पश्चिम एशिया के आसमान में जारी भीषण सैन्य टकराव के बीच अमेरिकी रक्षा तंत्र को अब तक का सबसे बड़ा रणनीतिक और वित्तीय झटका लगा है. सैन्य मोर्चे पर चलाए गए व्यापक अभियान के दौरान अमेरिका को अपने 81 महत्वपूर्ण सैन्य विमानों और मानवरहित टोही ड्रोन से हाथ धोना पड़ा है. आसमान में हुई इस व्यापक तबाही का वित्तीय आकलन 3.3 बिलियन डॉलर से अधिक लगाया गया है, जो भारतीय मुद्रा में 27,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा बैठता है. इस भारी क्षति के विवरण सामने आने के बाद वॉशिंगटन के सत्ता गलियारों और रक्षा मुख्यालय में नीतियों की समीक्षा को लेकर गंभीर हलचल शुरू हो गई है, जबकि नेतृत्व की रणनीतिक प्राथमिकताओं पर भी तीखे सवाल खड़े किए जा रहे हैं.
अति-आधुनिक हथियारों का भारी वित्तीय नुकसान
युद्धक्षेत्र में नष्ट हुए साजो-सामान का दायरा केवल संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने रक्षा बजट की रीढ़ माने जाने वाले अत्याधुनिक और महंगे रक्षा उपकरणों को भारी नुकसान पहुंचाया है. नष्ट हुए विमानों की व्यक्तिगत लागत इतनी अधिक है कि इसने रक्षा विश्लेषकों को चौंका दिया है. पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर F-35A लाइटनिंग II, जो रडार से बच निकलने की अपनी क्षमता के लिए विश्व विख्यात है, उसकी एक इकाई की कीमत ही करीब 92 मिलियन डॉलर यानी 770 करोड़ रुपये से ऊपर है. इस युद्ध में ऐसा एक बेशकीमती विमान नष्ट हुआ है.
दूर संवेदी और निगरानी अभियानों की रीढ़ कहे जाने वाले MQ-9 रीपर ड्रोन की तबाही का आंकड़ा सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है. इस पूरे अभियान के दौरान कुल 45 MQ-9 रीपर मल्टी-रोल अनक्रूइड ड्रोन तबाह हो चुके हैं. प्रत्येक रीपर ड्रोन का निर्माण खर्च 30 मिलियन डॉलर से लेकर 50 मिलियन डॉलर के बीच रहता है, जिसका अर्थ है कि एक ड्रोन की लागत ही 250 से 400 करोड़ रुपये के बराबर पड़ती है. इसके अलावा, सटीक हमलों के लिए प्रयुक्त होने वाले F-15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान की प्रति यूनिट कीमत 30 मिलियन डॉलर से अधिक यानी 250 करोड़ रुपये से ज्यादा बैठती है.
रणनीतिक निगरानी और कमान नियंत्रण के मामले में बोइंग 707 एयरलाइनर के आधार पर तैयार किया गया E-3 सेन्ट्री एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AWACS) विमान बेड़े का सबसे दुर्लभ हिस्सा था. इस अकेले विमान की लागत लगभग 270 मिलियन डॉलर यानी 2,250 करोड़ रुपये के आसपास है. यह क्षति बेहद गंभीर इसलिए भी है क्योंकि अमेरिकी वायु सेना के सक्रिय बेड़े में ऐसे पूर्णतः संचालित होने वाले केवल 32 विमान ही मौजूद थे.
नष्ट और क्षतिग्रस्त हुए रक्षा बेड़े का ब्योरा
सेंट्रल कमांड के तहत संचालित किए गए हवाई और जमीनी अभियानों के दौरान नष्ट हुए विमानों की सूची काफी लंबी है. विध्वंसक हमलों, दुर्घटनाओं और रक्षा प्रणालियों की चपेट में आने से वायु सेना और नौसेना के कई प्रमुख प्रारूप जमींदोज हो गए हैं
- लड़ाकू विमान: 12 F-15E स्ट्राइक ईगल जेट्स और 1 पांचवीं पीढ़ी का F-35A लाइटनिंग II स्टील्थ विमान.
- जमीनी हमले और निगरानी विमान: 2 A-10 थंडरबोल्ट II क्लोज एयर सपोर्ट विमान और 1 E-3 सेन्ट्री अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल विमान.
- ईंधन भरने और विशेष अभियान विमान: हवा में ईंधन भरने वाले 7 KC-135 स्ट्रैटोटैंकर और विशेष अभियानों के लिए प्रयुक्त 2 MC-130J कमांडो II विमान.
- खोज और बचाव हेलीकॉप्टर: 1 HH-60W जोली Green II कॉम्बैट सर्च-एंड-रेस्क्यू हेलीकॉप्टर.
- मानवरहित हवाई वाहन (ड्रोन): 45 MQ-9 रीपर ड्रोन, 3 MQ-1 मल्टी-रोल ड्रोन और 1 उच्च-ऊंचाई वाला लंबी दूरी का MQ-4C ट्राइटन ड्रोन.
- रोटरी-विंग और समुद्री हेलिकॉप्टर: आमने-सामने के मोर्चे पर 1 AH-64 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर, 4 हल्के AH-6 लिटिल बर्ड अटैक हेलीकॉप्टर और 1 नौसैनिक MH-60 सी हॉक हेलीकॉप्टर भी गंवाया गया है.
अपनी ही रक्षा प्रणालियों की भारी चूक और हवाई अड्डों पर हमले
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा झटका यह रहा कि अमेरिकी विमान केवल विरोधी सेना की मिसाइलों से ही नष्ट नहीं हुए, बल्कि कई मामलों में समन्वय की भयंकर खामी सामने आई. 2 मार्च 2026 को कुवैत के ऊपर उड़ान भरते समय एयर डिफेंस नेटवर्क और सहयोगी बलों की गंभीर गफलत यानी फ्रेंडली फायर के चलते अपने ही 3 F-15E स्ट्राइक ईगल विमानों को मार गिराया गया. इसके बाद अप्रैल महीने में एक और F-15 जेट तबाह हुआ जब वह सीधे ईरान की सीमा के भीतर उड़ान भर रहा था.
इसके अतिरिक्त, सहयोगी देशों में स्थित सैन्य ठिकानों की सुरक्षा भी पूरी तरह अभेद्य साबित नहीं हो सकी. 9 और 10 सितंबर 2026 को जॉर्डन के मुवफ्फक साल्टी एयर बेस पर ईरान द्वारा किए गए तीव्र हवाई हमलों के दौरान रनवे और हैंगर पर खड़े अमेरिकी सेना के कम से कम 8 अन्य F-15E विमान अत्यधिक गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गए. इस दोहरे आघात ने रक्षा योजनाकारों को अपनी बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा करने पर मजबूर कर दिया है.
गोला-बारूद और युद्धक हथियारों के खर्च में बेतहाशा उछाल
विमानों और ड्रोन के भौतिक नुकसान से इतर, युद्धक्षेत्र में दागे जा रहे स्मार्ट हथियारों, मिसाइलों और आधुनिक बमों का खर्च भी अत्यधिक तेजी से बढ़ा है. बजट अनुमानों में हथियारों की खपत को लेकर जो प्रारंभिक गणना की गई थी, वह कुछ ही हफ्तों में पूरी तरह ध्वस्त हो गई. शुरुआती आधिकारिक आंकड़ों में हथियारों की खपत का यह वित्तीय भार 21.7 बिलियन डॉलर दर्ज किया गया था.
हालांकि, सेंट्रल कमांड के नवीनतम आकलन के अनुसार, यह आंकड़ा एक महीने से थोड़े अधिक समय के अंतराल में तेजी से उछलकर 28.1 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. इसका सीधा अर्थ यह है कि महज 30 से 40 दिनों की सैन्य कार्रवाई के दौरान 6.4 बिलियन डॉलर यानी करीब 53,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त गोला-बारूद झोंक दिया गया. खर्च में आया यह अभूतपूर्व उछाल यह दर्शाता है कि संघर्ष की तीव्रता शुरुआती अनुमानों की तुलना में कहीं अधिक घातक और संसाधन-खपत वाली साबित हुई है.
भविष्य की अनिश्चितता और राजनीतिक जवाबदेही
रक्षा जानकारों का मानना है कि नुकसान के ये आंकड़े अभी अंतिम नहीं माने जा सकते, क्योंकि सैन्य अभियान लगातार जारी है और कई अत्यंत संवेदनशील सूचनाओं का रणनीतिक कारणों से तत्काल खुलासा नहीं किया जा सकता. दुर्घटनाओं और क्षतियों की सटीक जिम्मेदारी निर्धारित करने की प्रक्रिया में अभी समय लग रहा है. हालांकि तकनीकी विशेषज्ञों ने यह आशा अवश्य जताई है कि आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए विमानों को मरम्मत और आवश्यक पुर्जे बदलकर दोबारा सेवा में उतारा जा सकता है. लेकिन हथियारों की इतनी बड़ी बर्बादी और लगातार बढ़ते खर्च ने व्हाइट हाउस और सैन्य नेतृत्व के सामने गंभीर रणनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं.



















