छत्तीसगढ़ की प्राचीन और पारंपरिक काष्ठ कला अब ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वावलंबन और आय का एक मजबूत साधन बनती जा रही है। बस्तर जिले के अंतर्गत आने वाले बकावंड ब्लॉक के कोकपाल गांव की रहने वाली इंदुमती रावणा इस दिशा में एक बेहतरीन मिसाल पेश कर रही हैं। वह लकड़ी के टुकड़ों पर बेहद खूबसूरत और बारीक नक्काशी करके आदिवासी संस्कृति की झलक दिखाने वाली कलाकृतियां और देवी-देवताओं की मूर्तियां तैयार कर रही हैं। एक विशेष समूह से जुड़कर वह न सिर्फ अपनी इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि अपनी कड़ी मेहनत के बल पर आर्थिक रूप से भी काफी सशक्त हो रही हैं।
लकड़ी को तराशकर तैयार करती हैं मनमोहक मूर्तियां
लकड़ी पर कलाकारी करने की इस पूरी प्रक्रिया के बारे में इंदुमती रावणा बताती हैं कि मूर्तियों को गढ़ने के लिए सबसे पहले लकड़ी को आरा मिल से मंगाया जाता है। इसके पश्चात जरूरत और डिजाइन के अनुसार उस लकड़ी के बड़े टुकड़ों को काटा जाता है और एक शुरुआती आकार दिया जाता है। फिर गोल लकड़ी के हिस्सों पर बहुत ही छोटे और धारदार औजारों की सहायता से नक्काशी का काम शुरू किया जाता है। चाहे आदिवासी संस्कृति को दर्शाती हुई कलाकृतियां हों या फिर विघ्नहर्ता भगवान गणेश की प्रतिमा, हर एक मूर्ति को बनाने में अत्यधिक परिश्रम और बारिकी की जरूरत होती है।
पेंसिल के स्केच से शुरू होती है निर्माण प्रक्रिया
किसी भी मूर्ति को मुकम्मल रूप देने का सफर कागज या सीधे लकड़ी पर ड्राइंग बनाने से शुरू होता है। उदाहरण के लिए भगवान गणेश की प्रतिमा को ही लें, तो सबसे पहले लकड़ी की सतह पर पेंसिल की सहायता से उसका आउटलाइन या ढांचा उकेरा जाता है। इसके बाद विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे छेनी और हथौड़े जैसे औजारों का इस्तेमाल करके धीरे-धीरे लकड़ी के फालतू हिस्सों को हटाया जाता है और अंत में उसे एक मूर्त रूप दिया जाता है। इस पूरी कलात्मक प्रक्रिया में घंटों की कड़ी मेहनत और धैर्य की आवश्यकता होती है।
आकार और मोटाई के हिसाब से तय होती है मूर्तियां की कीमत
अपनी इस कमाई और मुनाफे के बारे में इंदुमती रावणा का कहना है कि इन सुंदर मूर्तियों के निर्माण में लकड़ी और अन्य जरूरी सामग्री की अपनी लागत आती है। इसके बाद कुल मेहनत और लागत को ध्यान में रखते हुए उन्हें मुनाफे का सीधा आधा हिस्सा मिलता है। इन तैयार की गई मूर्तियों की बिक्री मूल्य पूरी तरह से उनके आकार, लंबाई, मोटाई और चौड़ाई पर निर्भर करती है। बाजार में एक छोटी मूर्ति की कीमत लगभग 2,500 रुपये तक होती है, जबकि थोड़ी बड़ी और भारी मूर्तियां 3,000 रुपये या उससे भी अधिक दामों पर बिकती हैं। इंदुमती रावणा की यह प्रेरणादायक कहानी साबित करती है कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध पारंपरिक कलाएं ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का बेहतरीन द्वार खोल सकती हैं, जिससे वे अपने हुनर के दम पर अपनी आर्थिक स्थिति सुधार रही हैं।



















