उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के छोटे से कस्बे सहसपुर में जन्मे मोहम्मद शमी (Mohammad Shami) के क्रिकेट करियर की शुरुआत बेहद संघर्षपूर्ण रही थी। उनके बचपन के कोच बदरुद्दीन सिद्दीकी हमेशा से यह मानते रहे हैं कि उनके सबसे पसंदीदा शिष्य का कोलकाता जाना पहले से ही तय था। जब उत्तर प्रदेश की अंडर-19 टीम के चयन के दौरान शमी को नजरअंदाज कर दिया गया, तब बदरुद्दीन ने कोलकाता में कुछ फोन घुमाए और शमी की पूरी किस्मत ही बदल कर रख दी। गेंद को कलात्मक अंदाज में रिलीज करना और एसजी, ड्यूक तथा कूकाबूरा की लाल गेंद को बेहतरीन सीम पोजिशन के साथ स्विंग कराना उनकी बड़ी खासियत बन गई। उनकी यह खास बैकस्पिन उनकी पहचान बन गई है। उत्तर प्रदेश के क्रिकेट कोचिंग जगत में बदर भाई के नाम से मशहूर बदरुद्दीन ने हाल ही में पुरानी यादों को ताजा करते हुए एक बड़ा खुलासा किया है।
टेस्ट क्रिकेट को लेकर आया चौंकाने वाला फोन कॉल
बदरुद्दीन ने बताया कि उन्हें पूरी उम्मीद थी कि शमी का चयन टेस्ट टीम में होगा क्योंकि उन्होंने वह हर काम किया था जो उनसे करने के लिए कहा गया था। लेकिन हाल ही में जब शमी का फोन आया तो वह सुनकर हैरान रह गए। बदरुद्दीन ने कहा कि शमी ने उनसे फोन पर कहा कि सर, मैं टेस्ट क्रिकेट छोड़ रहा हूं। हालांकि इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शमी अब भी बंगाल के लिए सफेद गेंद का क्रिकेट खेल रहे हैं और आगामी आईपीएल (IPL) में भी हिस्सा लेंगे। वह हार मानने वाले खिलाड़ियों में से बिल्कुल नहीं हैं और जब भी मैदान पर उतरेंगे अपना दो सौ प्रतिशत योगदान देंगे। बंगाल के लिए उनका सफेद गेंद का क्रिकेट खेलना टीम के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है। कोच बदरुद्दीन को आज भी इस बात पर बहुत संतोष होता है कि करीब दो दशक पहले उन्होंने अपने दोस्त और कोलकाता के कोच अब्दुल मोनायेम को फोन किया था जिससे एक महान तेज गेंदबाज का रास्ता साफ हुआ।
कोलकाता के टाउन क्लब से शुरू हुई असली कहानी
बंगाल क्रिकेट संघ यानी सीएबी की प्रथम श्रेणी लीग को हमेशा से बेहद प्रतिस्पर्धी माना जाता है। इस लीग के छोटे क्लबों में टाउन क्लब एक ऐसा नाम है जो अपनी क्षमता से कहीं बढ़कर शानदार प्रदर्शन करने के लिए जाना जाता है। इस ऐतिहासिक क्लब के साथ स्वामी विवेकानंद का नाम भी जुड़ा है जो अट्ठारह सौ अस्सी के दशक में इसके लिए खेल चुके थे। उस समय क्लब के मालिक और सीएबी के पूर्व सचिव देब्रत दास एक बेहतरीन तेज गेंदबाज की तलाश में जुटे थे। तभी एक दिन मैदान के स्काउट सुमन चक्रवर्ती ने उन्हें फोन करके एक होनहार खिलाड़ी के बारे में बताया। चक्रवर्ती ने देब्रत दा को जानकारी दी कि शमी अहमद नाम का एक लड़का है जो डलहौजी एथलेटिक क्लब से जुड़ा है और उसकी गेंदबाजी की रफ्तार वाकई कमाल की है। उन्होंने कहा कि कोलकाता के मैदानों में ऐसा गेंदबाज पहले कभी नहीं देखा गया होगा और क्या वह उसे अपनी टीम में शामिल करना चाहेंगे।
देब्रत दास का साथ और मटन बिरयानी का दिलचस्प किस्सा
देबब्रत दास ने शमी को पहली बार मैदान पर देखने के बाद ही यह भांप लिया था कि यह खिलाड़ी भविष्य में बहुत बड़े मुकाम हासिल करेगा। उन्होंने तुरंत शमी के पिता को फोन किया और उन्हें अपने क्लब में शामिल करने की इच्छा जताई। उस सत्र के लिए शमी को सत्तर हजार रुपये दिए जाने तय हुए थे। इसके अलावा वह रोजाना देब्रत के घर पर दोपहर और रात का भोजन करते थे जिसके लिए उन्हें प्रतिदिन एक सौ रुपये दिए जाते थे। धीरे-धीरे वह उस परिवार का हिस्सा बन गए और देब्रत के बेटे के अच्छे दोस्त भी बन गए। उनका भाई कैफ भी उनके साथ ही रहता था जो वर्तमान में बंगाल के तेज गेंदबाज हैं। शमी को मटन बिरयानी खाने का बेहद शौक था और उनकी सीधी-सादी मासूमियत हर किसी का दिल आसानी से जीत लेती थी।
जब बिरयानी की शर्त पर पलट गया मैच
करीब बीस साल पहले खेले गए एक लीग मुकाबले का जिक्र करते हुए देब्रत दास पुरानी यादों में खो जाते हैं। उस मैच में विपक्षी टीम को जीत हासिल करने के लिए पचास से भी कम रनों की दरकार थी और मैच हाथ से फिसलता दिख रहा था। देब्रत ने शमी से कहा कि कुछ चमत्कार करो क्योंकि हम मैच हार रहे हैं। इस पर शमी ने उनकी तरफ देखा और मासूमियत से पूछा कि क्या देबू दा उन्हें बिरयानी खिलाएंगे। जवाब में देब्रत ने शर्त रखी कि पहले मैच जिताकर दिखाओ। इसके बाद मैदान पर जो हुआ वह चमत्कार से कम नहीं था। अचानक गेंद रिवर्स स्विंग होने लगी और टाउन क्लब ने वह मुकाबला अपने नाम कर लिया। इस पुरानी घटना को याद करके देब्रत दास आज भी अपनी हंसी नहीं रोक पाते हैं।
चयनकर्ताओं की बेरुखी और एक ऐतिहासिक संघर्ष
शमी की प्रतिभा के बावजूद बंगाल के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों और तत्कालीन चयनकर्ताओं द्वारा उन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किए जाने का दर्द आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। जब शमी बंगाल की अंडर-22 टीम के लिए खेल रहे थे, तब उनकी एड़ी में लगातार दर्द रहता था। वह हर मैच में चार से पांच विकेट चटका रहे थे, इसके बावजूद उन्हें रणजी ट्रॉफी के लिए नहीं चुना जा रहा था। देब्रत ने चयन समिति के एक वरिष्ठ सदस्य के सामने गिड़गिड़ाकर अनुरोध किया था कि इस लड़के को टीम में चुन लिया जाए। लेकिन इसके जवाब में उन्हें सुनने को मिला कि वह उत्तर प्रदेश के किसी लड़के का नाम क्यों आगे बढ़ा रहे हैं। इस पर गुस्से में आकर देब्रत ने कहा था कि क्या वे किशोर कुमार, लता मंगेशकर या एमएफ हुसैन जैसी महान हस्तियों को भी किसी एक राज्य की सीमाओं में बांध देंगे।
शमी की सादगी और बंगाल टीम में चयन का दिन
मोहम्मद शमी की सादगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब दो हजार दस में पहली बार उनका चयन बंगाल की रणजी टीम के लिए हुआ था, तब भी वह बेहद साधारण जीवन जी रहे थे। देब्रत दास उस दिन टाउन क्लब के टेंट में बैठे थे और उन्होंने शमी से पूछा कि वह अभी तक वहां क्यों रुके हुए हैं। इस पर शमी ने उनसे दो हजार रुपये उधार मांगे और कारण बताया कि उनका चयन बंगाल टीम में हो गया है और उन्होंने अपने क्लब के साथियों को बिरयानी की दावत देने का वादा किया है। देब्रत को यह भी बखूबी याद है कि उन्होंने किस तरह कोलकाता में शमी को उनका पहला घर खरीदने में आर्थिक मदद पहुंचाई थी।



















