20 अगस्त 2026 को भारतीय शेयर बाजार के लिए कारोबारी सत्र चुनौतीपूर्ण रहने के संकेत मिल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिल रहे कमजोर रुझान, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और लंबे समय से चले आ रहे भू-राजनीतिक तनाव घरेलू निवेशकों की धारणा को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। पिछले कारोबारी सत्र में प्रमुख सूचकांकों में गिरावट का सिलसिला जारी रहा, जहां निफ्टी 50 लगातार सातवें दिन लाल निशान में बंद हुआ। इसके साथ ही मझोली और छोटी कंपनियों के शेयरों यानी मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में भी बिकवाली देखने को मिली है। तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि जब तक बाजार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थिरता और नए सकारात्मक संकेत नहीं मिलते, तब तक भारतीय बाजार सीमित दायरे में और दबाव के साथ कारोबार कर सकते हैं।
पिछले कारोबारी सत्र का हाल: प्रमुख और व्यापक सूचकांकों में गिरावट
बुधवार को समाप्त हुए पिछले कारोबारी सत्र के दौरान घरेलू शेयर बाजार के दोनों प्रमुख सूचकांक भारी दबाव में बंद हुए थे। निफ्टी 50 इंडेक्स 0.32 प्रतिशत या लगभग 0.3 प्रतिशत की गिरावट के साथ 24,078 के स्तर पर आकर बंद हुआ। वहीं दूसरी ओर, 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 0.42 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज करते हुए 76,909 के स्तर पर बंद हुआ। बाजार में बिकवाली का असर केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक बाजार में भी साफ तौर पर देखा गया। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 0.21 प्रतिशत या करीब 0.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 0.51 प्रतिशत या लगभग 0.5 प्रतिशत टूटकर बंद हुआ।
बाजार की इस लगातार आ रही गिरावट पर मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड में वेल्थ मैनेजमेंट के रिसर्च प्रमुख सिद्धार्थ खेमका ने बाजार के मौजूदा रुख पर अपनी राय व्यक्त की है। सिद्धार्थ खेमका के अनुसार, "कमजोर वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और जारी भू-राजनीतिक तनावों के बीच निफ्टी पर दबाव बना रहने की संभावना है।" उन्होंने ध्यान दिलाया कि निफ्टी 50 ने लगातार सातवें सत्र में नुकसान दर्ज किया है, जिससे निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ है।
निफ्टी 50 का तकनीकी खाका: प्रमुख सपोर्ट और रेजिस्टेंस स्तर
तकनीकी चार्ट पर निफ्टी लगातार सुधारात्मक रुझान यानी करेक्टिव फेज का प्रदर्शन कर रहा है। हालिया कारोबारी सत्रों में इंडेक्स लगातार लोअर हाई और लोअर लो पैटर्न का निर्माण कर रहा है, जो बाजार पर मंदी के दबाव को स्पष्ट करता है। हालांकि, तकनीकी संकेतकों से यह भी संकेत मिलता है कि दैनिक स्टोकेस्टिक इंडिकेटर ओवरसोल्ड क्षेत्र के काफी करीब पहुंच गया है। ओवरसोल्ड जोन के समीप होने के कारण अल्पकालिक अवधि में बाजार में एक निचले स्तर से रिकवरी या शॉर्ट-टर्म बाउंसबैक की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है।
इंडेक्स पिछले लगभग 12 सत्रों से एक व्यापक दायरे में समेकित या कंसोलिडेट हो रहा है। इस दौरान इसने 23,606 से 24,774 तक की अपनी पिछली तेज बढ़त का करीब 61.8 प्रतिशत हिस्सा रिट्रेस कर लिया है। इस तरह की उथली रिट्रेसमेंट को तकनीकी विश्लेषक एक सकारात्मक संकेत के रूप में भी देखते हैं, जो एक उच्च आधार या हायर बेस फॉर्मेशन बनने का संकेत देती है। यदि बाजार में दोबारा खरीदारी की दिलचस्पी लौटती है, तो यह हायर बेस बाजार को सहारा दे सकता है।
बजाज ब्रोकिंग रिसर्च के विश्लेषकों के अनुसार, 20 अगस्त के सत्र के लिए निफ्टी के लिए 24,000 से 23,800 का दायरा एक अत्यंत महत्वपूर्ण सपोर्ट जोन के रूप में काम करेगा। बजाज ब्रोकिंग रिसर्च के मुताबिक, "निफ्टी के पास 24,000-23,800 के स्तर पर अल्पकालिक सपोर्ट मौजूद है, जो पिछले 4 महीनों के निचले स्तरों को जोड़ने वाली ट्रेंडलाइन सपोर्ट का संगम है।" यह सपोर्ट जोन पिछले 4 महीनों के निचले स्तरों को जोड़ने वाली ट्रेंडलाइन, पहले के प्रमुख गैप एरिया और 23,606 से 24,774 तक की पिछली तेजी के 61.8 प्रतिशत रिट्रेसमेंट लेवल के मेल से बना है।
व्यापक तकनीकी ढांचे से संकेत मिलता है कि आगामी कारोबारी सत्रों में निफ्टी 24,000 से 24,600 के बीच कंसोलिडेट करना जारी रख सकता है। बाजार में तेजी की गति या मोमेंटम में वास्तविक सुधार के लिए इंडेक्स का 24,600 के ऊपरी दायरे के ऊपर मजबूती से टिकना आवश्यक होगा। इसके विपरीत, यदि निफ्टी 23,800 के नीचे टूटता है, तो बाजार में बिकवाली का दबाव और तेज हो सकता है।
बैंक निफ्टी का आउटलुक: रेजिस्टेंस बाधा और संभावित गिरावट का दायरा
बैंक निफ्टी भी इस समय सुधारात्मक दौर से गुजर रहा है। पिछले सत्र में बैंक निफ्टी ने अपने 50-डे एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) के आसपास लोअर हाई और लोअर लो के साथ एक हाई-वेव कैंडलस्टिक पैटर्न बनाया है। यह इंडेक्स पिछले आठ हफ्तों से 56,500 से 58,700 के अपने व्यापक कंसोलिडेशन रेंज के भीतर ही कारोबार कर रहा है।
गुरुवार के कारोबारी सत्र के दौरान बैंक निफ्टी के लिए 57,500 से 57,800 का स्तर एक प्रमुख रेजिस्टेंस जोन के रूप में कार्य करने की संभावना है। यदि इंडेक्स इस रेजिस्टेंस स्तर के ऊपर सफलतापूर्वक टिकने में कामयाब होता है, तो यह रिकवरी को मजबूती देगा और इंडेक्स के लिए 58,200 तथा अंततः 58,700 के स्तर तक जाने का रास्ता साफ हो सकता है।
इस पर बजाज ब्रोकिंग रिसर्च का कहना है कि "कंसोलिडेशन के भीतर इंडेक्स को 57,500-57,800 के स्तरों के आसपास रेजिस्टेंस का सामना करना पड़ रहा है।" शोध टीम ने चेतावनी दी है कि यदि इंडेक्स इस रेजिस्टेंस के नीचे बना रहता है, तो इसमें 56,500 से 56,200 के स्तर तक गिरावट आ सकती है, जो 200-डे EMA और व्यापक कंसोलिडेशन रेंज के निचले बैंड का संगम बिंदु है।
बैंक निफ्टी 56,023 से 58,248 तक की अपनी पिछली 7-सत्रीय तेजी का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा रिट्रेस करने के बाद पिछले 12 सत्रों से अपेक्षाकृत संकीर्ण दायरे में कंसोलिडेट हो रहा है। यह सीमित करेक्शन इस बात का संकेत है कि इंडेक्स एक मजबूत बेस तैयार कर रहा है।
वैश्विक संकेत: कच्चे तेल की कीमतें, एशियाई बाजारों में गिरावट और बॉन्ड यील्ड
घरेलू इक्विटी बाजारों के लिए अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां चिंता का मुख्य कारण बनी हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतें 91.2 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रही हैं। कच्चे तेल के इस ऊंचे स्तर ने मुद्रास्फीति यानी महंगाई और कंपनियों के लाभ मार्जिन को लेकर चिंताओं को बढ़ा दिया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत के आयात बिल पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं और उन क्षेत्रों तथा कंपनियों को प्रभावित करती हैं जिनकी लागत कच्चे तेल से जुड़ी होती है।
इसके अलावा, एशियाई बाजारों में भी भारी बिकवाली का माहौल देखा गया है। दक्षिण कोरिया के बेंचमार्क सूचकांक कोस्पी में 5 प्रतिशत से अधिक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। भू-राजनीतिक मोर्चे पर भी तनाव बढ़ गया है, क्योंकि 60 दिनों की समय सीमा बिना किसी शांतिपूर्ण समाधान के समाप्त हो गई है और दोनों पक्ष आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं।
अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों में लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड यील्ड में लगातार हो रही बढ़ोतरी भी उभरते बाजारों के लिए चुनौती बनी हुई है। बढ़ती बॉन्ड यील्ड के कारण वैश्विक निवेशकों के लिए विकसित बाजारों के बॉन्ड अधिक आकर्षक हो जाते हैं, जिससे भारत जैसे जोखिम वाले उभरते बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के फंड प्रवाह में कमी आ सकती है।


















