बिहार के पशुपालकों और डेयरी किसानों के लिए आने वाले कुछ महीने बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और राष्ट्रीय रोग निगरानी प्रणाली ने राज्य में पशुओं से जुड़ी एक गंभीर बीमारी के बड़े पैमाने पर फैलने की चेतावनी जारी की है। मौसम के वर्तमान मिजाज और पर्यावरणीय बदलावों का व्यापक आकलन करने के बाद विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस साल सितंबर और अक्टूबर के महीने में बिहार के कई जिलों में लम्पी स्किन डिजीज (लम्पी त्वचा रोग) का भारी प्रकोप देखने को मिल सकता है। ग्रामीण अंचलों में इस घातक संक्रामक बीमारी को अक्सर आम बोलचाल में 'माता मैया' के नाम से भी पुकारा जाता है। विशेषज्ञों ने किसानों को स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि अगर समय रहते मवेशियों के बचाव के लिए पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए, तो यह बीमारी पशुधन के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। इससे न सिर्फ गोवंश को भारी क्षति पहुंचेगी, बल्कि दूध के उत्पादन पर निर्भर हजारों किसानों की आजीविका भी खतरे में पड़ सकती है।
क्या है लम्पी स्किन डिजीज और इसके प्रमुख लक्षण?
लम्पी स्किन डिजीज मुख्य रूप से गायों और भैंसों को प्रभावित करने वाली एक बेहद तेजी से फैलने वाली वायरल बीमारी है, जो मच्छरों, मक्खियों और दूषित पानी के जरिए एक पशु से दूसरे पशु में फैलती है। बेगूसराय जिले के खोदावंदपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान और पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. रामकृष्ण रॉय के अनुसार, यह वायरल संक्रमण मवेशियों के लिए काफी पीड़ादायक होता है। इस बीमारी की चपेट में आने के बाद पशु की त्वचा पर, विशेषकर गर्दन, सिर और पूरे शरीर पर छोटी-बड़ी सख्त गांठें और फफोले उभर आते हैं। इसके साथ ही संक्रमित मवेशी को लगातार तेज बुखार रहता है और वह शारीरिक रूप से बेहद कमजोर हो जाता है। मुंह और गले में फफोले होने के कारण पशुओं को खाने-पीने में भारी तकलीफ होती है, जिससे उनका चारा खाना लगभग बंद हो जाता है। इसका सीधा और तत्काल असर दूध के उत्पादन पर पड़ता है, जो काफी हद तक गिर जाता है। डॉ. रॉय का कहना है कि अगर बीमारी की पहचान के बाद सही समय पर सटीक इलाज नहीं मिला, तो गंभीर स्थिति में तड़प-तड़प कर संक्रमित पशु की मौत भी हो सकती है। बिहार में विगत वर्षों में भी इस बीमारी के कारण पशुपालकों को काफी आर्थिक एवं मानसिक नुकसान का सामना करना पड़ा है।
वैज्ञानिकों ने कैसे लगाया बीमारी के फैलने का सटीक अनुमान?
पशु रोग निगरानी प्रणाली आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए मुख्य रूप से मौसम के विभिन्न पैमानों का गहराई से अध्ययन करती है। यह निगरानी व्यवस्था मुख्य रूप से तापमान में हो रहे उतार-चढ़ाव, हवा में बढ़ती नमी के स्तर, बेमौसम बारिश की मात्रा और जलभराव जैसी अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों का वैज्ञानिक डेटा आधारित विश्लेषण करती है। इसी सटीक डेटा के आधार पर यह पुख्ता अनुमान लगाया जाता है कि साल के किस विशेष मौसम में पशुओं से जुड़ी कौन सी बीमारी के तेजी से फैलने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। हालिया जुटाए गए आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण से यह बिल्कुल स्पष्ट हुआ है कि बिहार के कई हिस्सों में वर्तमान मौसम का बदलता मिजाज लम्पी स्किन डिजीज के वायरस को पनपने और एक जगह से दूसरी जगह तेजी से फैलने के लिए पूरी तरह से अनुकूल और मुफीद माहौल तैयार कर रहा है। यही वजह है कि सितंबर और अक्टूबर के महीनों को पशु स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
किसानों और पशुपालकों के लिए अत्यंत जरूरी बचाव के उपाय
चिकित्सा विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि इस जानलेवा और संक्रामक वायरस से कीमती मवेशियों को बचाने का सबसे कारगर और प्राथमिक उपाय सिर्फ और सिर्फ समय पर टीकाकरण ही है। डॉ. रामकृष्ण रॉय ने राज्य के सभी पशुपालकों से विशेष अपील की है कि वे किसी भी तरह की लापरवाही न बरतें और बिना देरी किए अपने सभी पात्र पशुओं को लम्पी स्किन डिजीज से बचाव का टीका जरूर लगवाएं। राहत की बात यह है कि वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा पशुओं को इस संभावित खतरे से सुरक्षित रखने के लिए गांव-गांव में बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन अभियान चलाया जा रहा है। किसान अपने नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सालय में संपर्क करके अपने मवेशियों के लिए यह सुविधा मुफ्त प्राप्त कर सकते हैं। प्रशासनिक स्तर पर भी सख्त निर्देश हैं; यदि किसी इलाके में पशु चिकित्सक समय पर उपलब्ध नहीं हैं या किसानों को मेडिकल मदद मिलने में कोई परेशानी आ रही है, तो वे सीधे अपने क्षेत्र के एसडीएम (SDM) या डीएम (DM) से इसकी लिखित या मौखिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके अलावा सबसे अहम सावधानी यह है कि यदि बाड़े में किसी भी पशु में बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई दें, तो संक्रमण को रोकने के लिए उसे तुरंत अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग स्थान पर बांधना चाहिए और बिना समय गंवाए विशेषज्ञ से इलाज शुरू करवाना चाहिए।

















