कम बारिश और सूखे की आशंका के बीच मवेशियों के चारे का संकट झेल रहे किसानों और पशुपालकों के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। राजस्थान के पाली स्थित केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान यानी काजरी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा अनूठा और असरदार समाधान खोज निकाला है, जो चारे की समस्या को काफी हद तक दूर कर सकता है। वैज्ञानिकों ने कैक्टस की कई प्रजातियों पर लंबे समय तक शोध करने के बाद एक ऐसी खास किस्म तैयार की है, जो न केवल बेहद कम पानी में लहलहाती है बल्कि मवेशियों के लिए पूरी तरह सुरक्षित और पौष्टिक भी साबित होती है। इस अनोखे कैक्टस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें एक भी कांटा नहीं होता है, जिससे पशु इसे बहुत आसानी से खा सकते हैं और यह उनकी सेहत तथा दूध उत्पादन दोनों के लिए बेहद गुणकारी है।
अस्सी प्रजातियों पर रिसर्च के बाद मिली सफलता
वैज्ञानिक झाबर सिंह के अनुसार, इस खास चारे को विकसित करने के लिए शोधकर्ताओं ने कैक्टस की कुल 80 अलग-अलग किस्मों का गहन परीक्षण और ट्रायल किया था। लंबे अध्ययन के बाद बिना कांटों वाली इस विशेष कैक्टस प्रजाति का चयन किया गया और अब इसे किसानों तक पहुंचाया जा रहा है। आमतौर पर कैक्टस का नाम सुनते ही दिमाग में खतरनाक कांटों की तस्वीर उभरती है, जिसके कारण पारंपरिक रूप से इसे पशुओं के चारे के अयोग्य माना जाता था। लेकिन वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई यह विशेष कांटे रहित किस्म मवेशियों के लिए अत्यंत सुपाच्य और पौष्टिक हरा चारा सिद्ध हो रही है, जिससे किसानों को सूखे के दिनों में भी चारे की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
बंजर जमीन और सूखे इलाकों में बंपर पैदावार
इस अनूठे कैक्टस की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह अत्यंत कम पानी वाले इलाकों में भी बिना किसी परेशानी के आसानी से पनप सकता है। किसान अपनी बेकार पड़ी बंजर और अनुपजाऊ मिट्टी पर भी इसे सरलता से उगा सकते हैं। इसे उगाने की प्रक्रिया भी बेहद सरल है, जिसमें पौधे के एक पत्ते का केवल एक-तिहाई भाग यानी 1/3 हिस्सा जमीन के अंदर रोप दिया जाता है। एक बार जब पौधा अच्छी तरह जम जाता है और नए पत्ते निकलने शुरू हो जाते हैं, तब इसे अलग से पानी देने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। यह पौधा वातावरण और हवा की नमी से ही अपने लिए जरूरी पानी सोख लेता है, जिससे सिंचाई की लागत शून्य के बराबर हो जाती है।
नब्बे प्रतिशत पानी और बाईस प्रतिशत प्रोटीन से भरपूर
पशुओं के स्वास्थ्य और उनके दूध उत्पादन के लिहाज से यह कैक्टस किसी सुपरफूड से कम नहीं है। इसके पत्तों के अंदर करीब 90 प्रतिशत तक जल तत्व मौजूद होता है, जो भीषण गर्मी के मौसम में मवेशियों के शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन नहीं होने देता है। इसके अलावा, इसमें लगभग 22 प्रतिशत तक प्रचुर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है, जो सीधे तौर पर पशुओं की सेहत को दुरुस्त रखता है और उनके दूध देने की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करता है। नाममात्र की देखभाल और बेहद कम लागत में तैयार होने वाला यह विशेष कैक्टस आने वाले समय में पश्चिमी राजस्थान के तमाम पशुपालकों की आर्थिक स्थिति को और अधिक मजबूत बनाने में मददगार साबित होगा।



















