दीपावली का पावन पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है, जिसमें मुख्य रूप से धन की देवी मां लक्ष्मी और विघ्नहर्ता भगवान गणेश की आराधना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि कार्तिक अमावस्या की रात को मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक का भ्रमण करती हैं और अपने भक्तों के घरों में वास करती हैं। इस खास अवसर पर देवी का आशीर्वाद पाने के लिए भक्त विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान और पूजा-पाठ करते हैं। पूजा के दौरान देवी के विशेष मंत्रों के साथ उनके 108 पावन नामों का जाप करना बेहद फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक इन नामों का उच्चारण करने से घर में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और खुशहाली का आगमन होता है। भक्तों की सुविधा के लिए मां लक्ष्मी के 108 नाम के लिस्ट का पीडीएफ भी उपलब्ध कराया गया है, जिसे आसानी से डाउनलोड किया जा सकता है।
मां लक्ष्मी के 108 पावन नाम और उनके अर्थ
देवी लक्ष्मी के 108 नामों की पूरी श्रृंखला उनके विभिन्न स्वरूपों और गुणों को दर्शाती है। इन नामों का जाप करने से साधक को आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। सूची की शुरुआत 'प्रकृति' नाम से होती है, जिसका अर्थ है जो स्वयं प्रकृति स्वरूपा हैं। इसके बाद 'विकृति' यानी जिन्हें हम विभिन्न रूपों या नामों से जानते हैं, और 'विद्या' यानी जो समस्त प्रकार की विद्याओं में विद्यमान हैं, जैसे नाम आते हैं। इसी क्रम में 'सर्वभूतहितप्रदा' जो संसार के समस्त सुखों को प्रदान करती हैं, और 'श्रद्धा' जिन्हें केवल सच्ची श्रद्धा द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, शामिल हैं।
इस पवित्र नामावली में 'विभूति' जो अपने भक्तों को धन-सम्पदा प्रदान करती हैं, 'सुरभि' जो सर्वोच्च देवी हैं और त्रिमूर्ति जिनकी आराधना करते हैं, तथा 'परमात्मिका' जो तीनों लोकों की आराध्य देवी हैं, उनके महान स्वरूप को उजागर करती हैं। इसके अलावा 'वाक्' जिनकी वाणी अमृत तुल्य है, 'पद्मालया' जो कमल पुष्प के आसन पर विराजमान हैं, 'पद्मा' जो कमल वर्ण वाली हैं, और 'शुचि' जो स्वयं पवित्र हैं, जैसे नाम देवी की दिव्यता का प्रतीक हैं।
आगे के नामों में 'स्वाहा' जो स्वयं आहुतिस्वरूपा हैं, 'स्वधा' जो स्वधा देवी के रूप में स्थित हैं, 'सुधा' जो स्वयं अमृत के रूप में विद्यमान हैं, और 'धन्या' जो कृतज्ञता का मूर्त रूप हैं, शामिल हैं। देवी की आभा का वर्णन करते हुए 'हिरण्मयी' जिनकी आभा स्वर्ण के समान तेजपूर्ण है, और 'लक्ष्मी' जो धन-ऐश्वर्य प्रदान करती हैं, महत्वपूर्ण नाम हैं। इसके साथ ही 'नित्यपुष्टा' जो निरन्तर पुष्ट होती रहती हैं, और 'विभावरी' जो अत्यन्त सुन्दर एवं अनन्त तेज को धारण करने वाली हैं, भक्तों को ऊर्जा प्रदान करती हैं।
इस क्रम में 'अदिति' जिनकी कान्ति सूर्य के समान है, 'दिति' जो भक्तों की प्रार्थना का उत्तर हैं, 'दीपा' जिनका तेज सहस्र सूर्यों के समान है, और 'वसुधा' जो भूमिदेवी के रूप में कल्याण करती हैं, आते हैं। 'वसुधारिणी' सम्पूर्ण पृथ्वी का भार धारण करती हैं, जबकि 'कमला' पुष्प से प्रकट होने वाली देवी हैं। भगवान विष्णु की अर्धाङ्गिनी को 'कान्ता' कहा जाता है, वहीं 'कामाक्षी' के नेत्र अत्यधिक आकर्षक एवं दिव्य हैं। 'क्षीरोधसम्भवा' भगवान विष्णु के साथ क्षीरसागर में निवास करती हैं और 'अनुग्रहप्रदा' नाना प्रकार के सुख प्रदान करती हैं।
देवी के अन्य स्वरूपों में 'बुद्धि' जो स्वयं बुद्धिस्वरूपा हैं, 'अनघा' जो निष्पाप हैं, और 'हरिवल्लभा' जो भगवान श्री हरि की धर्मपत्नी हैं, प्रमुख हैं। 'अशोका' दुःख का नाश करती हैं, 'अमृता' अमृत का मूल तत्त्व हैं, और 'दीप्ता' सदैव दीप्तिमान रहती हैं। सृष्टि की पीड़ा का शमन करने वाली को 'लोकशोकविनाशिनी' कहा गया है। 'धर्मनिलया' धर्म की स्थापना करती हैं, 'करुणा' दया का सागर हैं, और 'लोकमाता' सम्पूर्ण जगत की माता हैं।
कमल से जुड़े कई नाम इस सूची की शोभा बढ़ाते हैं जिनमें 'पद्मप्रिया', 'पद्महस्ता', 'पद्माक्षी', 'पद्मसुन्दरी', 'पद्मोद्भवा', 'पद्ममुखी' और 'पद्मनाभप्रिया' शामिल हैं। भगवान विष्णु को प्रसन्न रखने वाली को 'रमा' कहते हैं, और 'पद्ममालाधरा' कमल पुष्पों की माला धारण करती हैं। 'देवी' सर्वशक्तिशाली हैं, 'पद्मिनी' क्षीरसागर में प्रकट होती हैं, और 'पद्मगन्धिनी' तथा 'पुण्यगन्धा' दैवीय सुगन्ध से युक्त हैं।
साधकों को प्रसन्नता देने वाली 'सुप्रसन्ना' और वर प्रदान करने हेतु तत्पर रहने वाली 'प्रसादाभिमुखी' भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं। 'प्रभा' की कान्ति सहस्रों सूर्यों जैसी है। 'चन्द्रवदना', 'चन्द्रा', 'चन्द्रसहोदरी', 'चतुर्भुजा' और 'चन्द्ररूपा' चंद्रमा से जुड़े स्वरूपों को दर्शाती हैं। 'इन्दिरा' क्षीरसागर में सूर्य के समान देदीप्यमान हैं, 'इन्दुशीतला' शांत स्वभाव वाली हैं, और 'आह्लादजननी' सृष्टि को आह्लादित करती हैं.
आरोग्य प्रदान करने वाली को 'पुष्टि' कहा जाता है। इसके अलावा 'शिवा', 'शिवकरी', 'सत्या', 'विमला' और 'विश्वजननी' ब्रह्मांड का संचालन करती हैं। सांख्य दर्शन की नौ तुष्टियों की स्वामिनी को 'तुष्टि' कहा गया है, जबकि 'दारिद्र्यनाशिनी' दरिद्रता को नष्ट करती हैं। 'प्रीतिपुष्करिणी', 'शान्ता', 'शुक्लमाल्याम्बरा' श्वेत वस्त्र धारण करने वाली हैं, और 'श्री' सौभाग्य प्रदान करती हैं। 'भास्करी' तीनों लोकों को प्रकाशित करती हैं और 'बिल्वनिलया' बिल्ववृक्ष में निवास करती हैं।
भक्तों को इच्छित वर देने वाली 'वरारोहा', सृष्टि में पूजनीय 'यशस्विनी', पृथ्वी की पुत्री 'वसुन्धरा', सुंदर अंगों वाली 'उदाराङ्गा', हिरण के समान सौम्य 'हरिणी' और स्वर्ण का हार पहनने वाली 'हेममालिनी' देवी के अनूठे रूप हैं। 'धनधान्यकरी' धन-धान्य देती हैं, 'सिद्धि' सभी सिद्धियां प्रदान करती हैं, 'स्त्रैणसौम्या' मृदुस्वभाव वाली हैं, और 'शुभप्रदा' शुभ फल देती हैं।
राजसी महल में निवास करने वाली को 'नृपवेश्मगतानन्दा' कहा जाता है। 'वरलक्ष्मी', 'वसुप्रदा', 'शुभा', 'हिरण्यप्राकारा' और समुद्र की पुत्री होने के कारण 'समुद्रतनया' भी इन्हीं के नाम हैं। विजय की देवी 'जया', अत्यन्त शुभ 'मङ्गलादेवी', विष्णु के हृदय में बसने वाली 'विष्णुवक्षस्स्थलस्थिता', 'विष्णुपत्नी', प्रसन्न दृष्टि वाली 'प्रसन्नाक्षी' और नारायण का आश्रय पाने वाली 'नारायणसमाश्रिता' देवी के महान स्वरूप हैं।
अंत में 'दारिद्र्यध्वंसिनी' दुखों को मिटाती हैं, 'देवी' सर्वशक्तिशाली हैं, 'सर्वोपद्रववारिणी' उपद्रवों को शांत करती हैं, 'नवदुर्गा' नौ रूपों में स्थित हैं, 'महाकाली' महाकाली स्वरूपा हैं, 'ब्रह्माविष्णुशिवात्मिका' त्रिमूर्ति की प्रिय हैं, तीनों कालों का ज्ञान रखने वाली 'त्रिकालज्ञानसम्पन्ना' और चौदह भुवनों की स्वामिनी 'भुवनेश्वरी' के रूप में इन 108 नामों की श्रृंखला पूरी होती है।



















