कॉलेज का आखिरी साल एक तरफ दोस्तों की महफिल और यादों से भरा होता है, तो दूसरी तरफ जेहन में करियर को लेकर सवाल घूमते रहते हैं. जैसे-जैसे डिग्री खत्म होने में कुछ महीने बचते हैं, ज्यादातर छात्रों को सबसे पहले यही चिंता सताने लगती है कि पहली इंटर्नशिप कहां से और कैसे मिलेगी. मुश्किल तब और बढ़ जाती है जब जॉब पोर्टल पर लगभग हर लिस्टिंग में वर्क एक्सपीरियंस मांगा जाता है, जबकि फ्रेशर के पास दिखाने के लिए कोई पुराना अनुभव होता ही नहीं. यही वजह है कि बहुत से फाइनल ईयर स्टूडेंट्स समझ ही नहीं पाते कि अपनी शुरुआत आखिर कहां से करें.
राहत की बात यह है कि पहली इंटर्नशिप पाने के लिए बड़ी डिग्री या पुराना अनुभव ही सबकुछ नहीं होता. सही तरीका अपनाकर, अच्छा रिज्यूमे बनाकर और सही लोगों से नेटवर्क जोड़कर फाइनल ईयर में ही किसी अच्छी कंपनी में एंट्री मिल सकती है. इसके लिए चार आसान और असरदार तरीके अपनाए जा सकते हैं, जो कॉलेज में पढ़ाई के साथ-साथ भी अपनाए जा सकते हैं.
रिज्यूमे में प्रोजेक्ट्स और स्किल्स को दें जगह
जिन छात्रों के पास वर्क एक्सपीरियंस नहीं होता, उनका रिज्यूमे उनके कॉलेज प्रोजेक्ट्स और स्किल्स से ही अपनी पहचान बनाता है. इसलिए कॉलेज में किए गए एकेडमिक प्रोजेक्ट्स और असाइनमेंट्स को रिज्यूमे में अच्छी तरह और साफ भाषा में लिखना जरूरी है, ताकि भर्ती करने वाले को यह समझ आ सके कि छात्र ने व्यावहारिक तौर पर क्या सीखा है. अगर किसी ऑनलाइन कोर्स को पूरा किया गया है या किसी इवेंट में हिस्सा लिया गया है, तो उसका जिक्र भी रिज्यूमे में जरूर करना चाहिए, क्योंकि यह सॉफ्ट स्किल्स और सर्टिफिकेट्स को उजागर करता है और रिज्यूमे को दूसरे उम्मीदवारों से अलग बनाता है. एक और अहम बात यह है कि फ्रेशर के तौर पर रिज्यूमे सिर्फ एक पेज का ही रखना चाहिए, क्योंकि एचआर के पास हर उम्मीदवार की प्रोफाइल पढ़ने के लिए बहुत कम समय होता है और छोटा, सटीक रिज्यूमे ज्यादा असरदार साबित होता है.
लिंक्डइन पर सक्रिय रहकर बनाएं नेटवर्क
आजकल सिर्फ जॉब पोर्टल पर फॉर्म भरकर बैठ जाने से बात नहीं बनती, इसके लिए लिंक्डइन एक बड़ा हथियार बन सकता है. सबसे पहले प्रोफाइल को प्रोफेशनल लुक देना चाहिए और अपने बायो में साफ-साफ लिखना चाहिए कि किस फील्ड में इंटर्नशिप की तलाश है, ताकि प्रोफाइल देखने वाले को तुरंत अंदाजा लग जाए. इसके बाद जिस कंपनी में काम करने की इच्छा हो, वहां के एचआर और टीम लीडर्स से कनेक्शन बनाना चाहिए. इन लोगों से बातचीत शुरू करने के लिए एक छोटा और शालीन मैसेज भेजा जा सकता है, जिसमें यह बताया जाए कि उनकी कंपनी में सीखने को लेकर कितनी उत्सुकता है. इस तरह की सीधी और विनम्र पहल अक्सर एचआर का ध्यान खींच लेती है, क्योंकि हर कंपनी ऐसे उम्मीदवार को तरजीह देती है जो खुद आगे बढ़कर दिलचस्पी दिखाए.
कोल्ड ईमेल और पोर्टफोलियो से बनाएं छाप
कंटेंट राइटिंग, ग्राफिक्स, कोडिंग या मार्केटिंग जैसी फील्ड से जुड़े छात्रों के लिए अपना काम दिखाने के लिए एक छोटा पोर्टफोलियो तैयार करना काफी फायदेमंद रहता है, क्योंकि इन फील्ड में एचआर सर्टिफिकेट से ज्यादा असली काम के नमूने देखना पसंद करते हैं. कंपनियों की वेबसाइट पर मौजूद करियर्स या कॉन्टैक्ट अस पेज से ऑफिशियल ईमेल आईडी निकाली जा सकती है और वहां पोर्टफोलियो के साथ एक छोटा कवर लेटर भेजा जा सकता है. इस ईमेल में यह साफ-साफ लिखना जरूरी है कि उम्मीदवार कंपनी की किसी खास समस्या को कैसे सुलझा सकता है या उनके काम में किस तरह मदद कर सकता है, क्योंकि सामान्य और घिसे-पिटे मैसेज की जगह इस तरह की सोच-समझकर लिखी गई ईमेल एचआर पर सीधा असर डालती है और जवाब मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है.
इंटर्नशिप पोर्टल्स का सही इस्तेमाल करें
इंटर्नशाला, इंडीड और अनस्टॉप जैसे प्लेटफॉर्म फ्रेशर्स के लिए काफी मददगार साबित होते हैं, क्योंकि यहां फील्ड, लोकेशन और समयावधि के हिसाब से इंटर्नशिप ढूंढना आसान हो जाता है. शुरुआत में ज्यादा स्टाइपेंड की शर्त रखने से बचना चाहिए, क्योंकि पहला मकसद सीखना और अपने सीवी में एक अच्छी कंपनी का नाम जोड़ना होना चाहिए, न कि तुरंत ज्यादा कमाई करना. अगर किसी छोटी कंपनी या स्टार्टअप से भी सीखने का मौका मिल रहा हो, तो उसे हाथ से जाने नहीं देना चाहिए, क्योंकि छोटी टीमों में अक्सर ज्यादा जिम्मेदारी और सीखने के मौके मिलते हैं, जो आगे चलकर बड़े मौकों की नींव बन जाते हैं.
कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ इंटर्नशिप करना आगे चलकर काफी फायदेमंद साबित होता है. इससे न सिर्फ प्रैक्टिकल अनुभव मिलता है, बल्कि रिज्यूमे में एक ठोस एंट्री भी जुड़ जाती है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि डिग्री पूरी होने के बाद पहली फुल टाइम नौकरी ढूंढना काफी आसान हो जाता है, क्योंकि उस वक्त उम्मीदवार के पास दिखाने के लिए असली वर्क एक्सपीरियंस मौजूद होता है.



















