शिक्षक दिवस के विशेष अवसर पर आज हम बात कर रहे हैं बिलासपुर की एक ऐसी अनूठी शिक्षिका की, जिन्होंने प्राचीन भाषा को बढ़ावा देने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है। शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखते हुए इसे संस्कारों और जीवन मूल्यों से जोड़ने का कार्य बिलासपुर की रहने वाली पुष्पा दीक्षित बखूबी कर रही हैं। वह पिछले 26 वर्षों से लगातार बच्चों को संस्कृत की निशुल्क तालीम दे रही हैं। उनकी इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां अध्ययन करने के लिए केवल छत्तीसगढ़ या देश के अन्य प्रांतों से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी छात्र खींचे चले आते हैं। सीमित साधनों के बावजूद उनका यह संकल्प है कि देश का हर बच्चा संस्कृत से जुड़े और भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों से रूबरू हो सके। उन्होंने विद्यार्थियों के रहने के लिए निशुल्क छात्रावास और भोजन का पूरा इंतजाम भी किया है।
शासकीय सेवा से सेवानिवृत्ति से पहले शुरू की थी अनूठी संस्था
अपनी इस यात्रा के बारे में जानकारी देते हुए पुष्पा दीक्षित बताती हैं कि उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए कॉलेज में अध्यापन कार्य किया था। अपनी सेवानिवृत्ति की अवधि पूरी होने से पहले ही उन्होंने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए अपनी संस्था की नींव रख दी थी। वर्ष 2000 से वह लगातार बच्चों को संस्कृत पढ़ाती आ रही हैं। बीते 26 वर्षों के इस सफर में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने उनके पास आकर ज्ञान अर्जित किया है। उनका कहना है कि आज भी उनके पास प्रतिदिन कई फोन आते हैं और अभिभावक अपने बच्चों को संस्कृत सीखने के लिए यहां भेजना चाहते हैं। हालांकि, उपलब्ध जगह और संसाधनों की कमी के चलते उन्होंने अपने छात्रावास में विद्यार्थियों की संख्या अधिकतम 24 तक सीमित रखी है। वर्तमान समय में छोटे बच्चों सहित लगभग 20 से 24 छात्र यहां रहकर संस्कृत की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
रहने और खाने की मुफ्त व्यवस्था के साथ शिक्षा का प्रसार
पुष्पा दीक्षित का दृढ़ विश्वास है कि शिक्षा पर हर किसी का अधिकार होना चाहिए और किसी भी बच्चे को आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई से वंचित नहीं होना पड़ना चाहिए। इसी सामाजिक सोच के साथ वह बच्चों को बिना किसी शुल्क के संस्कृत सिखाती हैं। विद्यार्थियों के आवास और भोजन का खर्च भी पूरी तरह से मुफ्त रखा गया है। शुरुआती दिनों को याद करते हुए वह बताती हैं कि शुरुआत में बच्चे उनके पुराने आवास में ही रहा करते थे। जैसे-जैसे विद्यार्थियों की संख्या में इजाफा हुआ और जगह की कमी महसूस हुई, तब उन्होंने अपने पुराने मकान को गिराकर एक समर्पित छात्रावास का निर्माण करवाया। आज इसी निर्मित छात्रावास में दूरदराज के क्षेत्रों से आए छात्र रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं।
संस्कृत भाषा को लेकर लोगों के मन में बैठे डर पर चर्चा करते हुए उनका कहना है कि इस भाषा को कठिन समझना बिल्कुल गलत है। उनके अनुसार हिंदी, छत्तीसगढ़ी, मराठी और गुजराती सहित तमाम भारतीय भाषाओं में संस्कृत के शब्द और उनका गहरा प्रभाव रचे-बसे हैं। यही कारण है कि संस्कृत हमारे लिए कोई अलग या पराई भाषा नहीं, बल्कि हमारी तमाम भाषाओं और संस्कृति की मुख्य जड़ है। उनका मानना है कि संस्कृत पढ़ने से केवल शब्दों का ज्ञान नहीं मिलता, बल्कि प्राचीन भारतीय ऋषियों के गहन चिंतन, दर्शन और जीवन मूल्यों को समझने का अनमोल अवसर भी प्राप्त होता है।
देश का हर बच्चा पढ़े संस्कृत और वीडियो के जरिए प्रसार
लगातार 26 वर्षों तक अध्यापन कार्य करने के बाद भी पुष्पा दीक्षित का सफर और उनका लक्ष्य अभी थमा नहीं है। उनकी प्रबल इच्छा है कि भारत का बच्चा-बच्चा संस्कृत भाषा का अध्ययन करे। इसी मुख्य उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए वह अपने ज्ञान और शिक्षा को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहती हैं। अब तक वह लगभग 52 पुस्तकों की रचना कर चुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने अपनी शिक्षण सामग्री को वीडियो के माध्यम से भी जन-जन तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। उनका यह निरंतर प्रयास है कि उनकी तैयार की गई सारी सामग्री YouTube पर बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध रहे, ताकि उनके बाद भी आने वाली पीढ़ियों तक संस्कृत की यह महान विद्या आसानी से पहुंचती रहे।
अमेरिका से बिलासपुर संस्कृत सीखने पहुंच रहे छात्र
पुष्पा दीक्षित के इस अनूठे शिक्षण केंद्र की ख्याति अब सीमाओं को लांघ चुकी है। यहां केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि विदेशी धरती से भी विद्यार्थी ज्ञान की प्यास बुझाने आते हैं। अमेरिका से आकर यहां संस्कृत की शिक्षा ले रहे छात्र यथार्थ मकवाणा अपने अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि उनके माता-पिता की इच्छा थी कि उन्हें ऐसी शिक्षा मिले जो जीवन को देखने का एक नया और विस्तृत दृष्टिकोण दे। यथार्थ के मुताबिक, संस्कृत उन्हें हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा से जुड़ने का मौका देती है। उनका कहना है कि पुष्पा दीक्षित जैसी विदुषी से संस्कृत सीखने का अवसर मिलना उनके जीवन का एक बहुत ही खास अनुभव रहा है। यहां उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ भोजन और रहने की सुविधाएं पूरी तरह निशुल्क मिलती हैं।
संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाना ही एकमात्र लक्ष्य
यथार्थ आगे बताते हैं कि संस्कृत दरअसल भारतीय ज्ञान के उस विशाल भंडार की चाबी है, जिसे पाकर भारतीय संस्कृति और परंपराओं की असली गहराई को समझा जा सकता है। इसलिए उनका अपना व्यक्तिगत लक्ष्य भी यही है कि वे पूरी लगन से संस्कृत सीखकर इस ज्ञान को दुनिया के अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं। शिक्षक दिवस के इस खास अवसर पर पुष्पा दीक्षित का यह जीवन और उनका यह संघर्ष उन सभी शिक्षकों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो शिक्षा को केवल आजीविका का साधन नहीं बल्कि समाज और संस्कृति को आपस में जोड़ने का एक मजबूत माध्यम मानते हैं। बिलासपुर की छोटी सी शुरुआत से शुरू हुआ यह कारवां अब देश के विभिन्न कोनों और विदेशों तक अपनी गहरी छाप छोड़ चुका है।


















