मंगल ग्रह के रहस्यों को गहराई से समझने के लिए एक नया और अनूठा अंतरिक्ष अभियान शुरू होने जा रहा है। जापान मार्स मून्स एक्सप्लोरेशन यान के जरिए लाल ग्रह के प्राकृतिक उपग्रहों की ओर अपने कदम बढ़ा रहा है। इस महत्वाकांक्षी मिशन का मुख्य उद्देश्य मंगल के चंद्रमा से पहली बार चट्टान और धूल के नमूने एकत्र करके उन्हें वापस धरती पर सुरक्षित पहुंचाना है। हालांकि इस पूरी यात्रा में लंबा समय लगने वाला है।
लंबी यात्रा और समयसीमा
अंतरिक्ष यान को अपनी मंजिल तक पहुंचने में लगभग एक साल का समय लगेगा। इसके बाद यह यान लाल ग्रह की परिक्रमा करते हुए तीन साल तक विभिन्न वैज्ञानिक कार्यों को अंजाम देगा। नमूने एकत्र करने और अन्य प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद धरती पर लौटने में भी एक साल का समय और लगेगा। यदि सब कुछ तय योजना के मुताबिक चला, तो वैज्ञानिकों को यह अनूठा खजाना साल 2031 तक मिलने की उम्मीद है।
उत्पत्ति के रहस्यों की तलाश
इस अभियान के जरिए वैज्ञानिकों को सबसे बड़ा जवाब यह मिलने की उम्मीद है कि मंगल के दोनों चंद्रमा फोबोस और डीइमोस आखिर अस्तित्व में कैसे आए थे। इस संबंध में मुख्य रूप से दो बड़े सिद्धांत वैज्ञानिकों के बीच चर्चा में हैं। पहला विचार यह कहता है कि जब किसी भारी खगोलीय पिंड की टक्कर मंगल से हुई थी, तब उससे निकले मलबे के संघनन से इन चंद्रमाओं का निर्माण हुआ।
दूसरा मत यह है कि ये दोनों उपग्रह मूल रूप से बाहरी सौर मंडल के छोटे क्षुद्रग्रह थे, जिन्हें मंगल ग्रह के गुरुत्वाकर्षण बल ने अपने पाश में बांध लिया था। इन उपग्रहों का रंग गहरा है और प्रकाश को परावर्तित करने की उनकी क्षमता पानी तथा कार्बन से भरपूर क्षुद्रग्रहों जैसी है।
इसके विपरीत, उनकी कक्षाएं मंगल की भूमध्य रेखा के बिल्कुल करीब और लगभग गोलाकार हैं, जो उसी दिशा में घूमती हैं जिस दिशा में खुद ग्रह चक्कर लगाता है। इस तरह की व्यवस्थित कक्षाएं विशाल टक्कर के सिद्धांत को अधिक बल देती हैं। मंगल के चंद्रमाओं से मिलने वाले नमूनों की तुलना जब पहले कभी लाल ग्रह की सतह से जुटाए गए नमूनों से की जाएगी, तो इस पुरानी बहस का कोई ठोस नतीजा सामने आ सकता है।
बड़ी तकनीकी चुनौतियां और अंतरिक्ष यान का ढांचा
मंगल के चंद्रमा से चट्टानें समेटकर उन्हें पृथ्वी तक वापस लाना अंतरिक्ष उड़ान और संचार के लिहाज से किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। उड़ान के वक्त इस अंतरिक्ष यान का कुल वजन 4,480 किलोग्राम यानी 9,900 पाउंड होगा। इस भारी वजन का आधे से ज्यादा हिस्सा केवल ईंधन का होगा, जिसे तीन अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया गया है।
पहला हिस्सा अंतरिक्ष यान को बाहरी यात्रा कराने के लिए है, दूसरा अन्वेषण कार्यों के लिए और तीसरा सुरक्षित वापसी के सफर के काम आएगा। जब यान मंगल के पास पहुंचेगा, तो बाहरी चरण का ईंधन खत्म होने के बाद उस मॉड्यूल को अंतरिक्ष में ही छोड़ दिया जाएगा। इसी तरह डीइमोस के करीब से गुजरने के बाद अन्वेषण मॉड्यूल को भी अलग कर दिया जाएगा।
फोबोस की सतह पर उतरने की अनूठी चुनौती
मित्सुबिशी इलेक्ट्रिक द्वारा डिजाइन किए गए इस जांच यान को फोबोस की सतह पर उतरना होगा। यह अपने आप में बेहद नाजुक प्रक्रिया है क्योंकि इस चंद्रमा का आकार बहुत छोटा है और इसकी त्रिज्या महज 11 किलोमीटर के आसपास है। इसकी तुलना में हमारी धरती के चंद्रमा की त्रिज्या 1,700 किलोमीटर से भी ज्यादा है।
पृथ्वी के चांद पर उतरने के लिए जिस गुरुत्वाकर्षण बल का सहारा लिया जाता है, वह फोबोस की तुलना में लगभग 300 गुना अधिक मजबूत है। हालांकि फोबोस का गुरुत्वाकर्षण बल रयूगु क्षुद्रग्रह की तुलना में करीब 50 गुना अधिक है, जहां जाक्सा पहले भी अपने यान उतार चुका है।
रयूगु पर लैंडिंग के दौरान लंबे समय तक हवा में मंडराने की तकनीक का इस्तेमाल किया गया था जो छोटे खगोलीय पिंडों के लिए आम है। लेकिन एमएमएक्स के मामले में यह मुमकिन नहीं है क्योंकि फोबोस के मजबूत खिंचाव के कारण इसमें अत्यधिक ईंधन खर्च हो जाएगा।
स्वायत्त नेविगेशन और लैंडिंग की सुरक्षा
इस बड़ी कठिनाई से पार पाने के लिए अंतरिक्ष यान में उच्च-सटीक स्वायत्त नेविगेशन प्रणाली लगाई गई है। इसकी बेहद आवश्यकता भी है क्योंकि पृथ्वी और एमएमएक्स के बीच रेडियो संकेतों के आने-जाने में बीस मिनट तक की देरी हो सकती है। ऐसे में यान को खुद ही यह फैसला लेना होगा कि उसे उतरने, लैंडिंग करने और बाद में उड़ान भरने की प्रक्रिया को कैसे अंजाम देना है।
उतरने के दौरान यान अपने आसपास की स्थलाकृति की तुलना फोबोस के क्रेटरों से जुड़े डेटा से करेगा और लैंडिंग स्थल की दिशा में खुद को सही करेगा। तीन सौ मीटर से कम ऊंचाई पर पहुंचने पर यान यह भी जांचेगा कि सतह के किसी हिस्से की ऊंचाई में कोई बदलाव तो नहीं आया है। किसी भी बड़े अंतर को खतरनाक क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया जाएगा। इस बेहतरीन तंत्र की बदौलत यान जरूरत पड़ने पर अपना लैंडिंग स्थल बदल सकता है या फिर अपनी लैंडिंग को बीच में रोककर वापस ऊपर की ओर उड़ सकता है।
आईडेफिक्स रोवर की भूमिका और नमूने एकत्र करने की तकनीक
मुख्य अंतरिक्ष यान के उतरने से ठीक पहले फ्रांस और जर्मनी की अंतरिक्ष एजेंसियों द्वारा संयुक्त रूप से विकसित आईडेफिक्स रोवर को फोबोस की सतह पर उतारा जाएगा। यह रोवर लगभग एक सौ दिनों तक स्वतंत्र रूप से वहां खोजबीन करेगा। इस रोवर द्वारा किया गया शुरुआती सर्वेक्षण मुख्य यान की लैंडिंग को और अधिक सुरक्षित बनाएगा।
सतह पर पहुंचने के बाद एक रोबोटिक आर्म यानी यांत्रिक हाथ बेलनाकार नलियों को जमीन के अंदर धकेलकर नमूने एकत्र करेगा। इसके अलावा यान में नासा द्वारा विकसित एक खास उपकरण भी लगाया गया है जो नाइट्रोजन गैस के फव्वारे का इस्तेमाल करके धूल की सबसे ऊपरी परत से बहुत बारीक कणों को समेटेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही फोबोस की उत्पत्ति किसी टक्कर से न हुई हो, फिर भी वहां मंगल ग्रह की रेत मिल सकती है। समय के साथ उल्कापिंडों की टक्करों की वजह से मंगल से सामग्री उड़कर उसके चंद्रमाओं पर जमती रही है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एकत्र किए जाने वाले नमूनों का लगभग 0.1 हिस्सा खुद मंगल ग्रह का मलबा होगा।
लगभग 345 मिलियन अमेरिकी डॉलर की लागत वाला यह मिशन पिछले अट्ठाईस वर्षों में जापान का पहला मंगल मिशन प्रक्षेपण है। वैज्ञानिक जानकारियों के अलावा इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से इस मिशन का उद्देश्य नई तकनीकों का परीक्षण करना है, जो भविष्य में मंगल ग्रह की यात्रा और वहां से नमूने लाने में मददगार साबित हो सकती हैं।
प्रक्षेपण की तारीख
यह महत्वपूर्ण एमएमएक्स अंतरिक्ष यान तानेगाशिमा स्पेस सेंटर से 20 अक्टूबर 2026 को उड़ान भरने के लिए पूरी तरह तैयार है।


















