बेंगलुरू में खेले जा रहे दलीप ट्रॉफी सेमीफाइनल मुकाबले के दौरान क्रिकेट जगत की निगाहें एक युवा खिलाड़ी के फैसलों पर टिक गईं। ईस्ट जोन की कमान संभाल रहे पंद्रह वर्षीय वैभव सूर्यवंशी ने अपनी सूझबूझ और मैदान पर लिए गए साहसिक निर्णयों से हर किसी को हैरान कर दिया। विपक्षी टीम के खिलाफ चल रहे इस अहम मुकाबले में उन्होंने जिस परिपक्वता का परिचय दिया, उससे उनकी नेतृत्व क्षमता खुलकर सामने आई। मैच के शुरुआती दिन जब मुकाबला कांटे की टक्कर पर था, तब उनके एक फैसले ने पूरी बाजी पलट कर रख दी।
अंपायर का फैसला बदलने पर मजबूर करने वाला मास्टरस्ट्रोक
मैच के सैंतालीसवें ओवर की पटकथा कुछ ऐसी रही कि खेल का पूरा दबाव ईस्ट जोन की गेंदबाजी इकाई पर था। क्रीज पर जमे हुए बल्लेबाज आर्यन जुयाल छियालीस रन बनाकर तेजी से अर्धशतक की ओर बढ़ रहे थे। मुकेश कुमार की गेंद उनके बल्ले के बेहद करीब से गुजरती हुई सीधे विकेटकीपर के दस्तानों में जा समाई। खिलाड़ियों ने जोरदार अपील की, लेकिन मैदान पर खड़े अंपायर ने इसे नकार दिया। ऐसे में समय तेजी से निकल रहा था और डीआरएस लेने के लिए गिने-चुने सेकंड ही बाकी थे। पूरी टीम इस असमंजस में थी कि रिव्यू लिया जाए या नहीं।
अंतरात्मा की आवाज पर लिया गया ऐतिहासिक जोखिम
तमाम भ्रम की स्थिति के बीच युवा कप्तान ने बिना देर किए तुरंत रिव्यू का इशारा कर दिया। यह निर्णय किसी मास्टरस्ट्रोक से कम साबित नहीं हुआ। जब स्क्रीन पर अल्ट्राएज तकनीक का सहारा लिया गया, तो गेंद और बल्ले के बीच स्पष्ट संपर्क नजर आया। तकनीक के नतीजों ने गवाही दी और मैदानी अंपायर को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा। इस तरह आर्यन जुयाल को पवेलियन लौटना पड़ा और ईस्ट जोन को एक बहुत बड़ी सफलता हासिल हुई। इस एक घटना ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में इस युवा खिलाड़ी के आगाज को यादगार बना दिया।
चोट के कारण अचानक मिला नेतृत्व का जिम्मा
इस मुकाबले में कप्तानी संभालने का यह अवसर किसी पूर्व निर्धारित योजना के तहत नहीं आया था। इस टीम में वह मूल रूप से उप-कप्तान की भूमिका निभा रहे थे। खेल के दौरान नियमित कप्तान ईशान किशन विकेटकीपिंग करते समय अपने अंगूठे में चोट लगवा बैठे और उन्हें मैदान से बाहर जाना पड़ा। इसके बाद टीम की कमान संभालने की पूरी जिम्मेदारी इस युवा खिलाड़ी के कंधों पर आ गई। इस अचानक आए बदलाव ने उन्हें मैदान पर अपनी योग्यता साबित करने का बड़ा मंच प्रदान किया।
गेंदबाजी में भी दिखाया अपना कमाल
दलीप ट्रॉफी का यह पूरा सफर उनके लिए काफी विविधता भरा रहा है। इससे पहले नॉर्थ ईस्ट जोन के खिलाफ खेले गए क्वार्टर फाइनल मैच में वह बल्ले से कोई बड़ा कमाल नहीं दिखा सके थे और केवल आठ रन बनाकर आउट हो गए थे। हालांकि उन्होंने अपनी गेंदबाजी के दम पर उस कमी को पूरी तरह से भर दिया। उन्होंने उस मुकाबले में दो महत्वपूर्ण विकेट अपने नाम किए और टीम के लिए अपनी उपयोगिता साबित कर दी। गेंदबाजी को लेकर उनका नजरिया बेहद सहज और आश्वस्त करने वाला रहा है।
एक विकेट-टेकर के रूप में उभरती हुई भूमिका
अपनी गेंदबाजी कौशल के बारे में बात करते हुए उनका मानना है कि जब भी किसी बल्लेबाज को गेंदबाजी करने का मौका मिलता है, तो वह उसका भरपूर आनंद उठाता है। उनका कहना है कि जिस तरह एक गेंदबाज बल्लेबाजी का लुत्फ उठाता है, वही बात बल्लेबाजों पर भी लागू होती है। क्वार्टर फाइनल का एक वाकया साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जब विकेट नहीं मिल रहे थे, तब कप्तान ने उन पर भरोसा जताया था। उन्होंने इस बारे में बात करते हुए कहा कि ईशान भैया को लगा था कि वह एक बड़ा रिस्क ले रहे हैं, लेकिन उन्हें इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि वह एक असल विकेट-टेकर गेंदबाज हैं।
गेंदबाजों के शानदार प्रदर्शन से कसी पकड़
इस सेमीफाइनल मुकाबले की बात करें तो टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी करने का फैसला पूरी तरह सटीक बैठा। सेंट्रल जोन के कप्तान रजत पाटीदार की टीम पर शुरुआती ओवरों से ही शिकंजा कसा गया। पारी के शुरुआती दौर में ही विपक्षी टीम ने अपने मुख्य बल्लेबाजों के विकेट सस्ते में गंवा दिए। सेंट्रल जोन की प्लेइंग इलेवन में सारांश जैन की भी वापसी हुई थी, जो श्रीलंका के खिलाफ कोलंबो टेस्ट खेलकर लौटे थे। इन तमाम बड़े नामों के बीच मैदान पर सबसे ज्यादा चर्चा इसी युवा कप्तान के फैसलों की रही, जिन्होंने अपनी टीम को मुकाबले में बेहद मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया।



















