रोशनी के महापर्व दीवाली पर हर घर को जगमगाने के लिए लोग विभिन्न प्रकार के तेलों से दीये जलाते हैं। इस बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में महुआ के फल से तैयार किए जाने वाले पारंपरिक देसी टोरा तेल की बिक्री में जबरदस्त तेजी देखने को मिल रही है। जगदलपुर के स्थानीय बाजारों में इस तेल को खरीदने और बेचने के लिए खरीदारों और विक्रेताओं की खासी भीड़ उमड़ रही है। इस पारंपरिक तेल की मांग को पूरा करने के लिए स्थानीय ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी व्यापारी और विक्रेता बस्तर पहुंचे हैं। बाजार में यह शुद्ध तेल 140 से 150 रुपये प्रति लीटर के भाव पर उपलब्ध कराया जा रहा है, जिसे लोग हाथों-हाथ खरीद रहे हैं।
ओडिशा से जगदलपुर बाजार में टोरा तेल बेचने पहुंचीं जेमा कश्यप बताती हैं कि ओडिशा का टोरा तेल अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए बेहद प्रसिद्ध माना जाता है। इस विशेष तेल को तैयार करने की प्रक्रिया काफी पारंपरिक है, जिसमें सबसे पहले महुआ के फलों से रस निकाला जाता है और फिर उससे तेल तैयार किया जाता है। मौजूदा समय में खुले बाजारों में इस तेल की कीमत 140 से 150 रुपये प्रति लीटर के आसपास चल रही है। विक्रेताओं के मुताबिक, यह तेल सामान्य खाद्य और दीप जलाने वाले अन्य तेलों की तुलना में काफी गाढ़ा होता है, जो इसकी शुद्धता और गुणवत्ता को और बढ़ाता है।
महंगाई के इस दौर में जहां आम लोग रसोई और पूजा के तेलों के बढ़ते दामों से परेशान हैं, वहीं टोरा तेल एक किफायती विकल्प बनकर उभरा है। वर्तमान में बाजार में सरसों का तेल 250 रुपये प्रति लीटर और तिल का तेल 300 रुपये प्रति लीटर की ऊंची कीमतों पर बिक रहा है। इसके विपरीत, देसी टोरा तेल केवल 150 रुपये प्रति लीटर के किफायती रेट पर आसानी से मिल जाता है। तेल का कारोबार करने वाले व्यापारियों का दावा है कि महंगे तेलों के मुकाबले इस पारंपरिक तेल से जलाए जाने वाले दीये काफी लंबे समय तक बिना बुझे जलते रहते हैं, जिससे त्योहारी खर्च भी नियंत्रित रहता है।
बस्तर संभाग में पारंपरिक रूप से दीये प्रज्वलित करने के लिए लंबे समय से टोरा तेल का ही उपयोग करने की पुरानी परंपरा रही है। इस प्राकृतिक तेल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह दीये में डालने पर बहुत लंबी अवधि तक जलता है और बत्ती पूरी तरह जलने तक धीरे-धीरे और नियंत्रित रूप से खत्म होता है। जानकारों और विक्रेताओं का मानना है कि तेल जितना अधिक शुद्ध और परिष्कृत होगा, दीया उतनी ही अधिक देर तक प्रकाश फैलाता रहेगा। यही वजह है कि दीवाली के पावन अवसर पर इस पारंपरिक उत्पाद की मांग में हर साल भारी बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
केवल दीये जलाने के काम ही नहीं, बल्कि बस्तर क्षेत्र की स्थानीय संस्कृति में इस बहुउपयोगी तेल के कई अन्य पारंपरिक इस्तेमाल भी जुड़े हुए हैं। दीवाली के इन खास दिनों में क्षेत्र के कुछ लोग इस तेल का पारंपरिक तौर पर अपने हाथों और पैरों पर मालिश के लिए भी उपयोग करते हैं। इसके अलावा, बस्तर के कुछ पारंपरिक घरों में इस तेल का इस्तेमाल खाने में सब्जी बनाने के लिए भी किया जाता है, जो इसे इस क्षेत्र की संस्कृति और खानपान का एक अहम हिस्सा बनाता है।



















