अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐसा फैसला सुनाया जो लगभग सौ साल पुरानी परंपरा को पलट देता है। अब तक राष्ट्रपति किसी संघीय एजेंसी के आयुक्त को सिर्फ बेहद असाधारण हालात में ही हटा सकते थे, लेकिन अदालत ने यह बंदिश खत्म कर दी है। इस फैसले से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को क्रिप्टो समेत कई अहम नियामक क्षेत्रों पर पहले से कहीं ज्यादा ताकत मिल गई है।
अदालत की रूढ़िवादी बहुमत वाली पीठ ने 6-3 के फैसले में डेमोक्रेटिक FTC आयुक्त रेबेका स्लॉटर को हटाने के ट्रंप के अधिकार पर मुहर लगा दी। पीठ ने साफ कर दिया कि अब राष्ट्रपति को फेडरल रिजर्व के गवर्नरों को छोड़कर किसी भी एजेंसी के आयुक्त को अपनी मर्जी से हटाने का हक है।
क्रिप्टो से सीधा नाता
इस मामले का क्रिप्टो उद्योग से सीधा जुड़ाव है। रेबेका स्लॉटर के पति इंडस्ट्री की दिग्गज वेंचर कंपनी पैराडाइम में पॉलिसी के वाइस प्रेसिडेंट हैं। इसी हैसियत की वजह से यह दंपति स्लॉटर के मुकदमे को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने में आर्थिक मदद कर सका।
ट्रंप बनाम स्लॉटर का यह मुकदमा एक पुरानी परंपरा को पलटता है, जो फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट के कार्यकाल के शुरुआती सालों में बनी थी। उस व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति किसी आयुक्त को सिर्फ तभी हटा सकते थे, जब वह कर्तव्य की घोर अनदेखी या गंभीर गड़बड़ी का दोषी हो।
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस फैसले को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने सोमवार को लिखा, "सुप्रीम कोर्ट का आज का ऐतिहासिक स्लॉटर फैसला पिछले 100 सालों में राष्ट्रपति की ताकत में सबसे बड़ी बढ़ोतरी है। इतने अहम वक्त पर इतना बड़ा फैसला!"
SEC और CFTC पर नई पकड़
इस फैसले के बाद ट्रंप ही नहीं, बल्कि आने वाले राष्ट्रपति भी SEC और CFTC जैसे अहम नियामकों के आयुक्तों को किसी भी वक्त और लगभग किसी भी वजह से हटा सकेंगे। इससे कार्यपालिका को उन एजेंसियों की दिशा तय करने में बड़ी नई ताकत मिल गई है, जिन्हें लंबे समय से स्वतंत्र माना जाता रहा है।
ट्रंप पहले ही अपनी ताकत दिखा चुके हैं। उन्होंने SEC और CFTC में डेमोक्रेट सदस्यों की नियुक्ति से इनकार कर दिया है, जबकि इन दोनों एजेंसियों में अल्पसंख्यक पार्टी के दो-दो आयुक्त होने चाहिए। फिलहाल SEC में तीन रिपब्लिकन आयुक्त हैं और एक भी डेमोक्रेट नहीं, जबकि CFTC में सिर्फ एक अकेला रिपब्लिकन चेयरमैन है।
क्लैरिटी एक्ट पर टकराव
यह मुद्दा क्लैरिटी एक्ट को पास कराने की सालभर लंबी लड़ाई में टकराव की बड़ी वजह बन गया। यह विधेयक अमेरिका में ज्यादातर क्रिप्टो गतिविधियों को औपचारिक रूप से कानूनी बना देगा। सीनेट के डेमोक्रेट पहले ही जोर देकर कह चुके हैं कि वे इस कानून का समर्थन तब तक नहीं करेंगे, जब तक ट्रंप दोनों एजेंसियों में डेमोक्रेट सदस्यों की नियुक्ति का भरोसा नहीं देते। यही कानून SEC और CFTC को क्रिप्टो बाजार को नियंत्रित करने का व्यापक अधिकार देगा।
दिसंबर में ट्रंप ने इस विचार के लिए "खुला" होने की बात कही थी। लेकिन बीते छह महीनों में उन्होंने ऐसी कोई नियुक्ति नहीं की।
सोमवार का यह फैसला मामले को और उलझा देता है, क्योंकि अब ट्रंप सैद्धांतिक रूप से संघीय एजेंसियों में डेमोक्रेट सदस्यों को नियुक्त कर सकते हैं और उसके बाद किसी भी वक्त उन्हें हटा भी सकते हैं।
अगस्त की समयसीमा का दबाव
यह फैसला ऐसे वक्त आया है, जब क्लैरिटी एक्ट सालभर के उतार-चढ़ाव के बाद करो या मरो वाले निर्णायक मोड़ पर है। इस विधेयक से जुड़े ज्यादातर पक्ष मानते हैं कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों को देखते हुए इसे अगस्त की शुरुआत तक पास होना ही होगा, तभी इसके कानून बनने की कोई उम्मीद बचेगी।
नियामकों की स्वतंत्रता के अलावा भी कई मुद्दे इस कानून की राह में अड़चन बने हुए हैं। इनमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप उन नैतिकता संबंधी प्रावधानों को मंजूरी देंगे, जो उनके कई फायदेमंद क्रिप्टो कारोबारों पर रोक लगाते हैं। सीनेट के डेमोक्रेट इस भाषा को अपनी लक्ष्मण रेखा बता चुके हैं। उधर रिपब्लिकन सीनेट नेतृत्व ने आज संकेत दिया कि वह अगले महीने क्लैरिटी एक्ट पर फ्लोर वोट कराने का इरादा रखता है, फिर चाहे डेमोक्रेट तैयार हों या नहीं।













