छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग दशकों तक बारूदी सुरंगों, खूनी संघर्ष और अशांति के साए में जीने को मजबूर रहा था। कभी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा संकट माना जाने वाला यह इलाका अब पूरी तरह शांति और बुनियादी विकास की ओर लौट आया है। सरकार द्वारा चलाए गए चौतरफा अभियानों के बाद 31 मार्च 2026 को पूरे क्षेत्र को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया। इसी ऐतिहासिक बदलाव के साक्षी के तौर पर दीपावली के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बस्तर का दौरा किया। देश के शीर्ष नेतृत्व का यह आगमन इस बात का स्पष्ट संकेत था कि बस्तर अब डर और बंदूकों का ठिकाना नहीं, बल्कि प्रगति और सुरक्षा का मजबूत आधार बन चुका है।
गृह मंत्री अमित शाह ने भी यहां चलाए गए निर्णायक सुरक्षा अभियान 'ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट' की पूर्ण सफलता के बाद सीधे इलाके में पहुंचकर जवानों और कमांडरों से मुलाकात की थी। बस्तर के घने जंगलों में सुरक्षा बलों ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया, उसी का नतीजा है कि इस इलाके ने रेड कॉरिडोर की पुरानी पहचान को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया है। केंद्र और राज्य की साझा रणनीति के तहत 24 अगस्त 2024 से 31 मार्च 2026 के बीच एक व्यापक मिशन मोड अभियान संचालित किया गया था, जिसका एकमात्र लक्ष्य अशांत जंगलों से हथियारबंद कैडरों की उपस्थिति को समाप्त करना और दशकों से बुनियादी सुविधाओं से वंचित आदिवासियों तक सरकारी योजनाएं पहुंचाना था।
हिंसा का खूनी इतिहास और भारी जनहानि
बस्तर और आसपास के जंगलों में नक्सली हिंसा की जड़ें बेहद गहरी थीं। आंकड़ों के मुताबिक, अकेले साल 2010 में ही 1936 बड़े आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें सुरक्षा बलों पर अचानक किए गए घातक हमले और बारूदी विस्फोट शामिल थे। उस अकेले वर्ष में 720 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई थी। वर्ष 2014 तक के रिकॉर्ड को देखा जाए तो देश भर में वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी 17542 आक्रामक और हिंसक घटनाएं सामने आई थीं। इन भीषण हमलों में सुरक्षा बलों के 1913 वीर जवान ड्यूटी के दौरान शहीद हुए, जबकि लगभग 5000 आम नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
नक्सली संगठनों की ताकत का मुख्य जरिया हथियार और गोला-बारूद की लूट थी। उनके पास मौजूद हथियारों में से लगभग 92 प्रतिशत हथियार पुलिस, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और सीएपीएफ के कैंपों व गश्ती दलों पर हमला करके लूटे गए थे। शेष हथियार अवैध रास्तों से तस्करी के जरिए जंगलों तक पहुंचाए जाते थे। इस हथियारबल के दम पर उग्रवादी संगठन अंदरूनी गांवों में समानांतर सत्ता चलाते थे और विकास कार्यों में बाधा डालते थे। स्कूल भवनों, पुल-पुलियों और संचार टावरों को उड़ाना उनकी नियमित रणनीति का हिस्सा बन चुका था ताकि बस्तर का इलाका बाहरी दुनिया से हमेशा कटा रहे।
रणनीति में बुनियादी बदलाव और विशाल वित्तीय संसाधन
साल 2015 में केंद्र सरकार ने वामपंथी उग्रवाद से निपटने की पूरी नीति में व्यापक बदलाव किया। यह स्पष्ट कर दिया गया कि सुरक्षा चुनौतियों से सख्ती से निपटा जाएगा, लेकिन साथ ही साथ विकास कार्यों को दोगुनी गति से आगे बढ़ाया जाएगा। केवल हथियारों से मुकाबला करने के बजाय नक्सलियों की आपूर्ति श्रृंखला, वित्तीय नेटवर्क और युवाओं के शोषण पर रोक लगाने की बहुआयामी योजना बनाई गई। इस बदलाव को प्रभावी बनाने के लिए भारी वित्तीय निवेश की व्यवस्था की गई।
सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के संतुलन को साधने के लिए 4289 करोड़ रुपये की विशेष केंद्रीय सहायता मंजूर की गई। इसके अलावा बस्तर और आसपास के क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के मद में 1761 करोड़ रुपये की अलग से स्वीकृति दी गई। सुरक्षा ढांचे को आधुनिक बनाने और सुरक्षा बलों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए वर्ष 2014-15 के दौरान लगभग 3805 करोड़ रुपये की धनराशि जारी की गई थी। इस बजटीय सहयोग ने सुरक्षा तंत्र को आधुनिक हथियारों, निगरानी उपकरणों और आवागमन के साधनों से पूरी तरह लैस कर दिया।
जमीनी सुरक्षा ग्रिड और आधुनिक तकनीक का संयोजन
रणनीतिक बदलाव के बाद बस्तर के कोने-कोने में सुरक्षा ग्रिड तैयार करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। वर्ष 2014 से पहले इस दुर्गम इलाके में केवल 66 पुलिस स्टेशन कार्यरत थे, जिनकी संख्या बढ़ाकर 663 नए पुलिस स्टेशनों तक पहुंचाई गई। इसके साथ ही केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) के 408 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए। इन कैंपों की स्थापना ऐसे स्थानों पर की गई, जिन्हें पहले नक्सलियों की अभेद्य मांद माना जाता था। आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं, त्वरित रसद आपूर्ति और सैन्य आवाजाही के लिए 68 ऐसे आधुनिक हेलीपैड बनाए गए, जहां रात के समय भी सुरक्षित लैंडिंग की सुविधा उपलब्ध है।
बारूदी सुरंगों और आईईडी के खतरों से जवानों को बचाने के लिए 400 से अधिक बुलेटप्रूफ और ब्लास्ट प्रूफ वाहन सुरक्षा बलों को सौंपे गए। इसके अलावा स्थानीय ग्रामीणों और सुरक्षा बलों के समय पर इलाज के लिए बड़े आधुनिक अस्पताल तैयार किए गए। सुरक्षा तंत्र को हाई-टेक बनाते हुए मानवरहित विमानों यानी यूएवी, ड्रोन कैमरों, सैटेलाइट इमेजरी और एआई आधारित डेटा विश्लेषण की मदद ली गई। वैज्ञानिक कॉल लॉग विश्लेषण, लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम और सोशल मीडिया निगरानी के जरिए नक्सलियों के मूवमेंट की सटीक जानकारियां पहले ही जुटा ली जाती थीं।
सिलसिलेवार ऑपरेशन और 'ब्लैक फॉरेस्ट' का निर्णायक प्रहार
खुफिया तंत्र और सुरक्षा बलों के संयुक्त तालमेल के तहत कई बड़े अभियान शुरू किए गए। सबसे पहले 'ऑपरेशन चक्रबंधा' और उसके बाद 'ऑपरेशन भीमबर्ग' के जरिए नक्सलियों के घेरे को तोड़ा गया। इसके उपरांत अधिक आक्रामक रुख अपनाते हुए 'ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म', 'ऑपरेशन डबल बुल' और फिर 'ऑपरेशन ऑक्टोपस' को अंजाम दिया गया। इन अभियानों ने नक्सलियों के सुरक्षित पनाहगाहों को असुरक्षित बना दिया और उनकी संगठनात्मक ताकत को बिखेर दिया।
इस पूरे दौर का सबसे निर्णायक मोड़ 'ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट' साबित हुआ। नक्सलियों के शीर्ष कमांडरों ने सुरक्षा बलों पर लगातार घात लगाकर हमले करने की योजना बनाई थी, लेकिन 'ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट' ने उनकी कमर पूरी तरह तोड़ दी। इस अकेले अभियान के दौरान 30 खूंखार नक्सलियों को मार गिराया गया, जबकि लगभग 3000 सक्रिय नक्सलियों ने सुरक्षा बलों के सामने हथियार डालकर आत्मसमर्पण कर दिया। इस अभियान ने साबित कर दिया कि घने जंगलों के भीतर भी अब कोई कोना देश के सुरक्षा बलों की पहुंच से बाहर नहीं है।
वित्तीय घेराबंदी और जांच एजेंसियों की सख्त कार्रवाई
नक्सलवाद के खात्मे के लिए केवल जमीनी मुठभेड़ें ही काफी नहीं थीं, बल्कि उनके अवैध आर्थिक स्रोतों को नष्ट करना अनिवार्य था। राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने लेवी वसूली और हवाला सिंडिकेट पर कड़ा प्रहार किया। एनआईए द्वारा दिसंबर 2025 तक नक्सलियों की लगभग 40 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्तियां जब्त की गईं। इसके साथ ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में करीब 12 करोड़ रुपये की संपत्तियों को कुर्क किया।
राज्य पुलिस और राज्य जांच एजेंसियों ने भी त्वरित कार्रवाई करते हुए लगभग 40 करोड़ रुपये की विभिन्न संपत्तियों को जब्त करने में सफलता पाई। इस पूरी अवधि के दौरान 111 वामपंथी उग्रवादी मामलों की विस्तृत जांच की गई। एनआईए के पास स्वयं 112 मामले पहुंचे, जिनमें से 100 मामलों में अदालतों के समक्ष पुख्ता आरोप पत्र दाखिल किए जा चुके हैं। इस कठोर कानूनी व वित्तीय शिकंजे ने नक्सलियों की हथियार खरीदने और नए लड़ाके भर्ती करने की क्षमता को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
पुनर्वास की मानवीय नीति और मुख्यधारा में वापसी
सरकार की नीति केवल उग्रवादियों को समाप्त करने की नहीं थी, बल्कि भटके हुए युवाओं को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की भी थी। इसके लिए गृह मंत्रालय ने एक बेहद आकर्षक और मानवीय आत्मसमर्पण नीति तैयार की। उच्च रैंक वाले कैडरों को आत्मसमर्पण करते ही 5 लाख रुपये की तत्काल एकमुश्त सहायता राशि देने का प्रावधान किया गया। अन्य स्तर के कैडरों को 2.5 लाख रुपये की वित्तीय मदद तय की गई। इसके अतिरिक्त मुख्यधारा में शामिल होने वाले हर कैडर को 26 महीने तक 10 हजार रुपये का मासिक भत्ता और हथियार सौंपने पर 50 हजार रुपये की अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि दी गई।
आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व नक्सलियों को केवल नकद राशि देकर नहीं छोड़ा गया, बल्कि उनके कौशल विकास, शिक्षा, सुरक्षित आवास और स्थायी आजीविका की पूरी व्यवस्था की गई। इस नीति का व्यापक असर देखने को मिला। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024 में 3977 नक्सली कैडरों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया। वहीं वर्ष 2025 में 2337 कैडरों ने अपने हथियार डाल दिए। 24 अगस्त 2024 से 31 मार्च 2026 तक चले इस अभियान के दौरान बस्तर संभाग में अकेले 3000 आत्मसमर्पण करने वालों का सफल पुनर्वास किया गया। आत्मसमर्पण का सबसे बड़ा सामूहिक दृश्य 28 जुलाई 2026 को सामने आया जब 16 नक्सलियों ने रांची में अपने हथियार छोड़े। इसी क्रम में 39 जुलाई 2026 को बीजापुर पुलिस स्टेशन में लाखों के इनामी 8 बड़े नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर कानून के समक्ष सिर झुका दिया।
सड़क संपर्क, डिजिटल तंत्र और स्थानीय युवाओं की भागीदारी
नक्सली हिंसा के दौर में सबसे बड़ा खतरा आईईडी विस्फोट थे, जहां उग्रवादी सड़कों के नीचे 100 किलोग्राम या उससे अधिक वजनी विस्फोटक छिपाकर गश्ती वाहनों को उड़ा देते थे। इस चुनौती से पार पाते हुए सरकार ने 15189 किलोमीटर सड़कों के निर्माण का महत्वाकांक्षी खाका तैयार किया। प्रधानमंत्री के दौरे के समय तक बस्तर में 3240 किलोमीटर से अधिक पक्की सड़कों का जाल बिछाया जा चुका था। इन सड़कों के बनने से दूरदराज के गांव बाजारों, स्कूलों, अस्पतालों और प्रशासनिक कार्यालयों से जुड़ गए।
इलाके में सैकड़ों नए मोबाइल टावर स्थापित किए गए, जिससे पहले कटे रहने वाले जंगलों में 4जी और डिजिटल कनेक्टिविटी पहुंची। गांवों में डिजिटल शिक्षा के साधन पहुंचाए गए और बायोमेट्रिक व बैंकिंग एटीएम की स्थापना से आदिवासियों को घर के पास बैंकिंग सुविधाएं मिलने लगीं। इस ऐतिहासिक परिवर्तन में स्थानीय आदिवासियों की भूमिका सबसे अहम रही। छत्तीसगढ़ पुलिस के डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) ने स्थानीय भूगोल की समझ का बेजोड़ उपयोग किया। वर्ष 2017 में गठित 1143 जवानों वाली 'बस्तरिया बटालियन' ने सुरक्षा बलों की ताकत में भारी इजाफा किया। इसके साथ ही बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा के 400 स्थानीय युवाओं की भर्ती ने सुरक्षा बलों को अंदरूनी खुफिया नेटवर्क में अजेय बना दिया।
लाल गलियारे से विकास के राजमार्ग तक का सफर
एक समय ऐसा था जब देश के 136 जिले नक्सल हिंसा से गंभीर रूप से प्रभावित माने जाते थे। केंद्र सरकार, सुरक्षा बलों और स्थानीय जनता के साझा प्रयासों से अब प्रभावित जिलों की संख्या घटकर शून्य हो चुकी है। छह दशकों से चला आ रहा हिंसक गन कल्चर पूरी तरह समाप्त हो चुका है और उसकी जगह स्कूल, अस्पताल, खेलकूद के मैदान और व्यापारिक मंडियां ले चुकी हैं। बस्तर अब किसी डर का पर्याय नहीं, बल्कि पूरे देश के सामने आंतरिक सुरक्षा और समावेशी विकास की सबसे बड़ी मिसाल बनकर उभरा है।



















