लोकसभा में एंटी पेपर लीक संशोधन विधेयक पर चर्चा, शशि थरूर ने रखी अपनी बातवियो ने पेश किया नया इलेक्ट्रिक ट्राईसाइकिल रोवर, साझा गतिशीलता बाजार में बड़ी छलांग की तैयारीडोनाल्ड ट्रंप का बड़ा बयान, अमेरिकी फुटबॉल के लिए ऐतिहासिक रहा विश्व कप का आयोजनचाणक्य नीति: इन चार तरह के लोगों को कभी न बताएं घर की बातें, वरना बिखर जाएगी परिवार की खुशियांतेल बाजार में भारी गिरावट, क्या निवेशक कर रहे हैं जल्दबाजी या मध्य पूर्व की उम्मीदें हैं अतिरेकघर में रखा सोना अब भारत में उधार लेने का पसंदीदा जरिया बनता जा रहा हैअमेरिका में सुस्त पड़ी नौकरियों की रफ्तार, जुलाई के मध्य में 15 हजार पर सिमटा औसतअगस्त से बदल रहे हैं कई बड़े नियम, तत्काल बुकिंग से लेकर आईटीआर पेनल्टी और एलपीजी दाम तक जान लें पूरी डिटेलइंडोनेशियाई सेंट्रल बैंक के गवर्नर का अचानक इस्तीफा, क्या लौटने वाला है 1997 का भीषण आर्थिक संकटमहाभारत में अर्जुन का किरदार निभाने के बाद भी शहीर शेख को क्यों झेलनी पड़ी थी बेरोजगारी
नोएडा मेट्रो के खिलाफ दिवाला याचिका NCLT ने ठुकराई, जानिए पूरा विवादव्यापार
12 जून 2026, 10:12 pm (46 दिन पहले)· 0

नोएडा मेट्रो के खिलाफ दिवाला याचिका NCLT ने ठुकराई, जानिए पूरा विवाद

एनसीएलटी की इलाहाबाद पीठ ने एम्पायर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज की नोएडा मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के खिलाफ दायर 7.09 करोड़ रुपये के बकाये से जुड़ी दिवाला याचिका को पूर्व-विद्यमान विवाद का हवाला देते हुए खारिज कर दिया।

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने एम्पायर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड की ओर से नोएडा मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (NMRC) के खिलाफ दाखिल दिवाला याचिका को नामंजूर कर दिया है। ट्रिब्यूनल ने माना कि सेवा की गुणवत्ता, अनुबंध से जुड़ी जिम्मेदारियों और भुगतान में की गई कटौती को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद पहले से ही चल रहा था। एनसीएलटी की इलाहाबाद पीठ ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की धारा-9 के तहत नोएडा मेट्रो के विरुद्ध कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू करने की अर्जी को ठुकरा दिया।

एम्पायर ट्रांसपोर्ट सर्विसेज लिमिटेड (ETSL) ने 15 जनवरी, 2016 को नोएडा मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के साथ हुए 'बस ऑपरेटर' समझौते से जुड़े करीब 7.09 करोड़ रुपये के परिचालन बकाये का दावा करते हुए लॉ ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था। इस समझौते के मुताबिक ETSL को नोएडा और ग्रेटर नोएडा के बीच 100 लो-फ्लोर एसी सीएनजी बसें चलानी थीं, मगर कंपनी ने 100 के बजाय केवल 50 बसें ही सड़क पर उतारीं। ईटीएसएल ने शेष 50 बसें चलाने को लेकर नोएडा मेट्रो से संपर्क किया, पर उसे कोई जवाब नहीं मिला।

ये भी पढ़ें

NMRC और ETSL के समझौते में क्या प्रावधान थे

करार की शर्तों के अनुसार नोएडा मेट्रो को बिल मिलने के एक हफ्ते के अंदर 50 प्रतिशत रकम और बचा हुआ भुगतान अगले 15 दिन में करना था। समझौते में यह भी तय था कि भुगतान में देरी होने पर नोएडा मेट्रो को प्रतिदिन 9 प्रतिशत की चक्रवृद्धि ब्याज दर से रकम चुकानी होगी। ETSL का आरोप था कि उसने 25 अप्रैल, 2019 से 16 मार्च, 2020 के दौरान कई बिल सौंपे, लेकिन नोएडा मेट्रो की ओर से उसे कोई भुगतान नहीं हुआ। इसके बाद कंपनी ने आईबीसी की धारा-8 के तहत नोटिस भेजा और चूक का दावा करते हुए परिचालन ऋणदाता के रूप में याचिका दाखिल की।

नोएडा मेट्रो ने अपने बचाव में क्या कहा

नोएडा मेट्रो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील फर्नांडीस, अभिषेक प्रसाद और कौशलेंद्र नाथ सिंह ने तर्क रखा कि आईबीसी के तहत भुगतान में कोई चूक हुई ही नहीं है। उन्होंने कहा कि एम्पायर ट्रांसपोर्ट अनुबंध के मुताबिक सेवाएं देने में बार-बार नाकाम रही और उसने कई उल्लंघन किए, जिनके लिए उसे कई कारण बताओ नोटिस भी थमाए गए। ये नोटिस एम्पायर ट्रांसपोर्ट द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दायर रिट याचिका में भी पेश किए गए थे, जिसे 14 जुलाई, 2021 को खारिज कर दिया गया और उसके बाद इस विवाद में मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू हुई।

एनसीएलटी ने सुनवाई में क्या कहा

नोएडा मेट्रो की दलीलें सुनने के बाद एनसीएलटी की दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि यह विवाद महज भुगतान न होने का नहीं, बल्कि सेवा की गुणवत्ता और अनुबंध के तहत हुए उल्लंघनों को लेकर गहरे मतभेदों का मामला है। लॉ ट्रिब्यूनल ने कहा कि नोएडा मेट्रो ने सेवा में कई खामियों को लेकर कई कारण बताओ नोटिस जारी किए थे, जिनमें जीपीएस और यात्री सूचना प्रणाली का ठीक से काम न करना, टूटी हुई विंडशील्ड, दिव्यांगों के लिए लगे रैंप की खराब हालत, स्टॉप बटन का काम न करना, बसों की अपर्याप्त तैनाती, एयर कंडीशनिंग की दिक्कतें और ईपीएफ व ईएसआई जैसे वैधानिक अनुपालन में कमी जैसी बातें शामिल थीं।

क्यों ठुकराई गई ETSL की याचिका

उच्चतम न्यायालय के 'मोबिलॉक्स इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम किरूसा सॉफ्टवेयर प्राइवेट लिमिटेड' मामले के फैसले का हवाला देते हुए एनसीएलटी ने दोहराया कि अगर मांग नोटिस जारी होने से पहले ही वास्तविक विवाद मौजूद हों, तो दिवाला आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता। एनसीएलटी ने कहा कि सेवा मानकों, अनुबंध के तहत प्रदर्शन, दंडात्मक कटौती और खातों के मिलान से जुड़े मतभेद साफ तौर पर आईबीसी के तहत "पूर्व-विद्यमान विवाद" के दायरे में आते हैं। आशीष वर्मा और प्रवीण गुप्ता की पीठ ने कहा, ''इसलिए धारा 5(6) के तहत वास्तविक एवं पूर्व-विवाद के अस्तित्व को देखते हुए धारा-9 के तहत दायर मौजूदा आवेदन स्वीकार करने योग्य नहीं है और इसे खारिज किया जाता है।''

संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR