छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में पारंपरिक फसलों से अलग हटकर सब्जियों की उन्नत बागवानी किसानों के जीवन में बड़ा बदलाव ला रही है। यहां के कृषक अब बैंगन की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं क्योंकि यह कम लागत और बहुत कम समय में तैयार होकर बंपर पैदावार देने की क्षमता रखती है। बस्तर के किसान फरसु कश्यप ने केवल आधे एकड़ जमीन पर बैंगन लगाकर शानदार मुनाफा कमाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। उनका अनुभव बताता है कि इस फसल में अन्य सब्जियों की तुलना में कीट और बीमारियों का खतरा काफी कम रहता है, जिससे यह आर्थिक दृष्टिकोण से बेहद सुरक्षित और फायदेमंद साबित होती है।
खेत की जुताई से लेकर पौधों की रोपाई का सटीक तरीका
बैंगन की भरपूर पैदावार लेने के लिए खेत की मिट्टी की तैयारी सबसे महत्वपूर्ण चरण मानी जाती है। इसके लिए सबसे पहले जमीन की दो से तीन बार अच्छी तरह जुताई की जाती है और फिर मिट्टी को पूरी तरह भुरभुरी बनाने के लिए रोटावेटर चलाया जाता है। भूमि समतल होने के बाद व्यवस्थित क्यारियां या बेड तैयार किए जाते हैं। इसके उपरांत नर्सरी में पहले से तैयार स्वस्थ पौधों की रोपाई की जाती है। कतारबद्ध रोपण के दौरान एक बेड से दूसरे बेड के बीच की दूरी 2 फीट रखी जाती है, जबकि पौधे से पौधे के बीच 1 फीट का फासला तय किया जाता है। भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने और पौधों के समुचित विकास के लिए गोबर की सड़ी खाद के साथ सुपर फॉस्फेट, पोटाश और यूरिया का संतुलित इस्तेमाल किया जाता है।
लागत, बाजार भाव और तीन महीने तक निरंतर कमाई
रोपाई के महज एक महीने बाद ही बैंगन के पौधे फल देना आरंभ कर देते हैं और यह उत्पादन का चक्र लगातार तीन महीने तक चलता रहता है। फरसु कश्यप के मुताबिक यदि बाजार में बैंगन का न्यूनतम भाव 10 रुपये प्रति किलो भी मिले, तब भी किसान घाटे में नहीं रहता और मुनाफा कमा लेता है। वर्तमान में मंडियों में बैंगन की दर 30 रुपये प्रति किलो तक चल रही है। उन्होंने अपने आधे एकड़ रकबे में बैंगन की फसल तैयार करने में 30 हजार से 70 हजार रुपये तक की लागत लगाई है, जिससे उन्हें 1 से 2 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हासिल होने की मजबूत उम्मीद है।
रोग नियंत्रण और आवश्यक देखभाल
सामान्य तौर पर बैंगन की फसल में प्राकृतिक रूप से गंभीर बीमारियों का असर बेहद सीमित रहता है। इसके बावजूद समय पर निगरानी रखना बेहद जरूरी होता है। कभी-कभार पत्ता छेदक कीट का प्रकोप देखने को मिलता है, जिसके लक्षण नजर आते ही समय रहते कीटनाशक का संतुलित छिड़काव करना होता है ताकि पौधों की पत्तियों और फलों को नुकसान से बचाया जा सके।



















