चीन के शिनजियांग प्रांत में स्थित कोरला सैन्य ठिकाने पर आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यास काराकोरम 2026 ने क्षेत्रीय रक्षा विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस द्विपक्षीय प्रशिक्षण में भाग लेने पहुंचे पाकिस्तानी थल सेना के दस्तों ने अपनी व्यक्तिगत राइफलों से लेकर बख्तरबंद गाड़ियों तक, पूरी तरह से मेजबान देश के हथियारों और साजो-सामान का उपयोग किया। दोनों मुल्कों की थल सेनाओं के बीच इस स्तर पर आयोजित यह पहला व्यापक अभ्यास है, जिसमें शी जिनपिंग के नेतृत्व वाली चीनी सेना ने अपनी अग्रिम पंक्ति की हथियार प्रणालियों की समूची श्रृंखला पाकिस्तानी सैनिकों को सौंप दी।
युद्धाभ्यास में तैनात प्रमुख चीनी हथियार प्रणालियां
इस संयुक्त अभ्यास के दौरान युद्धक्षेत्र में कई आधुनिक और घातक प्रणालियां उतारी गई हैं। चीनी सेना की आधुनिक पहचान बन चुकी टाइप 191 असॉल्ट राइफल को अग्रिम पंक्ति के सैनिकों को दिया गया है, जो अपनी सटीकता और विषम मौसम में मारक क्षमता के लिए जानी जाती है। इसके साथ ही, वजन में हल्की और तीव्र गति से गोलीबारी करने में सक्षम टाइप 201 स्क्वाड मशीन गन भी फील्ड परीक्षण का हिस्सा बनी।
सड़क और पहाड़ी मोर्चों पर त्वरित आवाजाही के लिए पहियों वाले टाइप 11 आर्मर्ड असॉल्ट व्हीकल और टाइप 08 इन्फैंट्री फाइटिंग व्हीकल (IFVs) को बड़े पैमाने पर शामिल किया गया है। हवाई निगरानी और हमलों के लिए सुसाइड ड्रोन, निगरानी ड्रोन तथा विरोधी ड्रोनों को मार गिराने वाले आधुनिक एंटी-ड्रोन फाइटर सिस्टम को भी ड्रिल में परखा जा रहा है। रक्षा जानकारों का विश्लेषण है कि उच्च पर्वतीय इलाकों में भारी-भरकम टैंकों के स्थान पर पहियों वाले बख्तरबंद वाहनों को चुनना एक खास रणनीति का हिस्सा है। ये गाड़ियां दुर्गम रास्तों और कच्ची पगडंडियों पर तीव्र गति से आगे बढ़ सकती हैं और युद्ध के दौरान तेजी से अपनी तैनाती बदल सकती हैं।
पूर्ण रूप से चीनी साजो-सामान के इस्तेमाल के रणनीतिक मायने
चीनी रक्षा विशेषज्ञ वांग युनफेई ने बताया कि पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा शत-प्रतिशत चीनी सैन्य उपकरणों का इस्तेमाल करना महज एक संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे सोची-समझी योजनाएं काम कर रही हैं। सबसे पहला पहलू रक्षा उपकरणों का सीधा व्यावहारिक प्रदर्शन और भविष्य की खरीद है। जब पाकिस्तानी सैनिक वास्तविक पहाड़ी परिस्थितियों में इन हथियारों का संचालन खुद करेंगे, तो उनके लिए भविष्य में बीजिंग से अरबों डॉलर के नए सैन्य सौदे करने का रास्ता सुगम होगा। इस व्यवस्था के माध्यम से चीन पड़ोसी देश के रक्षा बाजार पर अपनी दीर्घकालिक पकड़ मजबूत करना चाहता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू दोनों सेनाओं के बीच साझा इंटरऑपरेबिलिटी स्थापित करना है। जब दो देशों के सशस्त्र बल एक जैसी राइफलों, एक समान संचार तंत्र और साझा बख्तरबंद वाहनों का संचालन सीखते हैं, तो युद्धक्षेत्र में उनका समन्वय कई गुना बढ़ जाता है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि किसी बड़े संकट या युद्ध की स्थिति में दोनों देशों के सैनिक तकनीकी बाधाओं के बिना एक-दूसरे के हथियारों का इस्तेमाल कर सकेंगे और एक साझा कमान संरचना के तहत समन्वित कार्रवाई को अंजाम दे सकेंगे।
ड्रोन युद्ध और आधुनिक तकनीक पर केंद्रित प्रशिक्षण सत्र
चीनी रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ कर्नल चेन शी के अनुसार, अक्टूबर के पूरे सप्ताह चलने वाली इस सैन्य कवायद में केवल पारंपरिक बंदूकों का उपयोग नहीं सिखाया जा रहा, बल्कि भविष्य के हाई-टेक युद्ध की बारीकियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इस अभ्यास में आक्रामक और निगरानी ड्रोनों के संयुक्त संचालन की गहन ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके अतिरिक्त, ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में गतिशील लक्ष्यों को खोजकर तुरंत नष्ट करने की तकनीक और लंबी दूरी से अचूक स्नाइपर हमलों का भी निरंतर अभ्यास किया जा रहा है।
सैन्य विश्लेषक रेखांकित करते हैं कि पाकिस्तानी सेना के पास लंबे समय तक अपने ही क्षेत्र में अलगाववादी समूहों के खिलाफ अभियानों का जमीनी अनुभव है, जबकि चीनी सेना के पास आधुनिक तकनीकी संसाधन, उन्नत निगरानी प्रणालियां और ड्रोनों का विशाल बेड़ा मौजूद है। इन दोनों क्षमताओं का यह संयोजन एक नया सैन्य तालमेल बना रहा है।
भारतीय सीमा सुरक्षा के दृष्टिकोण से संवेदनशीलता
शिनजियांग प्रांत का कोरला सैन्य अड्डा भारत के लद्दाख सीमावर्ती क्षेत्र के अत्यंत निकट स्थित है। लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक फैली वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और पाकिस्तान से सटी नियंत्रण रेखा (LoC) के संदर्भ में दोनों सेनाओं की यह साझा गतिविधि सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। दोनों पड़ोसी देशों का यह गहरा सैन्य तालमेल और साझा हथियारों का खुला प्रदर्शन भारतीय रक्षा योजनाकारों और सुरक्षा प्रतिष्ठानों के लिए निरंतर निगरानी का विषय बना हुआ है।



















