संन्यास ले चुके खिलाड़ियों को लेकर दुनिया भर में आयोजित होने वाली लीजेंड्स लीग अब क्रिकेट की वैश्विक नियामक व्यवस्था के लिए एक जटिल पहेली बन गई हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई (एसीयू) के प्रमुख एंड्रयू एफ़ग्रेव ने इन गैर-मंजूरशुदा टूर्नामेंट्स को एक वास्तविक ग्रे एरिया करार दिया है। उनका मानना है कि प्रशंसकों की पुरानी यादों को भुनाने वाले ये मुकाबले खेल की छवि और अखंडता के लिए अप्रत्याशित संकट खड़े कर सकते हैं, क्योंकि इनमें प्रतिस्पर्धा करने वाले कई दिग्गज अब नियमित प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा नहीं रह गए हैं।
मंजूरी और एनओसी के बिना बढ़ते आयोजन
क्रिकेट प्रशासन से बाहर हो चुके पूर्व सितारों के टूर्नामेंट्स अक्सर घरेलू बोर्ड या वैश्विक संस्था की कड़ी निगरानी के दायरे में नहीं आते। कई आयोजनों को न तो संबंधित घरेलू क्रिकेट बोर्ड से औपचारिक मान्यता हासिल होती है और न ही आईसीसी से कोई अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी किया जाता है। कुछ चुनिंदा बोर्ड भले ही अपनी हरी झंडी दे देते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर यह पूरा तंत्र नियमन की स्पष्ट परिधि से बाहर काम करता है।
ब्रिटेन के पुलिस महकमे में सेवाएं दे चुके एंड्रयू एफ़ग्रेव का कहना है कि यह स्थिति इसलिए ज्यादा पेचीदा है क्योंकि मैदान में उतरने वाले खिलाड़ी अब औपचारिक अनुबंधित ढांचे से बाहर हो चुके हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता और प्रभाव आज भी बेहद विशाल है। जब लोकप्रिय चेहरे ऐसे टूर्नामेंट्स का हिस्सा बनते हैं, तो आयोजनों की चमक बढ़ जाती है, भले ही उनके पीछे कोई ठोस प्रशासनिक निगरानी मौजूद न हो।
प्रदर्शनी क्रिकेट और खेल की साख का सवाल
प्रशंसकों के मन में अपने दौर के महान क्रिकेटरों को दोबारा मैदान पर देखने की ललक हमेशा बनी रहती है। लोग बचपन में देखे गए अपने पसंदीदा सितारों को फिर से चौके-छक्के लगाते देखना चाहते हैं। हालांकि, इस पुरानी भावना और खेल से जुड़े नैतिक खतरों के बीच एक नाजुक संतुलन साधना बेहद जरूरी हो गया है। जब इन प्रतियोगिताओं से साख को पहुंचने वाले नुकसान के बारे में पूछा गया, तो एसीयू प्रमुख ने स्वीकार किया कि जोखिम से इनकार नहीं किया जा सकता, हालांकि इन आयोजनों को बड़े पैमाने पर प्रदर्शनी या उत्सव शैली के क्रिकेट के तौर पर भी देखा जाता है।
भारत सहित कई प्रमुख देशों के पूर्व दिग्गज क्रिकेटर हाल के वर्षों में इन लीग्स का मुख्य आकर्षण बनकर उभरे हैं। आयोजक इन नामों के जरिए भारी दर्शक वर्ग और व्यावसायिक प्रायोजन जुटाते हैं। लेकिन जैसे-जैसे इन निजी मुकाबलों की संख्या बढ़ी है, वैसे-वैसे इनकी पारदर्शिता को लेकर उठने वाले सवालों का दायरा भी विस्तृत हुआ है।
श्रीलंका टूर्नामेंट और भ्रष्टाचार के पुराने मामले
इन गैर-विनियमित प्रतियोगिताओं पर लगने वाले आरोपों की फेहरिस्त केवल आशंकाओं तक सीमित नहीं है। वर्ष 2024 में श्रीलंका के भीतर आयोजित हुई एक ऐसी ही प्रतियोगिता में टीम मालिकों पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के संगीन आरोप लगे थे। इस घटनाक्रम का संदर्भ देते हुए एसीयू प्रमुख ने जोर देकर कहा कि वे किसी भी तरह से जोखिम को नजरअंदाज करने के पक्ष में नहीं हैं।
मूल चुनौती यह स्पष्ट करने की है कि आधिकारिक क्रिकेट व्यवस्था की सीमा रेखा कहाँ समाप्त होती है और स्वतंत्र प्रदर्शन कहाँ से शुरू होता है। दर्शकों के लिए यह समझना जरूरी है कि फ्रेंचाइजी आधारित मुख्य लीग, आईसीसी के आधिकारिक वैश्विक टूर्नामेंट या रणजी ट्रॉफी जैसी प्रतिष्ठित प्रथम श्रेणी प्रतियोगिताओं और इन पूर्व खिलाड़ियों के आयोजनों में जमीन-आसमान का फर्क है।
खिलाड़ियों में जागरूकता और 28 औपचारिक आरोप
खेल के भीतर संदिग्ध गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए निगरानी तंत्र ने अपने अभियान को लगातार तेज किया है। एसीयू के दायरे में 333 द्विपक्षीय अंतरराष्ट्रीय मैचों को कवर किया गया है, जिसके दौरान भ्रष्टाचार विरोधी नियमों के उल्लंघन को लेकर 28 औपचारिक आरोप तय किए गए हैं।
खिलाड़ियों के रुख में भी अब स्पष्ट और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। संदिग्ध लोगों की ओर से मिलने वाले अनुचित प्रस्तावों की जानकारी अब खिलाड़ी खुद आगे आकर शत-प्रतिशत रिपोर्ट कर रहे हैं। पहले के दौर में भ्रष्टाचार विरोधी शाखा को महज एक पुलिसिया जांच एजेंसी की तरह देखा जाता था, जिससे खिलाड़ी दूरी बनाए रखते थे। अब संवाद कार्यक्रमों के जरिए दृष्टिकोण बदला गया है। खिलाड़ियों को यह समझाया जा रहा है कि वे अनजाने में आसान शिकार बन सकते हैं, इसलिए उन्हें प्रशिक्षित करना, सहयोग देना और उनमें व्यवस्था के प्रति विश्वास कायम करना निगरानी तंत्र की प्राथमिकता है।



















