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घाटकवाली में नयाखानी के बाद गेड़ी देव अनुष्ठान, बीमारियों से बचाव के लिए अनूठी पूजाछत्तीसगढ़
19 सित॰ 2026, 1:09 pm (36 मिनट पहले)· 0

घाटकवाली में नयाखानी के बाद गेड़ी देव अनुष्ठान, बीमारियों से बचाव के लिए अनूठी पूजा

बस्तर के घाटकवाली में नई फसल के स्वागत पर्व नयाखानी के तुरंत बाद गेड़ी देव की विशेष पूजा की गई, जिसका मकसद गांव को निरोगी रखना और सुख-शांति लाना है।

बस्तर अंचल में नई फसल के आगमन पर मनाए जाने वाले उत्सवों का अपना अलग धार्मिक और सामाजिक महत्व है। जिले के घाटकवाली क्षेत्र में नई धान की बालियां तैयार होने के बाद नयाखानी पर्व का आयोजन किया गया, जिसमें ग्रामीणों ने कुदरत का आभार व्यक्त किया और खुशहाल जीवन की कामना की। इस पूरे उत्सव चक्र में सबसे पहले घाट जात्रा आयोजित की जाती है, जिसके पूर्ण होने पर नयाखानी का अनुष्ठान संपन्न होता है। नयाखानी के तत्काल बाद घाटकवाली के बाशिंदों ने अपनी पारंपरिक रस्म के तहत गेड़ी देव की विशेष सेवा-अर्जी की।

गांव की सेहत और समृद्धि के लिए सेवा-अर्जी

घाटकवाली में गेड़ी देव की यह रस्म सदियों से गांव की खुशहाली, अमन-चैन और लोगों को तमाम व्याधियों से महफूज रखने की नीयत से निभाई जाती है। इस अनुष्ठान के जरिए समूचा ग्रामीण समाज एक साथ मिलकर यह प्रार्थना करता है कि बस्ती में किसी भी तरह की संक्रामक या गंभीर बीमारी का साया न पड़े। समुदाय के लोगों का मानना है कि सामूहिक प्रार्थना और पूर्वजों की यह रीत पूरे इलाके को विपदाओं से बचाती है।

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चावल, मक्का और अंडे अर्पित कर की गई विशेष पूजा

इस अनुष्ठान के दौरान गेड़ी को बेहद आदर और सलीके के साथ स्थापित किया जाता है। पूजा की शुरुआत सबसे पहले परंपरा अनुसार पुजारी द्वारा विधि-विधान से सेवा-अर्जी देकर की जाती है। ग्रामीण अपने-अपने घरों से गेड़ी लेकर पूजा स्थल पर जमा होते हैं। गांव के पटेल लच्छू कश्यप के मुताबिक, यह विधान खासतौर पर गांव को खुजली समेत अन्य चर्म और मौसमी बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए आयोजित किया जाता है। अनुष्ठान के क्रम में लोग गेड़ी समर्पित करते हैं और उसके समक्ष चावल, मक्का, अंडा तथा पैसे चढ़ाकर गांव के निरोगी रहने की गुहार लगाते हैं। पूजा की सारी रस्में पूरी होने के बाद सभी ग्रामीण एक साथ पारंपरिक नृत्य में हिस्सा लेते हैं।

पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ा रही नई पीढ़ी

स्थानीय निवासी श्याम सुंदर ने इस विधान के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि गेड़ी देव अनुष्ठान की शुरुआत उनके बुजुर्गों और पूर्वजों के दौर में हुई थी। मौजूदा पीढ़ी अब उसी विरासत को पूरी आस्था के साथ आगे बढ़ा रही है। उनका कहना है कि वे बिना किसी चूक के पूरे धार्मिक नियमों और विधि-विधान से यह पूजा संपन्न करते हैं, जिससे गांव हमेशा रोगों से मुक्त रहे और हर परिवार में खुशहाली बनी रहे।

सवाल-जवाब

गेड़ी देव अनुष्ठान बस्तर के किस गांव में आयोजित किया जाता है?
यह विशेष अनुष्ठान बस्तर जिले के घाटकवाली गांव में आयोजित किया जाता है।
यह पूजा किस अवसर पर और किस पर्व के बाद की जाती है?
यह पूजा नई धान की बालियां आने पर मनाए जाने वाले नयाखानी पर्व के तुरंत बाद की जाती है।
नयाखानी से पहले कौन सा आयोजन संपन्न होता है?
नयाखानी पर्व मनाने से पहले घाट जात्रा का आयोजन किया जाता है।
गेड़ी देव की सेवा-अर्जी में क्या-क्या सामग्री अर्पित की जाती है?
इस पूजा में गेड़ी के समक्ष चावल, मक्का, अंडा और पैसे अर्पित किए जाते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार इस रस्म का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य गांव में सुख-शांति बनाए रखना और लोगों को खुजली जैसी बीमारियों से दूर रखना है।
पूजा की शुरुआत किसके द्वारा की जाती है?
गेड़ी देव की पूजा में सबसे पहले सेवा-अर्जी गांव के पुजारी द्वारा विधि-विधान से की जाती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 मिनट पहले

बस्तर के घाटकवाली में नयाखानी के बाद गेड़ी देव का यह अनुष्ठान केवल लोक-संस्कृति का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समुदायों की पारंपरिक सार्वजनिक स्वास्थ्य रक्षा प्रणाली का एक जीवंत दस्तावेज है। आधुनिक चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुदूर अंचलों तक सुनिश्चित करने के साथ-साथ, स्थानीय स्तर पर इस तरह की सामूहिक प्रथाएं सामाजिक एकजुटता और मानसिक सुरक्षा का बड़ा संबल बनती हैं। कानून-व्यवस्था और प्रशासन को भी ऐसे क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचा मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि अंधविश्वास से बचा जा सके और पारंपरिक आस्थाओं का सम्मान भी बना रहे।

Rohan Verma@rohan-verma·8 मिनट पहले

यह अनुष्ठान दर्शाता है कि किस प्रकार सुदूर बस्तर के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य संकटों से निपटने के लिए पारंपरिक लोक पद्धतियां सदियों से कार्यरत हैं। यद्यपि यह सांस्कृतिक आस्था का विषय है, तथापि यह प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संकेत भी है कि इन क्षेत्रों में चर्म और मौसमी बीमारियों की रोकथाम के लिए चिकित्सा चौकियों की सुदृढ़ व्यवस्था और नियमित स्वास्थ्य शिविरों का संचालन अति आवश्यक है, जिससे लोक-विश्वास और आधुनिक विज्ञान के बीच बेहतर तालमेल बिठाया जा सके।

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