भारतीय क्रिकेट टीम के प्रमुख ऑलराउंडर हार्दिक पांड्या 33 वर्ष के हो गए हैं। साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले हार्दिक आज क्रिकेट जगत में एक बड़ा नाम बन चुके हैं। उन्होंने अपनी बल्लेबाजी और गेंदबाजी के बेहतरीन तालमेल से राष्ट्रीय टीम को एक मजबूत संतुलन प्रदान किया, जिसके चलते उन्हें भारत के नंबर एक ऑलराउंडर के रूप में पहचान मिली। हालांकि, कई मौकों पर चोटों की वजह से उनके खेल के सफर में रुकावटें भी आई हैं। वर्तमान में भी वह चोट की समस्या से जूझ रहे हैं और भारतीय टीम के मुख्य सेटअप से बाहर चल रहे हैं, लेकिन संभावना जताई जा रही है कि वह पूरी तरह फिट होकर जल्द ही मैदान पर वापसी करेंगे। उनके जन्मदिन के इस खास पड़ाव पर उनके जीवन, संघर्ष और उपलब्धियों पर नजर डालना बेहद दिलचस्प है।
सूरत से वडोदरा तक का मुश्किल दौर
क्रिकेट के शीर्ष स्तर तक पहुंचने से पहले हार्दिक पांड्या को जीवन में कड़े संघर्षों का सामना करना पड़ा। उनके पिता हिमांशु पांड्या सूरत में कार फाइनेंस का कारोबार करते थे। उस व्यापार में भारी आर्थिक घाटा होने के चलते परिवार को बड़ा झटका लगा। इसके बाद हालात संभालने के लिए उनका पूरा परिवार सूरत छोड़कर वडोदरा शिफ्ट हो गया। परिवार पर अचानक आए आर्थिक संकट का असर बच्चों पर भी पड़ा और तंगी के चलते हार्दिक की स्कूली पढ़ाई तक छूट गई। उस दौर में घरेलू स्थिति इतनी ज्यादा बिगड़ चुकी थी कि हार्दिक और उनके भाई क्रुणाल पांड्या को कई बार सिर्फ मैगी खाकर अपने दिन गुजारने पड़ते थे।
उधार की किट से आईपीएल तक का सफर
वित्तीय संकट के दिनों में हार्दिक के पास क्रिकेट खेलने के लिए खुद की किट खरीदने तक के साधन नहीं थे। अभ्यास और मैच खेलने के लिए उन्हें दूसरों से क्रिकेट किट उधार मांगनी पड़ती थी। इसके अलावा, जेब खर्च और मामूली पैसों के इंतज़ाम के लिए वह दूर-दराज के इलाकों में जाकर स्थानीय क्रिकेट मैच खेला करते थे। अभावों और सीमित संसाधनों के बावजूद हार्दिक ने अपने खेल के सपने को टूटने नहीं दिया। उन्होंने लगातार पसीना बहाया और मैदान पर कड़ी मेहनत जारी रखी। स्थानीय टूर्नामेंटों में शानदार प्रदर्शन करके उन्होंने अपनी मजबूत पहचान बनाई, जिसके बाद उनका चयन राज्य स्तरीय टीम में हुआ और फिर इसी प्रदर्शन के आधार पर उनकी एंट्री आईपीएल में संभव हो सकी।



















