एक दौर ऐसा था जब झारखंड में क्रिकेट का जिक्र होने पर पूरी चर्चा सिर्फ महेंद्र सिंह धोनी के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। लेकिन मौजूदा समय में तस्वीर बदल चुकी है, और दलीप ट्रॉफी के ईस्ट जोन स्क्वाड में राज्य के पांच होनहार बल्लेबाजों का चुना जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यहां की क्रिकेट संस्कृति में बड़ा बदलाव आया है। दक्षिण जोन के खिलाफ खेले गए दलीप ट्रॉफी फाइनल मुकाबले के दौरान चयन मामलों पर रोशनी डालते हुए जानकारों ने माना कि झारखंड से अब बेहतरीन युवा प्रतिभाएं सामने आ रही हैं। ईस्ट जोन की इस टीम में झारखंड के कप्तान ईशान किशन के साथ-साथ विराट सिंह, कुमार कुशाग्र, शिखर मोहन और अनुकूल रॉय जैसे खिलाड़ी शामिल हैं।
झारखंड क्रिकेट संघ की भविष्य की योजनाएं
राज्य के क्रिकेट बोर्ड ने खास तौर पर दो 21 वर्षीय खिलाड़ियों कुमार कुशाग्र और शिखर मोहन पर काफी भरोसा जताया है। बोर्ड से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि ईस्ट जोन की टीम में इन खिलाड़ियों का चयन होना इस बात को दर्शाता है कि आज के समय में झारखंड का घरेलू क्रिकेट सिस्टम किस दिशा में आगे बढ़ रहा है और ये सभी खिलाड़ी इस मुकाम के पूरे हकदार हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि प्रतिभा सिर्फ यहीं तक सीमित है, क्योंकि कुछ अन्य नाम जैसे शरनदीप भी इस फेहरिस्त में थे जिनका चयन इस बार नहीं हो सका। युवा खिलाड़ियों की परिपक्वता और उनके प्रदर्शन ने घरेलू सर्किट में सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है, खासतौर पर मुश्किल परिस्थितियों में उनकी सूझबूझ भरी पारियां काबिल-ए-तारीफ रही हैं।
ईशान किशन की सोच और बड़ी पारियों का मंत्र
भारत के विकेटकीपर बल्लेबाज और झारखंड की टीम की कमान संभालने वाले ईशान किशन का मानना है कि लंबे समय तक बल्लेबाजी करने की संस्कृति न होना एक ऐसी कमी थी जिस पर ईस्ट जोन को काम करने की जरूरत थी। अतीत में ऐसा अक्सर देखा गया था कि खिलाड़ी 70 या 80 रन बनाने के बाद सहज हो जाते थे, जबकि दूसरी टीमों के मंझे हुए खिलाड़ी उन स्कोर को बड़े शतकों में तब्दील करने का हुनर जानते थे। ईशान किशन लगातार युवा खिलाड़ियों को यही सीख दे रहे हैं कि क्रीज पर सेट होने के बाद अपनी पारी को लंबा खींचना एक आदत बननी चाहिए, ताकि बाद में इस बात का पछतावा न रहे कि थोड़ा और समय क्रीज पर बिताया जा सकता था।
लाल गेंद और सफेद गेंद दोनों में शानदार प्रदर्शन
युवा खिलाड़ियों के आंकड़ों पर नजर डालें तो कुमार कुशाग्र ने साल 2022 में 18 साल की उम्र में फर्स्ट क्लास क्रिकेट में कदम रखा था और वह लाल गेंद के प्रारूप में छह शतकों की मदद से दो हजार से अधिक रन बना चुके हैं। वहीं दूसरी ओर शिखर मोहन ने अपने डेब्यू सीजन में ही 55 के शानदार औसत से रन बनाए हैं जिसमें दो शतक शामिल हैं। ये दोनों खिलाड़ी केवल लाल गेंद के प्रारूप तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सीमित ओवरों के खेल में भी इनका प्रदर्शन जोरदार रहा है। पिछले सीजन में जब झारखंड ने अपनी पहली सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी का खिताब अपने नाम किया था, तब कुमार कुशाग्र ने 10 पारियों में 60.28 की औसत से 422 रन बनाते हुए टूर्नामेंट के तीसरे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज का दर्जा हासिल किया था।
मजबूत बुनियाद और डेज क्रिकेट का असर
शिखर मोहन की बल्लेबाजी शैली में वह अनुशासन साफ झलकता है जो डेज क्रिकेट की कठिन परिस्थितियों से सीखकर आता है, जैसा कि उन्होंने एक मैच में 120 गेंदों पर 85 रन बनाते हुए दिखाया जिसमें ऑफ-स्टंप की गेंदों को छोड़ने का उनका शानदार निर्णय कौशल शामिल था। रणजी ट्रॉफी के अपने पहले ही सीजन में शानदार शुरुआत करने के बाद उनका मुख्य उद्देश्य अपनी इस लय को बरकरार रखना था। राज्य के खेल ढांचे से जुड़े प्रशिक्षकों का भी यही कहना है कि जूनियर स्तर से ही खिलाड़ियों के तकनीकी कौशल और मानसिक मजबूती पर बहुत बारीकी से काम किया जा रहा है। पांडिचेरी जैसे स्थानों पर अभ्यास मैच आयोजित करके युवा खिलाड़ियों को हर तरह की पिचों और परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार किया जा रहा है ताकि वे शीर्ष स्तर की क्रिकेट के लिए पूरी तरह मानसिक रूप से मजबूत बन सकें।
लंबी पारियां खेलने की मानसिक क्षमता
विशेषज्ञों का मानना है कि कोई भी खिलाड़ी जितने अधिक मुकाबले खेलता है और जितनी कठिन परिस्थितियों से गुजरता है, खेल के प्रति उसकी अनुकूलन क्षमता उतनी ही बेहतर होती चली जाती है। जब खिलाड़ी क्रीज पर लंबा समय बिताना सीख जाते हैं, तभी वे बड़े स्कोर और शतक बनाने की कला में पारंगत होते हैं, जो कि टी-20 जैसे छोटे फॉर्मेट से बिलकुल अलग अनुशासन मांगता है जहां केवल 20 ओवरों का ही खेल होता है। लाल गेंद के क्रिकेट में सफलता हासिल करने के लिए एकाग्रता का उच्च स्तर होना अनिवार्य है, और झारखंड के इन उभरते हुए खिलाड़ियों की सफलता के पीछे यही कड़ा अभ्यास और अनुशासन सबसे बड़ा कारण है।



















