मार्च 1959 की एक रात तिब्बत की राजधानी ल्हासा से एक आम सैनिक जैसा दिखने वाला शख्स भारी भीड़ के बीच से चुपचाप निकल गया. यह शख्स कोई मामूली इंसान नहीं बल्कि तिब्बती जनता के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो थे. चीन की फौज उनका पीछा कर रही थी और किसी भी वक्त उन्हें पकड़ सकती थी. तीन हफ्तों की मुश्किल यात्रा के बाद वे भारत की सीमा पर पहुंचे, जहां से उनकी जिंदगी और तिब्बत का इतिहास दोनों पूरी तरह बदल गए.
भागने की वो रात
17 मार्च 1959 को नेचुंग ओरेकल से सलाह ली गई, जो तिब्बती परंपरा में एक अहम भूमिका निभाता है. सलाह में साफ इशारा मिला कि दलाई लामा को फौरन तिब्बत छोड़ देना चाहिए. उस रात 10 बजने में कुछ मिनट बाकी थे, जब दलाई लामा एक आम सैनिक की वेशभूषा में लोगों की बड़ी भीड़ से अनजान बनकर निकल गए. कुछ ही देर बाद उनका परिवार और करीबी सहयोगी भी उनके साथ हो गए. ल्हासा से निकलने के तीन हफ्ते बाद, यानी 31 मार्च 1959 को दलाई लामा और उनका दल भारत की सीमा पर पहुंच गया. भारतीय फौज ने उन्हें अपनी सुरक्षा में लेकर देश के भीतर पहुंचाया.
तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा कौन हैं
6 जुलाई 1935 को तिब्बत के एक छोटे से गांव तक्तसेर में जन्मे तेनजिन ग्यात्सो तिब्बती समाज के आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों मामलों के प्रमुख माने जाते हैं. तिब्बती परंपरा के मुताबिक, महज दो साल की उम्र में उन्हें 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के तौर पर पहचान मिली थी. मान्यता है कि दलाई लामा करुणा के बोधिसत्व का अवतार होते हैं, जो जनता की सेवा के लिए बार-बार जन्म लेते हैं. ‘दलाई लामा’ शब्द का मतलब है ‘ज्ञान का सागर’, जबकि तिब्बती लोग उन्हें प्यार से येशिन नोरबू यानी ‘इच्छा पूरी करने वाला रत्न’ भी बुलाते हैं.
चीन के साथ बढ़ती तल्खी
साल 1950 में जब चीन की ताकत के आगे तिब्बत का वजूद खतरे में आ गया, तब दलाई लामा को राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख के तौर पर पूरी राजनीतिक कमान सौंपी गई. 1954 में वे खुद बीजिंग गए और माओ त्से-तुंग, चाउ एन-लाई और डेंग शियाओपिंग जैसे चीनी नेताओं से बातचीत की. 1956 में बुद्ध की 2500वीं जयंती में शामिल होने भारत आए दलाई लामा ने इस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन-लाई से कई बार मुलाकात की और तिब्बत की बिगड़ती हालत पर चर्चा की. लेकिन हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते चले गए और 1959 में चीन ने तिब्बत पर सैन्य कब्जा कर लिया, जिसके बाद दलाई लामा को भारत में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा.
वो निमंत्रण जिसने ल्हासा में हड़कंप मचा दिया
दलाई लामा के जीवन पर आधारित जानकारी के मुताबिक, 10 मार्च 1959 को चीनी जनरल झांग चेनवू ने दलाई लामा को एक कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण भेजा. इस निमंत्रण के साथ शर्त रखी गई थी कि उनके साथ कोई तिब्बती सैनिक या हथियारबंद अंगरक्षक नहीं होगा. जब यही निमंत्रण दोबारा भेजा गया और नई शर्तों में यह भी जोड़ा गया कि दलाई लामा के अंगरक्षक निहत्थे रहेंगे, तो ल्हासा में लोगों के बीच डर और गुस्सा फैल गया. हजारों की तादाद में लोग नोरबुलिंगका महल के बाहर जमा हो गए और उन्होंने दलाई लामा को इस कार्यक्रम में जाने ही नहीं दिया. इसी घटना ने आगे चलकर दलाई लामा के तिब्बत छोड़ने की जमीन तैयार कर दी.
भारत में शरण और नई शुरुआत
तिब्बत की सीमा से लगे इलाके में पहुंचने के बाद दलाई लामा और उनके साथी अरुणाचल प्रदेश के तवांग आए, जो उस दौर में ‘नेफा’ के नाम से जाना जाता था. वहां तैनात भारतीय फौज और स्थानीय प्रशासन ने उन्हें फौरन सुरक्षा मुहैया कराई. इसके बाद उन्हें अरुणाचल प्रदेश से असम लाया गया. भारत पहुंचने के कुछ हफ्तों बाद दलाई लामा की मुलाकात प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से हुई, जिसके बाद आधिकारिक तौर पर यह ऐलान किया गया कि भारत ने दलाई लामा को शरण दे दी है. गौर करने वाली बात यह है कि दलाई लामा के भारत पहुंचने से पहले भी कई तिब्बती लोग चीन से बचकर भारत में शरण ले चुके थे, लेकिन बौद्ध धर्मगुरु के भारत आने के बाद तिब्बती लोगों का बड़े पैमाने पर भारत आना शुरू हो गया. ये लोग सिर्फ उत्तर पूर्व राज्यों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि देश के अलग अलग हिस्सों में फैल गए. 1960 से दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रह रहे हैं, जिसे ‘छोटा ल्हासा’ भी कहा जाता है और जो निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय है.
निर्वासन में भी जारी रही तिब्बत के लिए लड़ाई
भारत में शरण मिलने के बाद के शुरुआती सालों में दलाई लामा ने तिब्बत के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के सामने रखा. इसका नतीजा यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1959, 1961 और 1965 में तीन अलग अलग प्रस्ताव पारित किए. 1963 में दलाई लामा ने तिब्बत के लिए एक मसौदा संविधान जारी किया, जिसमें लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का वायदा किया गया था. इसके बाद के दशकों में उन्होंने कई शैक्षणिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थान भी खड़े किए, जिनकी मदद से तिब्बती पहचान और उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बचाने में बड़ी मदद मिली. इस दौरान उन्होंने कई उपदेश और दीक्षाएं भी दीं, जिनमें दुर्लभ मानी जाने वाली कालचक्र दीक्षा भी शामिल है, जिसे उन्होंने अपने पूर्ववर्ती दलाई लामाओं के मुकाबले कहीं ज्यादा बार संपन्न किया.













