बस्तर अंचल में नई फसल के आगमन पर मनाए जाने वाले उत्सवों का अपना अलग धार्मिक और सामाजिक महत्व है। जिले के घाटकवाली क्षेत्र में नई धान की बालियां तैयार होने के बाद नयाखानी पर्व का आयोजन किया गया, जिसमें ग्रामीणों ने कुदरत का आभार व्यक्त किया और खुशहाल जीवन की कामना की। इस पूरे उत्सव चक्र में सबसे पहले घाट जात्रा आयोजित की जाती है, जिसके पूर्ण होने पर नयाखानी का अनुष्ठान संपन्न होता है। नयाखानी के तत्काल बाद घाटकवाली के बाशिंदों ने अपनी पारंपरिक रस्म के तहत गेड़ी देव की विशेष सेवा-अर्जी की।
गांव की सेहत और समृद्धि के लिए सेवा-अर्जी
घाटकवाली में गेड़ी देव की यह रस्म सदियों से गांव की खुशहाली, अमन-चैन और लोगों को तमाम व्याधियों से महफूज रखने की नीयत से निभाई जाती है। इस अनुष्ठान के जरिए समूचा ग्रामीण समाज एक साथ मिलकर यह प्रार्थना करता है कि बस्ती में किसी भी तरह की संक्रामक या गंभीर बीमारी का साया न पड़े। समुदाय के लोगों का मानना है कि सामूहिक प्रार्थना और पूर्वजों की यह रीत पूरे इलाके को विपदाओं से बचाती है।
चावल, मक्का और अंडे अर्पित कर की गई विशेष पूजा
इस अनुष्ठान के दौरान गेड़ी को बेहद आदर और सलीके के साथ स्थापित किया जाता है। पूजा की शुरुआत सबसे पहले परंपरा अनुसार पुजारी द्वारा विधि-विधान से सेवा-अर्जी देकर की जाती है। ग्रामीण अपने-अपने घरों से गेड़ी लेकर पूजा स्थल पर जमा होते हैं। गांव के पटेल लच्छू कश्यप के मुताबिक, यह विधान खासतौर पर गांव को खुजली समेत अन्य चर्म और मौसमी बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए आयोजित किया जाता है। अनुष्ठान के क्रम में लोग गेड़ी समर्पित करते हैं और उसके समक्ष चावल, मक्का, अंडा तथा पैसे चढ़ाकर गांव के निरोगी रहने की गुहार लगाते हैं। पूजा की सारी रस्में पूरी होने के बाद सभी ग्रामीण एक साथ पारंपरिक नृत्य में हिस्सा लेते हैं।
पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ा रही नई पीढ़ी
स्थानीय निवासी श्याम सुंदर ने इस विधान के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि गेड़ी देव अनुष्ठान की शुरुआत उनके बुजुर्गों और पूर्वजों के दौर में हुई थी। मौजूदा पीढ़ी अब उसी विरासत को पूरी आस्था के साथ आगे बढ़ा रही है। उनका कहना है कि वे बिना किसी चूक के पूरे धार्मिक नियमों और विधि-विधान से यह पूजा संपन्न करते हैं, जिससे गांव हमेशा रोगों से मुक्त रहे और हर परिवार में खुशहाली बनी रहे।





















