पूर्वी एशिया के प्रागैतिहासिक इतिहास से एक बेहद विस्मयकारी खोज सामने आई है, जिसने प्राचीन जीवों के शारीरिक ढांचे को लेकर पुरानी धारणाओं को पूरी तरह पलट दिया है। चीन के पश्चिमी लियाओनिंग इलाके में स्थित यिक्सियन फॉर्मेशन की गहरी परतों से शोधकर्ताओं ने अर्ली क्रिटेशियस काल के एक अनोखे थेरिज़िनोसॉर के लगभग पूरे अस्थिपंजर को बाहर निकाला है। इस जीव को वैज्ञानिक वर्गीकरण में कायरासॉरस चांगलियेंसिस नाम से दर्ज किया गया है। प्रारंभिक माप और नमूनों की जांच से यह साफ हुआ है कि इसकी कुल लंबाई करीब 3.6 मीटर यानी 11.8 फीट के आसपास पहुंचती थी। इस शारीरिक विस्तार ने इसे अपनी संबंधित प्रजाति की शाखा में अब तक रिकॉर्ड किया गया सबसे विशालकाय नमूना बना दिया है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि किसी खूंखार मांसाहारी शिकारी जैसा डरावना आकार रखने के बावजूद यह पूरी तरह शाकाहारी था और पेड़-पौधों के सहारे अपनी जिंदगी बसर करता था।
भालू जैसी कद-काठी और मटके जैसा उभरा हुआ पेट
इस नव-खोजे गए जीव का शारीरिक स्वरूप आधुनिक विज्ञान जगत के लिए भारी विस्मय का विषय बना हुआ है। कंकाल के गहन अध्ययन से पता चलता है कि यह विचित्र प्राणी अपने पिछले दो मजबूत पैरों के सहारे बिल्कुल सीधा खड़ा होकर चलता था। इसकी त्वचा और बाह्य आवरण पर पंखों के स्पष्ट संकेत दर्ज किए गए हैं, जिसकी वजह से दूर से देखने पर इसकी रूपरेखा घने रोएं या पंखों वाले किसी विशालकाय भारी-भरकम भालू जैसी प्रतीत होती थी। इसका मध्य भाग यानी पेट का घेरा किसी मटके की भांति काफी बाहर की तरफ उभरा हुआ था, जो विशाल वनस्पति-पाचन तंत्र की ओर इशारा करता है। इसके साथ ही अत्यधिक लंबी गर्दन और आगे के हाथों में जड़े विकराल घुमावदार पंजे इसे अन्य सभी समकालीन प्राणियों की तुलना में एक असाधारण रूप प्रदान करते थे। वैज्ञानिक विश्लेषण का संकेत है कि इन भयानक दिखने वाले पंजों का इस्तेमाल किसी जीव के शिकार के लिए नहीं, बल्कि पेड़ों की ऊंची शाखाओं को नीचे खींचकर उनके घने पत्तों को नोचने के लिए किया जाता था।
जबड़े की अनोखी बनावट और 77 बारीक दांतों का रहस्य
इस कंकाल से जुड़ा सबसे चौंकाने वाला विवरण इसके मुख और जबड़े की जटिल संरचना में छिपा हुआ मिला है। शोध के अनुसार इस डायनासोर के मुंह में दांतों का एक बहुत ही असामान्य विन्यास मौजूद था। इसके ऊपरी जबड़े वाले हिस्से में 32 से अधिक दांत दर्ज किए गए, जबकि निचले जबड़े के खांचे में 45 से ज्यादा दांत समाए हुए थे। इस तरह पूरे मुख में कुल मिलाकर 77 से भी अधिक दांत पाए गए। सामान्य डायनासोर प्रजातियों की तुलना में ये दांत आकार में बेहद सूक्ष्म और छोटे थे, मगर वे एक दूसरे के साथ काफी सघनता से सटे हुए थे। इसके थूथन के समीप ऊपरी जबड़े में एक बड़ा अजीब छिद्र भी देखा गया है। इसके अतिरिक्त इसकी नासिका की हड्डी पीछे आंखों के कोटरों तक खिंची हुई थी, जो आगे चलकर दो अलग शाखाओं में विभाजित हो जाती थी। थेरिज़िनोसॉर कुल के किसी भी अन्य सदस्य में ऐसी विशिष्ट बनावट पहले कभी दर्ज नहीं की गई थी।
जेहोल बायोटा का नया कीर्तिमान और विशालकाय वजन
कायरासॉरस चांगलियेंसिस के आगमन ने प्राचीन जेहोल बायोटा पारिस्थितिकी तंत्र के तमाम पुराने पैमानों को ध्वस्त कर दिया है। 11.8 फीट से अधिक लंबे इस जीव का शारीरिक द्रव्यमान करीब 117 किलोग्राम से लेकर 274 किलोग्राम के दायरे में आंका गया है। जीवाश्म विशेषज्ञों का आकलन है कि जिस कंकाल का अध्ययन किया गया है, वह अपनी पूर्ण वयस्क अवस्था तक नहीं पहुंचा था। इसका सीधा अर्थ यह निकाला जा रहा है कि पूरी तरह परिपक्व होने पर इसका वास्तविक वजन और फैलाव इस अनुमान से भी कहीं ज्यादा रहा होगा। इस खोज के साथ ही यह जेहोल बायोटा के पर्यावरण में रहने वाला अब तक का सबसे बड़ा थेरिज़िनोसॉर घोषित हो चुका है। इसने पूर्ववर्ती रिकॉर्ड धारक बेइपियाओसॉरस को आकार की दौड़ में बहुत पीछे छोड़ दिया है, क्योंकि कायरासॉरस अपने इस पुराने रिश्तेदार की तुलना में कम से कम 1.6 गुना अधिक विशाल था।
धीमी चाल लेकिन कठोर वनस्पतियों को कुचलने की ताकत
जेहोल बायोटा के दलदली और वनीय परिवेश में विचरण करने वाले थेरिज़िनोसॉर मुख्य रूप से जीवन जीने की दो भिन्न रणनीतियों पर निर्भर थे। एक तरफ जियानचांगोसॉरस जैसे जीव आते थे, जिनका शरीर काफी छरहरा तथा हल्का था और वे खुले मैदानों में तेज रफ्तार से भागने की काबिलियत रखते थे। दूसरी तरफ कायरासॉरस और बेइपियाओसॉरस जैसी विशालकाय प्रजातियां थीं, जिनका भारी शरीर उन्हें तेज भागने की अनुमति नहीं देता था। शारीरिक रूप से धीमे होने के बदले प्रकृति ने उन्हें चबाने की असीम शक्ति दी थी। इनके भारी और चौड़े जबड़े असाधारण काटने का बल पैदा करते थे, जिसकी सहायता से वे अपने समय की सबसे कठोर, रेशेदार और सख्त वनस्पति को भी बड़ी आसानी से पीसकर निगलने में सक्षम थे।
अंगूठे का अनोखा उभार और अधूरी रह गई पहेलियां
कंकाल के ढांचे में गर्दन की कशेरुकाएं उसकी पीठ की हड्डियों से काफी ज्यादा लंबी पाई गई हैं, जो इसे ऊंचाई पर लगी पत्तियों तक सीधी पहुंच देती थीं। इसके अलावा हाथ के पंजों की हड्डी पर ऊपर की दिशा में निकला हुआ एक विशिष्ट उभार वैज्ञानिकों को मिला है। किसी भी थेरिज़िनोसॉर के पंजे में ऐसा उभार पहली बार दर्ज हुआ है, जो इसके पंजे के मुड़ने और खींचने की कार्यप्रणाली में विशेष भूमिका निभाता होगा। हालांकि जमीन के अंदर सुरक्षित हुए इस जीवाश्म से पिछले पैरों की अस्थियां गायब पाई गई हैं, जिससे इसके चलने की वास्तविक चाल और सटीक वजन वितरण का पूरा आकलन करना अभी बाकी है। इसके साथ ही खोपड़ी का हिस्सा काफी दबा हुआ और पिचका हुआ मिला है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इस क्षेत्र से मिलने वाले अतिरिक्त जीवाश्म ही इस प्रागैतिहासिक जीव के बाकी छिपे रहस्यों को पूरी तरह सुलझा सकेंगे।



















