अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीतियों को लेकर घरेलू मोर्चे पर ही बड़ा कानूनी संकट खड़ा हो गया है। डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाले कुल 25 अमेरिकी राज्यों ने मिलकर ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया है। इन राज्यों ने भारत समेत करीब 60 देशों से आयातित सामानों पर लगाए गए नए शुल्कों के फैसले को सीधे तौर पर अदालत में चुनौती दी है, जिससे राष्ट्रपति के व्यापारिक एजेंडे पर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं।
यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में याचिका दाखिल
यह कानूनी याचिका सोमवार को यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के समक्ष दायर की गई। अपनी शिकायत में इन 25 राज्यों ने तर्क दिया है कि इतने व्यापक स्तर पर शुल्क लगाने के पीछे कोई ठोस कानूनी आधार मौजूद नहीं है। साथ ही, प्रशासन की ओर से इसके पक्ष में पर्याप्त और वैध कारण भी पेश नहीं किए गए हैं। याचिका के मुताबिक, जिन 60 देशों को इस नई शुल्क नीति के दायरे में लाया गया है, उनके सामान पर मुख्य रूप से 10% या 12.5% का अतिरिक्त कर वसूला जा रहा है। ये सभी देश मिलकर अमेरिका के कुल आयात में लगभग 99.4% की बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं।
जबरन मजدूरी के तर्क पर खड़े किए गए सवाल
मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का मुख्य कहना है कि ट्रंप प्रशासन ने इन शुल्कों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जबरन मजदूरी को रोकने के बहाने से लागू किया है, लेकिन इन दोनों बातों का आपस में कोई स्पष्ट और तार्किक संबंध नहीं बनता है। उनका तर्क है कि दुनिया भर के विभिन्न देशों पर एक समान दर से शुल्क थोपने और जबरन श्रम की समस्या के समाधान के बीच कोई प्रासंगिक मेल नहीं है.
व्यापार नियमों की अनदेखी का गंभीर आरोप
राज्यों का यह भी आरोप है कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि यानी USTR ने इन 60 देशों के मामलों की जांच बेहद जल्दबाजी में पूरी कर ली। प्रत्येक देश के साथ औपचारिक और आवश्यक द्विपक्षीय चर्चाएं भी नहीं की गईं। इसके अलावा, याचिका में इस बात पर भी हैरानी जताई गई है कि अलग-अलग श्रम कानूनों और व्यापारिक नीतियों वाले देशों पर आखिर एक जैसी शुल्क दरें किस आधार पर थोप दी गईं।
कानूनी दांवपेंच और पुराना ट्रेड एक्ट
यह अदालती चुनौती ऐसे वक्त में सामने आई है जब ट्रंप प्रशासन ने पहले अदालतों में मिली नाकामी के बाद अपनी शुल्क नीति को दोबारा लागू करने के वास्ते एक अलग व्यापार कानून का सहारा लिया है। राज्यों ने अपनी दलील में स्पष्ट किया है कि प्रशासन 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 का गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहा है ताकि उन शुल्कों को फिर से जीवित किया जा सके जिनका पहले कानूनी स्तर पर कड़ा विरोध हो चुका है।
प्रभावित देश और नई शुल्क व्यवस्था
ये विवादित शुल्क गत 24 जुलाई से प्रभाव में आए हैं। इन नए शुल्कों ने डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पूर्व में शुरू किए गए ग्लोबल टैरिफ प्रोग्राम का स्थान लिया है। इस नए कदम की वजह से भारत, चीन और यूरोपीय संघ जैसे दुनिया के कई बड़े व्यापारिक साझेदार सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी खासी आलोचना की गई है। अमेरिका ने हाल ही में भारत और चीन सहित लगभग 60 देशों के खिलाफ ये शुल्क कदम उठाए थे।
प्रशासन की तरफ से किया गया बचाव
दूसरी तरफ, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने इस शासकीय फैसले का पुरजोर बचाव किया है। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि अमेरिका लंबे समय से जबरन मजदूरी के माध्यम से तैयार होने वाले सामान के आयात पर पाबंदी लगाता आया है। उन्होंने अन्य वैश्विक साझेदारों से भी ऐसी ही सख्त नीतियां अपनाने की अपील की है।



















