भारतीय महिला क्रिकेट को वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाली स्टार खिलाड़ी हरमनप्रीत कौर ने राष्ट्रीय टीम की कमान छोड़ दी है। 6 अक्टूबर 2026 को उन्होंने तीनों प्रारूपों के कप्तानी पद से हटने का ऐलान करते हुए स्पष्ट किया कि वह आगे भी एक खिलाड़ी के तौर पर मैदान पर तिरंगे का प्रतिनिधित्व करती रहेंगी। अपने विदाई संदेश में उन्होंने इसे भावनाओं, अनगिनत यादों और बड़े त्यागों से भरा हुआ अत्यंत कठिन फैसला बताया। पंजाब के एक छोटे से जिले से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को गौरव दिलाने तक उनका यह सफर असाधारण उपलब्धियों के साथ-साथ कई कड़े इम्तिहानों और विवादों से भी भरा रहा है।
मोगा की गलियों से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की दहलीज तक
हरमनप्रीत कौर भुल्लर की परवरिश खेल संस्कृति से जुड़े परिवार में हुई। उनका जन्म 8 मार्च 1989 को पंजाब के मोगा जिले में हुआ था। उनके पिता हरमंदर सिंह भुल्लर खुद वॉलीबॉल और बास्केटबॉल के सक्रिय खिलाड़ी रहे, जबकि उनकी मां सतविंदर कौर और छोटी बहन हेमजीत कौर ने हमेशा उन्हें प्रोत्साहित किया। पारिवारिक माहौल के चलते शुरुआत में उनका ध्यान हॉकी और बैडमिंटन की ओर भी गया, मगर जल्द ही क्रिकेट उनका एकमात्र जुनून बन गया। उस दौर में मोगा जैसे छोटे शहर में लड़कियों के लिए पेशेवर खेल सुविधाएं सीमित थीं। ऐसे में उन्होंने लड़कों के साथ गली क्रिकेट खेलकर अपने खेल को मांजा। उनके शुरुआती कोच कमलदीश सिंह सोढ़ी ने ज्ञान ज्योति स्कूल अकादमी में उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें कड़ा अभ्यास कराया। लड़कों के साथ प्रतिस्पर्धी माहौल में खेलने की वजह से ही उनके खेल में वह आक्रामक और निडर शैली विकसित हुई, जो आगे चलकर दुनिया भर में उनकी पहचान बनी।
पढ़ाई, शुरुआती संघर्ष और दूरस्थ शिक्षा का विवाद
खेल के साथ शिक्षा का तालमेल बैठाना हरमनप्रीत के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा। प्राथमिक शिक्षा मोगा में पूरी करने के बाद उन्होंने जालंधर स्थित हंस राज महिला महाविद्यालय से अध्ययन किया। दैनिक अभ्यास, खेल के लिए लगातार यात्राएं और पढ़ाई के बीच संतुलन साधना आसान नहीं था, लेकिन परिवार और स्कूल प्रशासन के सहयोग से उनका सफर आगे बढ़ता रहा। बाद में उन्होंने 2009 से 2011 के दौरान मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी से दूरस्थ माध्यम के जरिए कला स्नातक यानी बीए की डिग्री प्राप्त करने की बात कही थी। हालांकि, कई वर्षों बाद यही डिग्री उनके प्रशासनिक करियर में एक अप्रत्याशित विवाद का कारण बन गई।
ग्रेजुएशन डिग्री की जांच और सामने आई प्रशासनिक उलझनें
साल 2018 में जब पंजाब पुलिस ने उनकी शैक्षणिक योग्यता के दस्तावेजों का सत्यापन कराया, तब चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी मेरठ में उनके रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं पाए गए। जांच प्रक्रिया में संबंधित डिग्री को फर्जी घोषित कर दिया गया, जिससे खेल जगत में हड़कंप मच गया। इस पूरे घटनाक्रम पर हरमनप्रीत कौर का कहना था कि उन्हें दस्तावेजों में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की पूर्व जानकारी नहीं थी। उनके अनुसार दाखिले की औपचारिकताएं उनके कोच के जरिए पूरी हुई थीं और यह आश्वासन मिला था कि व्यस्त खेल कार्यक्रम को देखते हुए परीक्षाओं में खिलाड़ियों को छूट मिलेगी। लगातार दौरों और मैचों के कारण वह कुछ परीक्षाएं नहीं दे सकी थीं और बाद में उन्हें प्रमाण पत्र थमा दिया गया था। उस समय पंजाब सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों ने माना कि देश का नाम रोशन करने वाली एक शीर्ष एथलीट होने के नाते और उनके अनभिज्ञ रहने के पक्ष को देखते हुए मामले में कठोर रुख नहीं अपनाया गया।
रेलवे की सेवा, डीएसपी की नियुक्ति और पद से जुड़ी मुश्किलें
साल 2017 के महिला विश्व कप में ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध खेली गई 171 रनों की आतिशी पारी ने हरमनप्रीत को देश भर में रातोंरात नायक बना दिया था। इस बेजोड़ प्रदर्शन के सम्मान में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उन्हें राज्य पुलिस में पुलिस उपाधीक्षक यानी डीएसपी पद सौंपने का निर्णय लिया। हालांकि उस समय वह भारतीय रेलवे में सेवारत थीं और पांच वर्ष का सेवा अनुबंध पूरा न होने के कारण रेलवे उन्हें कार्यमुक्त करने में आनाकानी कर रहा था। मुख्यमंत्री स्तर पर दखल के बाद रेलवे से मंजूरी मिली और मार्च 2018 में उन्होंने पंजाब पुलिस में अंडर-ट्रेनिंग डीएसपी का कार्यभार संभाला। मगर कुछ ही महीनों के भीतर डिग्री सत्यापन का विवाद सामने आने से इस प्रशासनिक पद पर संकट गहरा गया और उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
ऐतिहासिक विश्व कप जीत और एशियन गेम्स का स्वर्णिम दोहराव
तमाम व्यक्तिगत और प्रशासनिक बाधाओं को पीछे छोड़ते हुए हरमनप्रीत ने मैदान पर अपना ध्यान केंद्रित रखा। उनकी कप्तानी में भारतीय महिला टीम ने साल 2025 में इतिहास रचते हुए पहली बार महिला वनडे विश्व कप की चमचमाती ट्रॉफी अपने नाम की। इस ऐतिहासिक कामयाबी के बाद साल 2026 में उनकी अगुवाई वाली भारतीय टीम ने एशियन गेम्स में लगातार दूसरा स्वर्ण पदक जीतकर अपनी बादशाहत साबित की। उतार-चढ़ाव भरे इस पूरे सफर में उन्होंने यह साबित किया कि मैदान के बाहर के संकट भी उनके प्रदर्शन और नेतृत्व क्षमता को डिगा नहीं सके। अब कप्तानी छोड़ने के बाद भी भारतीय क्रिकेट प्रेमी उन्हें एक बल्लेबाज के रूप में लंबे समय तक मैदान पर देखना चाहते हैं।



















