भारतीय खेल जगत में इन दिनों एक बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि आगामी एशियन गेम्स के लिए देश की मुख्य क्रिकेट टीम को मैदान में उतारा जाना चाहिए या नहीं। इस चर्चा के केंद्र में वह लॉजिस्टिक्स व्यवस्था है, जहां नागोया में मेहमान खिलाड़ियों के ठहरने के लिए उच्च स्तर के होटल और कमरे समय पर आरक्षित नहीं किए जा सके। हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि यदि आने वाले दिनों में प्रबंध बेहतर नहीं हुए, तो खिलाड़ियों को आपस में कमरे साझा करने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। इन प्रशासनिक कमियों और असुविधाओं को देखते हुए कई हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस तरह के माहौल में शीर्ष खिलाड़ियों को भेजना उचित है।
सॉफ्ट पावर का विस्तार और वैश्विक छवि
भारत आने वाले समय में खेल के क्षेत्र में अपनी साख को और अधिक व्यापक बनाने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। देश साल 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी संभालने की तैयारी कर रहा है और साथ ही साल 2036 के ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए भी मजबूत दावेदारी पेश कर रहा है। ऐसे दौर में यदि किसी बड़े बहु-खेल आयोजन से भारत अपनी सबसे मजबूत टीम को बाहर रखता है, तो इससे दुनिया भर में एक गलत संकेत जा सकता है। वैश्विक समुदाय के सामने यह संदेश पहुंचेगा कि भारत इन प्रतियोगिताओं को उतनी गंभीरता से नहीं ले रहा है जितनी अपेक्षा की जाती है। कमरे के आकार या सुविधाओं जैसी छोटी-मोटी बातें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश के बड़े रणनीतिक लक्ष्यों के सामने कोई मायने नहीं रखती हैं।
खेल गांव का अनमोल अनुभव और एथलीटों का नजरिया
पारंपरिक रूप से ओलंपिक या एशियन गेम्स के दौरान खेल गांव में वक्त बिताना किसी भी खिलाड़ी के जीवन का एक अत्यंत विशिष्ट अनुभव माना जाता रहा है। इस तरह के परिसरों में मिलने वाली सुविधाएं आमतौर पर अधिकतम तीन सितारा होटल के स्तर की ही होती हैं, लेकिन असली मूल्य उस माहौल और मिलने वाले अनुभव का होता है। कोई भी खिलाड़ी बहु-खेल आयोजनों के दौरान पांच सितारा विलासिता की उम्मीद नहीं करता, फिर भी दुनिया भर के एथलीट इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनना चाहते हैं। खेल गांव के भीतर विभिन्न विधाओं के दिग्गजों का आपस में मिलना और अपने खेल के दबाव से निपटने के तरीकों पर चर्चा करना किसी भी लॉजिस्टिक परेशानी से कहीं अधिक मूल्यवान साबित होता है।
प्रशासनिक लापरवाही और विकल्पों की सीमा
मौजूदा हालात को किसी भी लिहाज से आदर्श नहीं कहा जा सकता है और इसके लिए एसीसी के मुखिया मोहसिन नकवी के नेतृत्व में समय रहते उचित कदम न उठाया जाना एक बड़ा कारण है। यदि एक साल पहले ही होटल बुकिंग से जुड़े फैसले ले लिए जाते, तो आज इस तरह की फजीहत से बचा जा सकता था। हालांकि अब स्थिति यह बन चुकी है कि नागोया के पास अतिरिक्त कमरों का कोई विकल्प मौजूद नहीं है, इसलिए जो भी व्यवस्था सामने है उसे स्वीकार करना होगा या फिर पीछे हटना होगा। इसके बावजूद बीसीसीआई यह अच्छी तरह समझता है कि देश की खेल कूटनीति को आगे बढ़ाने के लिए सर्वश्रेष्ठ टीम भेजना अपरिहार्य है।
ऐतिहासिक मिसालें और देश के लिए मेडल का गौरव
टेनिस जगत के महान खिलाड़ी रोजर फेडरर के करियर का सबसे यादगार पल साल 2008 के बीजिंग ओलंपिक के दौरान स्टान वावरिंका के साथ मिलकर जीता गया डबल्स गोल्ड मेडल था, जिसे उन्होंने अपने कई ग्रैंड स्लैम खिताबों से भी ऊपर रखा। अपने राष्ट्र के लिए किसी बहु-खेल महाकुंभ में स्वर्ण पदक अपने गले में लटकाना और तिरंगे को ऊपर उठते देखना एक अलग ही आत्मिक संतोष देता है। जब बात होटल के कमरों की छोटी-मोटी असुविधा और देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने के अवसर के बीच चुनने की हो, तो कोई भी खिलाड़ी हमेशा पदक को ही अपनी पहली प्राथमिकता बनाएगा।



















