पाकिस्तान की सियासी फिजाओं में इन दिनों एक गहरा भूचाल आता दिखाई दे रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में सुलगती असंतोष की चिंगारियां अब सीधे सत्ता के शीर्ष केंद्रों तक जा पहुंची हैं। एक समय देश के दूरदराज के इलाकों तक सीमित रहने वाला आक्रोश अब पाकिस्तान के सबसे बड़े पावर सेंटर यानी सेना के हेडक्वार्टर और राष्ट्रपति भवन की दहलीज पर दस्तक दे चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देश की हुकूमत में एक बार फिर तख्ता पलट के हालात तेजी से बन रहे हैं, और यह जंग दो ऐसे पक्षों के बीच है जो हर हाल में देश की बागडोर अपने हाथों में रखना चाहते हैं।
रावलपिंडी और इस्लामाबाद के बीच खिंची तलवारें
मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट के संस्थापक अल्ताफ हुसैन के एक सनसनीखेज दावे ने पूरे राजनीतिक गलियारे में हड़कंप मचा दिया है। उनके अनुसार, देश की ताकतवर फौज और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के दरमियान परदे के पीछे एक भीषण और खामोश जंग जारी है। नए राज्यों के गठन की जिद और 28वें संविधान संशोधन को लेकर उपजा विवाद पाकिस्तान को एक ऐसे दोराहे पर ले आया है जहां से या तो सीधे मार्शल लॉ लागू होगा या फिर देश को भयंकर राजनीतिक पतन का सामना करना पड़ेगा।
पाकिस्तानी सियासत का यह पुराना दस्तूर रहा है कि वहां की जनता द्वारा चुनी गई सरकारें हमेशा वर्दीधारी जनरलों के इशारों पर ही कदम उठाती हैं। लेकिन इस बार रावलपिंडी और राष्ट्रपति भवन के बीच दूरियां इतनी अधिक बढ़ चुकी हैं कि प्रशासनिक नियंत्रण नियंत्रण से बाहर होता नजर आ रहा है।
अल्ताफ हुसैन ने अपने 462वें टिकटॉक वीडियो संदेश के जरिए यह दावा किया है कि सेना प्रमुख और राष्ट्रपति जरदारी के आपसी संबंध इस वक्त सबसे नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। परदे के पीछे एक ऐसा सियासी खेल खेला जा रहा है जो किसी भी पल मौजूदा नागरिक सरकार को धराशायी कर सकता है। इस बार लड़ाई केवल सत्ता की कुर्सी पर काबिज रहने की नहीं है, बल्कि पूरे देश का भूगोल और संविधान बदलने की फौजी सनक का परिणाम है।
लंदन में हुई गुप्त बैठक और कड़ा संदेश
इस खामोश संघर्ष की परतें उधेड़ते हुए अल्ताफ हुसैन ने कई गंभीर और तीखे सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने मुख्य रूप से यह मुद्दा उठाया कि जब देश के संविधान और सीमाओं में बड़े पैमाने पर फेरबदल की रूपरेखा तैयार की जा रही है, तब देश के राष्ट्रपति हफ्तों से विदेश में क्यों डेरा डाले हुए हैं। राष्ट्रपति जरदारी पहले अपने बेटे बिलावल जरदारी के विवाह समारोह के सिलसिले में ऑस्ट्रिया की यात्रा पर गए थे और उसके बाद से वे लगातार लंदन में ही रुके हुए हैं।
अल्ताफ हुसैन का कहना है कि हाल ही में लंदन की धरती पर पाकिस्तान के संघीय गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने राष्ट्रपति से मुलाकात की थी। यह कोई सामान्य शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि बंद दरवाजों के पीछे करीब एक घंटे तक चली बेहद गोपनीय बैठक थी। इस गुप्त मंत्रणा के दौरान गृह मंत्री ने रावलपिंडी के उच्च सैन्य नेतृत्व का एक अत्यंत सख्त और दो टूक संदेश राष्ट्रपति तक पहुंचाया। इसी गोपनीय संदेश के आदान-प्रदान के बाद से राजधानी इस्लामाबाद से लेकर रावलपिंडी तक का सियासी पारा काफी चढ़ गया है।
नए सूबों का फॉर्मूला और मुहाजिरों को निशाना बनाने की रणनीति
मौजूदा समय में पाकिस्तान के भीतर नए प्रशासनिक प्रांत और राज्य बनाने के प्रस्ताव पर बहस छिड़ी हुई है। अल्ताफ हुसैन के मुताबिक, इस संवेदनशील मुद्दे को सबसे पहले गृह मंत्री और सैन्य जनसंपर्क विभाग के महानिदेशक ने ही हवा दी थी। सेना की मंशा पूरे देश में नए सूबे सृजित कर अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत करने की है, लेकिन इस पूरी सोची-समझी योजना का ठीकरा बड़ी चालाकी से मुहाजिर समुदाय के सिर पर फोड़ा जा रहा है।
अल्ताफ हुसैन ने सीधा इल्जाम लगाया है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी सिंध प्रांत के भीतर जानबूझकर सांप्रदायिक नफरत और तनाव का माहौल पैदा करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर से सीधे तौर पर अपील की है कि वे मुहाजिर आबादी की सुरक्षा और उनकी जायज मांगों को नजरअंदाज न करें। इसके अतिरिक्त, आगामी 28वें संविधान संशोधन के जरिए नए प्रांत बनाने की पूरी बिसात बिछाई जा रही है, ठीक उसी तरह जैसे इससे पहले 26वें और 27वें संशोधनों को पारित कराने के लिए राजनीतिक दलों के बीच जमकर सौदेबाजी और बोलियां लगी थीं।
मार्शल लॉ की आहट और सरकार पर मंडराता खतरा
सैन्य नेतृत्व और राष्ट्रपति के बीच बढ़ता यह टकराव देश को एक गंभीर संवैधानिक संकट की खाई में धकेल रहा है। अल्ताफ हुसैन ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि दोनों पक्षों ने आपसी बातचीत के जरिए इस गतिरोध को जल्द हल नहीं किया, तो लोकतंत्र का जो थोड़ा-बहुत ढांचा बचा है वह भी पूरी तरह नेस्तनाबूद हो जाएगा।
इस राजनीतिक गतिरोध के अंत के केवल दो ही संभावित रास्ते नजर आते हैं। पहला विकल्प यह है कि देश में एक बार फिर प्रत्यक्ष फौजी शासन यानी मार्शल लॉ थोप दिया जाए। दूसरा विकल्प यह है कि राष्ट्रपति जरदारी और उनकी कैबिनेट को चलता करके सत्ता किसी कठपुतली अंतरिम सरकार को सौंप दी जाए। पाकिस्तान का संपूर्ण इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब-जब रावलपिंडी के जनरलों और इस्लामाबाद के हुक्मरानों के बीच ठनी है, तब-तब जीत हमेशा बंदूकों की ही हुई है। यही वजह है कि विश्लेषक मान रहे हैं कि देश में एक बार फिर तख्ता पलट की उल्टी गिनती का आरंभ हो चुका है।
सिंध से लेकर बलूचिस्तान तक फैली अशांति
एक तरफ जहां रावलपिंडी के गलियारों में सत्ता हथियाने का खेल चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के बड़े और अहम सूबे बगावत की आग में जल रहे हैं। सिंध प्रांत के भीतर सेना और सिंधी राष्ट्रवादी संगठनों के बीच तकरार अपने चरम बिंदु पर पहुंच चुकी है। अल्ताफ हुसैन ने आगाह किया है कि अगर स्थानीय राष्ट्रवादियों और सैन्य बलों के बीच यह खूनी संघर्ष इसी तरह जारी रहा, तो पूरा सिंध प्रांत बड़े पैमाने पर हिंसा और नागरिक अशांति की चपेट में समा जाएगा।
दूसरी ओर, बलूचिस्तान के मौजूदा हालात किसी से छिपे नहीं हैं। वहां पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और बलूच स्वतंत्रता सेनानियों के बीच आए दिन भीषण संघर्ष हो रहा है। अल्ताफ हुसैन ने हुक्मरानों को आईना दिखाते हुए दो टूक कहा कि बलूच अवाम की आवाज को केवल गोलियों और अत्याचार के बल पर दबाया नहीं जा सकता। यदि उनकी बुनियादी समस्याओं को राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखकर उन्हें उनके अधिकार नहीं दिए गए, तो स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो जाएगी।


















