MBBS फर्स्ट ईयर में बार-बार अटकने वाले स्टूडेंट्स के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम आदेश दिया है, जिसमें साफ कर दिया गया है कि किसी भी हाल में पहले साल को पास करने के लिए चार बार से ज्यादा मौका नहीं मिलेगा। हर साल लाखों स्टूडेंट्स नीट यूजी की परीक्षा में बैठते हैं और उनमें से मुट्ठीभर को ही सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट मिल पाती है, इसलिए दाखिला मिलना ही अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है। लेकिन कोर्ट के इस फैसले ने साबित कर दिया है कि सीट मिल जाने के बाद भी तय समय में पढ़ाई पूरी करना उतनी ही जरूरी शर्त है।
अदालत ने क्या तय किया
इस याचिका पर जस्टिस फिरदौस पी. पूनीवाला और जस्टिस आर. आई. चागला की दो-सदस्यीय बेंच ने सुनवाई की और व्यवस्था दी कि MBBS का कोई भी छात्र फर्स्ट ईयर पास करने के लिए ज्यादा से ज्यादा चार साल या चार मौके ही इस्तेमाल कर सकता है। बेंच ने यह भी साफ किया कि यह गिनती विषय के हिसाब से अलग-अलग नहीं होती, यानी किस मौके में छात्र ने कौन सा विषय दिया या किसे छोड़ा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, कुल मिलाकर चार मौकों के बाद रास्ता बंद हो जाता है। कोर्ट का यह रुख इतना स्पष्ट है कि आगे किसी भी छात्र के लिए अलग से राहत मांगने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है।
मामला कहां से शुरू हुआ
यह विवाद महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज यानी एमयूएचएस में अगस्त 2023 में दाखिला लेने वाली एक छात्रा से जुड़ा है। नीट में अच्छे अंक लाने के बावजूद उसे फर्स्ट ईयर की पढ़ाई खत्म करने में तय समय से कहीं ज्यादा वक्त लग गया। छात्रा ने एनाटॉमी को छोड़कर बाकी सभी विषयों के इंटरनल असेसमेंट पूरे कर लिए थे, यानी क्लास वर्क और प्रैक्टिकल के मोर्चे पर वह पीछे नहीं थी, मगर एनाटॉमी की थ्योरी परीक्षा में वह हर बार अटक जा रही थी। जब यह सिलसिला लगातार चलता रहा तो यूनिवर्सिटी ने उसे आगे परीक्षा में बैठने से रोक दिया, जिसके बाद वह इस फैसले को चुनौती देने बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गई।
छात्रा की दलील और अदालत ने उसे क्यों नहीं माना
छात्रा ने कोर्ट में यह तर्क रखा कि उसने सिर्फ एनाटॉमी का पर्चा तीन बार दिया है, इसलिए नियम के हिसाब से इसी विषय में उसे एक और यानी चौथा मौका मिलना चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन के ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन 2023 के रेगुलेशन 21 का हवाला देते हुए यह दलील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि नियम सबके लिए एक जैसे लागू होते हैं और चार मौके पूरे होने के बाद किसी भी परिस्थिति में पांचवां मौका देने की गुंजाइश नहीं बचती, चाहे छात्र ने किसी एक विषय में कम बार परीक्षा क्यों न दी हो।
MBBS की कुल अवधि और NMC के नियम
देश में MBBS का पूरा कोर्स साढ़े पांच साल का होता है, इसमें साढ़े चार साल क्लासरूम और लैब की पढ़ाई तथा एक साल की अनिवार्य रोटेटरी इंटर्नशिप शामिल है। नेशनल मेडिकल कमीशन के 2023 में हुए संशोधन के मुताबिक इंटर्नशिप सहित पूरी डिग्री खत्म करने के लिए किसी भी छात्र को अधिकतम दस साल का समय दिया जाता है। मगर यह दस साल की छूट पूरे कोर्स के लिए है, फर्स्ट ईयर अकेले के लिए नहीं। फर्स्ट ईयर पार करने के लिए सिर्फ चार साल या चार मौके ही तय हैं, और इसमें नाकाम रहने वाले छात्र को कोर्स से पूरी तरह बाहर यानी डिबार कर दिया जाता है, भले ही उसके पास दस साल की समयसीमा में अभी काफी वक्त बचा हो।
मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए जरूरी सबक
इस फैसले से एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि फर्स्ट ईयर में किसी भी विषय की परीक्षा में बैठना ही एक अटेंप्ट गिना जाता है, अलग-अलग विषयों के नाम पर अलग से चार-चार मौके नहीं मिलते। ऐसे में अगर किसी स्टूडेंट की एनाटॉमी, फिजियोलॉजी या बायोकेमिस्ट्री जैसे किसी भी विषय में बैक लग रही हो, तो देर किए बिना कॉलेज के प्रोफेसरों से रेमेडियल या एक्स्ट्रा क्लास की मांग करनी चाहिए, ताकि तय सीमा के भीतर ही यह अड़चन दूर हो सके। अब जब कोर्ट का रुख इतना स्पष्ट हो चुका है, स्टूडेंट्स के लिए यह उम्मीद रखना मुश्किल होगा कि अदालत से किसी अपवाद के तौर पर अतिरिक्त मौका मिल जाएगा।



















