छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी इन दिनों भारी आंतरिक कलह और असंतोष के दौर से गुजर रही है। संगठन को राज्यभर में खड़ा करने वाले और जमीन पर संघर्ष करने वाले नेताओं का धैर्य अब जवाब दे चुका है। इसी कड़ी में पार्टी के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष उत्तम जायसवाल ने अपने पद से इस्तीफा देकर सियासी हलचल तेज कर दी है। उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए उन अंदरूनी कमियों को उजागर किया है, जो लंबे समय से संगठन के भीतर पनप रही थीं।
शीर्ष नेतृत्व और दिल्ली के नेताओं पर गंभीर आरोप
उत्तम जायसवाल ने अपना त्यागपत्र बेहद कड़े और भावुक शब्दों में लिखा है। उन्होंने सीधे तौर पर दिल्ली से आए नेताओं पर मनमानी करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि आम आदमी पार्टी की मूल विचारधारा, जिसमें संघर्ष, समानता और कार्यकर्ताओं का सम्मान शामिल था, वह अब दिल्ली से थोपे गए फैसलों और बाहरी नेताओं की पसंद-नापसंद के तले पूरी तरह दब चुकी है।
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनावों का जिक्र
अपने त्यागपत्र में उत्तम जायसवाल ने साल 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव का विशेष रूप से उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि उस चुनाव के दौरान पार्टी के वर्षों पुराने, समर्पित और संघर्षशील कार्यकर्ताओं को जिस तरह की उपेक्षा और अपमान का सामना करना पड़ा, वह बेहद पीड़ादायक था। उन्हें यह उम्मीद थी कि पार्टी चुनाव में मिली हार के बाद अपनी कार्यशैली में सुधार करेगी, लेकिन आने वाले चुनावों को लेकर भी पार्टी के पास कोई स्पष्ट रोडमैप दिखाई नहीं दे रहा है।
कार्यकर्ताओं के सम्मान और संघर्ष की बात
जायसवाल ने बेहद तीखे तेवर अपनाते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत बड़े पदों पर बैठे लोग नहीं होते, बल्कि जमीन पर पार्टी का झंडा उठाकर संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता होते हैं। यदि उन कार्यकर्ताओं का विश्वास और सम्मान ही खत्म हो जाए, तो संगठन की मजबूती केवल कागजों तक ही सिमट कर रह जाती है। सालों से पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं का स्वाभिमान लगातार आहत हो रहा है। अपने पत्र में उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि पार्टी के लिए काम करने के दौरान उन्हें 8 बार जेल की यात्रा भी करनी पड़ी थी।
संगठन के भविष्य पर मंडराता संकट
दिल्ली मॉडल का प्रचार करने वाली आम आदमी पार्टी के लिए छत्तीसगढ़ का यह सियासी घटनाक्रम किसी बड़े झटके से कम नहीं है। यदि पार्टी ने अब भी समय रहते अपने जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज नहीं सुनी, तो राज्य में उसका वजूद केवल बयानों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक ही सीमित होकर रह जाएगा।



















