमण के कारण मवेशी लंबे समय के लिए बीमार पड़ सकता है, जिससे उसकी दैनिक दूध उत्पादन क्षमता में भारी गिरावट आ जाती है और इलाज पर अनावश्यक खर्च बढ़ता है। इसलिए प्रसव के बाद प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर भरोसा करना और केवल प्रमाणित पशु चिकित्सक से सलाह लेना ही सर्वोत्तम उपाय है।


















