डेयरी किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। तमिलनाडु सरकार ने दूध के खरीद मूल्य में संशोधन करते हुए इसे 44 रुपये प्रति लीटर कर दिया है। इस ताज़ा संशोधन के बाद राज्य द्वारा घोषित कुल वृद्धि 6 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
किसानों को होगा सीधा फायदा
इस फैसले से राज्य के संगठित खरीद नेटवर्क से जुड़े 3.16 लाख से अधिक दूध उत्पादकों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा। इससे पहले खरीद मूल्य को 38 रुपये से बढ़ाकर 41 रुपये प्रति लीटर किया गया था। अब इस नवीनतम बढ़ोतरी के साथ, किसानों को उनके उत्पादन का बेहतर मूल्य मिल सकेगा। इसके अलावा, सरकार ने दूध उत्पादकों को मिलने वाले प्रोत्साहन को भी 3 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 5 रुपये प्रति लीटर कर दिया है।
बढ़ती लागत से मिल रही चुनौती
डेयरी व्यवसाय पिछले कुछ समय से काफी खर्चीला हो गया है। किसानों को पशुओं के चारे, भूसे, मजदूरी, परिवहन और पशु स्वास्थ्य देखभाल पर भारी खर्च करना पड़ रहा है। छोटे और मध्यम वर्ग के डेयरी किसानों के लिए, यदि दूध का उचित मूल्य न मिले तो उनकी कमाई पर बहुत बुरा असर पड़ता है। बढ़ी हुई खरीद दर का मुख्य उद्देश्य किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करना और उन्हें संगठित डेयरी प्रणाली से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित करना है।
सरकारी खजाने पर असर और वित्तीय बोझ
किसानों को मिलने वाली राशि बढ़ाने से निश्चित रूप से सरकार पर वित्तीय बोझ भी बढ़ता है। पहले के अनुमानों के मुताबिक, खरीद मूल्य में की गई पिछली वृद्धि से हर महीने लगभग 30 करोड़ रुपये या सालाना 360 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आने की बात कही गई थी। सरकार को किसानों की आय और राज्य के बजट के बीच संतुलन बनाकर चलना पड़ता है।
खरीद मूल्य और खुदरा कीमतों का अंतर
यह समझना जरूरी है कि दूध का खरीद मूल्य और खुदरा मूल्य एक समान नहीं होते हैं। जब किसान डेयरी सहकारी समितियों या अन्य संग्रह नेटवर्क को दूध बेचते हैं, तो उन्हें खरीद मूल्य मिलता है। दूसरी ओर, उपभोक्ता दुकानों और अन्य आउटलेट से खरीदे गए पैक किए गए या खुले दूध के लिए खुदरा मूल्य का भुगतान करते हैं। किसानों को मिलने वाली राशि में बढ़ोतरी से जरूरी नहीं कि तुरंत खुदरा कीमतों में भी उछाल आ जाए। सरकारें और डेयरी सहकारी समितियां इस अतिरिक्त लागत के एक हिस्से को खुद वहन कर सकती हैं।
आम उपभोक्ताओं और व्यावसायिक खरीदारों पर प्रभाव
यदि खरीद और अन्य परिचालन खर्च लंबे समय तक उच्च बने रहते हैं, तो अंततः उपभोक्ता कीमतों पर दबाव बन सकता है। नीति निर्माताओं के लिए यह एक कठिन संतुलन का दौर है क्योंकि किसानों को अपना व्यवसाय चलाने के लिए उचित मूल्य की आवश्यकता होती है, वहीं दूध एक दैनिक घरेलू जरूरत है इसलिए इसका सस्ता रहना भी जरूरी है। थोक मूल्य में बढ़ोतरी का मतलब यह नहीं है कि खुदरा कीमतें भी उसी अनुपात में बढ़ जाएंगी, लेकिन बड़े पैमाने पर दूध का उपयोग करने वाले व्यवसायों को आने वाले समय में अधिक लागत का सामना करना पड़ सकता है। मिठाई की दुकानें, बेकरी, रेस्तरां, चाय की थड़ियां और अन्य खाद्य व्यवसाय दूध और डेयरी उत्पादों पर बहुत अधिक निर्भर हैं। यदि इनपुट लागत में लगातार वृद्धि होती है, तो पनीर, दही, मिठाइयों, लस्सी, चाय और कॉफी जैसी चीजों के दाम प्रभावित हो सकते हैं।



















