यह कोई पेपर लीक या परीक्षा हॉल का मामूली फर्जीवाड़ा नहीं है। यह उन सपनों के बिखरने की कहानी है जो कभी अपने राज्य और जिले की टॉपर लिस्ट में सबसे ऊपर चमके थे। NEET यूजी री-टेस्ट 2026 के दौरान बिहार के लखीसराय में पुलिस ने जब एक अंतरराज्यीय सॉल्वर गिरोह का पर्दाफाश किया, तो गिरफ्तार चेहरों ने सबको हैरान कर दिया। इस गिरोह में कोई पेशेवर अपराधी नहीं, बल्कि देश के नामी मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों के छात्र और कभी स्टेट टॉपर रह चुकीं दो बेटियां थीं, झारखंड की पूनम कुमारी और पलामू की चंचल कुमारी।
किसी पेशेवर अपराधी के जुर्म पर समाज ज्यादा नहीं चौंकता। लेकिन जब टॉप कॉलेज में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स और बोर्ड परीक्षा के होनहार टॉपर ही सॉल्वर गिरोह के मोहरे बन जाएं, तो साफ है कि खराबी सिर्फ परीक्षा व्यवस्था में नहीं, हमारे सामाजिक और आर्थिक ढांचे में भी है। कानून इन बच्चों को सलाखों के पीछे भेज देगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारा सिस्टम टूटते सपनों, महंगी पढ़ाई और आर्थिक तंगी में घिरे इन युवाओं को कोई सुरक्षित रास्ता दे पाएगा।
तीन बार की नाकामी और घर की गरीबी ने तोड़ दिया
पूनम कुमारी साल 2021 में झारखंड की 12वीं साइंस टॉपर रही थीं। उनके पिता हर महीने 7,000 रुपये वाराणसी भेजते थे ताकि बेटी BHU से बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई कर सके। लेकिन तीन बार NEET देने के बाद भी सफलता न मिलना, महंगी कोचिंग का खर्च और घर की गरीबी ने मिलकर पूनम पर इतना मानसिक और आर्थिक दबाव डाला कि वह शॉर्टकट के खतरनाक रास्ते पर चल पड़ीं। पढ़ाई का बहाना बनाकर वह सात महीने से घर तक नहीं गई थीं। आखिरकार वह मधुप्रिया नाम की एक कैंडिडेट की जगह परीक्षा देने लखीसराय पहुंच गईं।
चंचल कुमारी की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। साल 2016 में पलामू की जिला टॉपर बनीं चंचल इस वक्त ओडिशा के एक सरकारी आयुर्वेदिक कॉलेज में BAMS के फाइनल ईयर की छात्रा हैं। उनके दो भाई आयुर्वेद चिकित्सक हैं और वे अपनी बहन को भी डॉक्टर बनते देखना चाहते थे। लेकिन चंद रुपयों के लालच या किसी शातिर के बहकावे में आकर चंचल ने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी। वह नंदनी राज नाम की असली परीक्षार्थी की जगह डमी कैंडिडेट बनकर परीक्षा हॉल में बैठी थीं।
कैसे चलता है सॉल्वर सिंडिकेट का खेल
लखीसराय एसपी प्रेरणा कुमार के मुताबिक यह खेल सिर्फ परीक्षा हॉल में बैठकर पेपर हल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था में अंदरूनी मिलीभगत वाला एक बहुत बड़ा सिंडिकेट है। इसकी कई परतें हैं।
- फर्जी पहचान पत्र: डमी अभ्यर्थियों को परीक्षा केंद्रों में एंट्री दिलाने के लिए सबसे पहले उनके फर्जी पहचान पत्र और आधार कार्ड तैयार किए जाते हैं, जिन पर चेहरा डमी कैंडिडेट का होता है और नाम असली छात्र का।
- बायोमेट्रिक में सेंध: इस फर्जीवाड़े का सबसे डरावना पहलू यह है कि जांच के दौरान पुलिस ने 18 बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन कर्मचारियों को भी गिरफ्तार किया है। यानी उंगलियों के निशान मिलाने वाले कर्मचारी ही गिरोह से मिले हुए थे।
- अंतरराज्यीय जाल: शुरुआती जांच में गिरोह के तार बिहार, झारखंड, दिल्ली, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक जुड़े मिले हैं। गिरफ्तार लोगों में दिल्ली, मधेपुरा और मुजफ्फरपुर के कई नामी मेडिकल छात्र भी शामिल हैं।
परिवारों के लिए कभी न मिटने वाला दर्द
इस फर्जीवाड़े ने परीक्षा की शुचिता तो भंग की ही है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा कई हंसते-खेलते परिवारों के गर्व और प्रतिष्ठा को हमेशा के लिए मिट्टी में मिला दिया है। पूनम के पिता बालेश्वर प्रसाद राणा अपनी बेटी के इस कृत्य से इतने आहत और हैरान हैं कि उन्होंने कैमरे के सामने रोते हुए कहा कि उनकी बेटी ने घर और पूरे गांव की इज्जत मिट्टी में मिला दी, और वह अब उससे जेल में मिलने तक नहीं जाएंगे। उधर चंचल के भाई भी समझ नहीं पा रहे कि उनकी बहन इस दलदल में आखिर कैसे फंस गई।
आखिर क्यों खिंच रहे हैं मेधावी छात्र इस दलदल की ओर
शिक्षाविदों और जानकारों का मानना है कि इसके पीछे कई वजहें हैं। पहली वजह है NEET जैसी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कोचिंग सेंटरों की लाखों रुपये की फीस। दूसरी, मेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों में एडमिशन मिल जाने के बाद भी हॉस्टल, किताबों और रहने का खर्च उठाना गरीब या मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है। जब इन छात्रों के सामने पैसों की किल्लत आती है, तो सॉल्वर गिरोह के मास्टरमाइंड इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं। वे इन चमकते दिमागों को चंद रुपयों या तुरंत अमीर बनने का लालच देकर अपनी ढाल बना लेते हैं, और होनहार छात्र अंजाम सोचे बिना इस चक्रव्यूह में फंस जाते हैं।













