देशभर के चिकित्सा छात्रों के बीच चर्चा का केंद्र बने नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट पोस्टग्रेजुएट यानी नीट पीजी की दोबारा परीक्षा आयोजित करने की मांग को लेकर सर्वोच्च अदालत ने एक कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने पूरे देश में फिर से परीक्षा कराने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है। इसके साथ ही याचिका दाखिल करने वाले पक्ष पर पच्चीस हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया गया है। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालती व्यवस्था और जनहित याचिकाओं के नाम पर देश की परीक्षा प्रणाली को बाधित करने या प्रक्रिया को अटकाने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती है।
याचिकाकर्ताओं की मंशा पर उठे गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज यानी एनबीईएमएस के वकील ने पीठ के सामने एक महत्वपूर्ण तथ्य रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि याचिका दायर करने वाले तीन व्यक्तियों में से दो नोएडा और पंजाब के रहने वाले हैं। इनमें से कोई भी उस समस्या से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं हुआ था, जिसका हवाला देकर पूरे देश में री-एग्जाम की मांग की जा रही थी। यह जानकारी सामने आते ही न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने याचिकाकर्ता के वकील से सीधा सवाल किया कि क्या याचिकाकर्ता खुद इस परीक्षा में भाग ले रहे हैं। नकारात्मक जवाब मिलने पर पीठ ने बेहद कड़े शब्दों में आपत्ति जताई और कहा कि क्या बिना किसी औचित्य के हर बड़ी परीक्षा में याचिका दायर करना एक आदत बन चुकी है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि इस तरह की बेबुनियाद मुकदमेबाजी से देश के बहुमूल्य समय और संसाधनों की भारी बर्बादी होती है।
जयपुर और अन्य केंद्रों की तकनीकी गड़बड़ियों का मामला
याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से दलील दी गई थी कि जयपुर के सीतापुरा स्थित आईओएन डिजिटल जोन केंद्रों पर बिजली गुल हो जाने की वजह से लगभग ढाई हजार डॉक्टर अपनी परीक्षा पूरी नहीं कर पाए थे। आरोप लगाया गया कि केवल जयपुर ही नहीं बल्कि देश के चौतीस अलग-अलग परीक्षा केंद्रों पर इसी तरह की तकनीकी परेशानियां सामने आई थीं। इसके आधार पर मई 2025 के उस आदेश के उल्लंघन का दावा किया गया जिसमें नीट पीजी परीक्षा को एक ही पाली में संपन्न कराने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, एनबीईएमएस ने अदालत को स्पष्ट किया कि पूरे देश में कुल एक हजार एक सौ ग्यारह परीक्षा केंद्र बनाए गए थे, जिनमें से सिर्फ जयपुर के दो केंद्रों पर अचानक बिजली कटने से परीक्षा में रुकावट आई थी। बोर्ड ने संवेदनशीलता दिखाते हुए इन प्रभावित ढाई हजार उम्मीदवारों के लिए पांच सितंबर को एक अलग परीक्षा आयोजित करने का निर्णय पहले ही ले लिया था। जब प्रभावित परीक्षार्थियों की इस समस्या का समाधान पहले ही किया जा चुका है, तो पूरे देश में दोबारा परीक्षा कराने का कोई तार्किक आधार नहीं बनता है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया को भेजा जाएगा मामला
सर्वोच्च अदालत ने केवल याचिका को खारिज करके ही इतिश्री नहीं की, बल्कि वकीलों के आचरण को लेकर भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। पीठ ने कहा कि अदालत के समय का दुरुपयोग करने और इस प्रकार की प्रायोजित मुकदमेबाजी को बढ़ावा देने से जुड़े इस प्रकरण को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के समक्ष उठाया जाएगा। इससे वकीलों द्वारा बिना किसी ठोस आधार के इस तरह की अर्जियां दाखिल करने की प्रवृत्ति पर प्रभावी रोक लग सकेगी। इस निर्णय के माध्यम से शीर्ष अदालत ने यह संदेश दे दिया है कि छोटी-मोटी तकनीकी या प्रशासनिक बाधाओं के नाम पर संपूर्ण परीक्षा तंत्र को बार-बार संकट में नहीं डाला जा सकता। जयपुर में बिजली कटौती से प्रभावित हुए ढाई हजार छात्र पांच सितंबर को अपनी री-टेस्ट प्रक्रिया में शामिल हो रहे हैं, जबकि देश के बाकी लाखों अभ्यर्थियों के लिए दोबारा परीक्षा का विकल्प अब समाप्त हो चुका है और वे अपनी आगामी काउंसलिंग प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं。



















