छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के एक युवा सागर कश्यप ने खेती के साथ-साथ पार्ट टाइम के रूप में देसी मुर्गी पालन अपनाकर बेहतरीन कमाई का जरिया तैयार किया है। उन्होंने इस काम की शुरुआत मात्र तीन मुर्गियों के साथ की थी और आज उनके पास करीब 200 मुर्गे मौजूद हैं। इस व्यवसाय की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें लगातार निगरानी की आवश्यकता नहीं पड़ती है, बल्कि दिन में केवल दो बार सुबह और शाम को दाना-पानी देने से ही काम चल जाता है।
कम लागत और अधिक मुनाफा
सागर कश्यप के अनुभव के मुताबिक, देसी नस्ल की मुर्गियों में बीमारियों का खतरा काफी कम होता है और इनका स्वाद भी बेहतर माना जाता है, जिसके कारण बाजार में इनकी भारी मांग बनी रहती है। खासकर लड़ाई वाले मुर्गों की बस्तर के स्थानीय बाजारों में भारी डिमांड है, जिससे उन्हें बहुत अच्छा मुनाफा मिल जाता है। इन विशेष मुर्गों की कीमत बाजार में 1500 से 2000 रुपये तक मिल जाती है।
व्यवसाय का विस्तार और उत्पादन प्रक्रिया
वे वर्तमान समय में 200 मुर्गों का सफलतापूर्वक पालन-पोषण कर रहे हैं और अब तक लगभग 100 मुर्गे बेच भी चुके हैं। इसके अलावा, कुछ मुर्गों को खासतौर पर लड़ाई के लिए तैयार किया जा रहा है। उनके फार्म पर ही ब्रूडिंग यूनिट की भी व्यवस्था की गई है, जहां अंडे देने वाली मुर्गियों के लिए आरामदायक घोंसले और सही तापमान का पूरा ध्यान रखा जाता है।
लागत और कुल कमाई का गणित
एक चूजे से लेकर बिक्री के लिए तैयार होने तक मुर्गी को पांच से छह महीने का समय लगता है। एक मुर्गी को पालने और उसे खिलाने में कुल मिलाकर लगभग 150 रुपये की लागत आती है, जिसे बाद में बाजार में 500 से 600 रुपये तक के मुनाफे के साथ बेच दिया जाता है। मुर्गियों की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए उन्हें हर प्रकार का पौष्टिक चारा दिया जाता है। सागर कश्यप अब तक 50,000 से 60,000 रुपये तक के मुर्गों की बिक्री कर चुके हैं और राहत की बात यह है कि उनके फार्म के मुर्गों में अभी तक किसी भी गंभीर बीमारी का संक्रमण देखने को नहीं मिला है। यह उनके लिए एक अतिरिक्त कमाई का साधन बन चुका है जो खेती के साथ आसानी से चल रहा है।





















