भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसे महत्वपूर्ण क्षण आए हैं जिन्होंने इस खेल के पूरे परिदृश्य को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। ऐसा ही एक युगांतकारी निर्णय वीरेंद्र सहवाग को मध्यक्रम से हटाकर एक सलामी बल्लेबाज के रूप में मैदान पर उतारने का था। वर्तमान समय में दुनिया भर के क्रिकेट प्रशंसक और विशेषज्ञ सहवाग को खेल के इतिहास के सबसे आक्रामक और मनोरंजक सलामी बल्लेबाजों में गिनते हैं। हालांकि, अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआती समय में वे निचले और मध्यक्रम में बल्लेबाजी किया करते थे। एक अप्रत्याशित विचार ने न केवल इस खिलाड़ी के करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि रेड-बॉल और व्हाइट-बॉल क्रिकेट में बल्लेबाजी के स्थापित तौर-तरीकों को पूरी तरह से नया आकार दिया।
जहीर खान की सलाह और सौरव गांगुली का भरोसा
वर्षों से आम प्रशंसकों और विशेषज्ञों के बीच यह धारणा बनी रही है कि वीरेंद्र सहवाग को ओपनर बनाने का फैसला तत्कालीन भारतीय कप्तान सौरव गांगुली या तत्कालीन मुख्य कोच जॉन राइट का था। लेकिन इस फैसले के पीछे की वास्तविक कहानी काफी रोचक है। इस बड़े रणनीतिक बदलाव के पीछे किसी बल्लेबाज का नहीं, बल्कि भारतीय तेज गेंदबाजी आक्रमण के मुख्य गेंदबाज जहीर खान का दिमाग था।
सहवाग ने इस ऐतिहासिक घटना का ब्योरा पूर्व पाकिस्तानी तेज गेंदबाज शोएब अख्तर के साथ हुई एक विस्तृत बातचीत में साझा किया था। उस चर्चा के दौरान जब शोएब ने वर्ष 1999 के एक मुकाबले का जिक्र करते हुए पूछा कि सहवाग जैसा आक्रामक बल्लेबाज सातवें नंबर पर बल्लेबाजी करने क्यों उतर रहा था, तो सहवाग ने स्पष्ट किया कि उस दौर में वे मध्यक्रम में ही बल्लेबाजी करते थे। इसके बाद जब उनसे यह सवाल किया गया कि आखिरकार उन्हें शीर्ष क्रम में भेजने का विचार किसका था, तो सहवाग ने खुलासा किया कि यह सुझाव सबसे पहले जहीर खान ने कप्तान सौरव गांगुली के सामने रखा था।
सौरव गांगुली ने जहीर खान की इस सलाह की अहमियत को समझा और सहवाग पर भरोसा जताते हुए उन्हें पारी की शुरुआत करने का जिम्मा सौंपा। हालांकि, मध्यक्रम से शीर्ष क्रम में जाना एक बड़ा जोखिम था। इसलिए सहवाग ने गांगुली से हंसी-मजाक में लिखित आश्वासन मांगा कि यदि वे ओपनर के तौर पर असफल हो जाते हैं, तो उन्हें टीम से बाहर नहीं किया जाएगा। गांगुली ने सहवाग को पूरा भरोसा दिया कि खराब प्रदर्शन की स्थिति में भी उनकी टीम में जगह सुरक्षित रहेगी।
सचिन तेंदुलकर की चोट और ओपनिंग करियर की शुरुआत
सहवाग के लिए वनडे क्रिकेट में ओपनिंग करने का पहला मौका एक अप्रत्याशित परिस्थिति के कारण आया। जुलाई 2001 में श्रीलंका और न्यूजीलैंड के खिलाफ आयोजित तीन देशों की वनडे सीरीज के दौरान महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर चोटिल हो गए थे। सचिन की अनुपस्थिति के कारण भारतीय टीम प्रबंधन ने सहवाग को सौरव गांगुली के साथ पारी की शुरुआत करने का अवसर दिया। सहवाग ने इस मौके को भुनाया और अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी का प्रदर्शन किया।
इसके बाद वर्ष 2002 में भारतीय टीम के इंग्लैंड दौरे के समय सहवाग को पहली बार टेस्ट क्रिकेट में भी ओपनिंग करने की जिम्मेदारी दी गई। उस दौर में टेस्ट मैचों में लाल गेंद के सामने तकनीक, संयम और रक्षात्मक खेल को ही सफलता की कुंजी माना जाता था। लेकिन सहवाग ने अपने निडर दृष्टिकोण से पारंपरिक क्रिकेट के स्थापित सिद्धांतों को चुनौती दी। मैच की पहली ही गेंद से विपक्षी गेंदबाजों पर दबाव बनाने की उनकी कला ने भारतीय टीम को विदेशी सरजमीं पर कई यादगार और ऐतिहासिक जीत दिलाईं।
टेस्ट क्रिकेट में मुल्तान के सुल्तान का ऐतिहासिक रिकॉर्ड
अपने अंतरराष्ट्रीय टेस्ट करियर के दौरान सहवाग ने कुल 104 टेस्ट मैचों की 180 पारियों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस सबसे लंबे प्रारूप में उन्होंने लगभग 49.34 के शानदार औसत से कुल 8,586 रन बनाए। पारंपरिक टेस्ट क्रिकेट को वनडे के आक्रामक अंदाज में खेलने वाले सहवाग ने अपने करियर में 23 शतक और 32 अर्धशतक जड़े।
सहवाग टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में दो बार तिहरा शतक बनाने वाले भारत के पहले बल्लेबाज बने। पाकिस्तान के खिलाफ मुल्तान में खेली गई 309 रनों की यादगार पारी के बाद उन्हें मुल्तान का सुल्तान का खिताब मिला। इसके अलावा चेन्नई के मैदान पर दक्षिण अफ्रीका के मजबूत गेंदबाजी आक्रमण के सामने बनाई गई 319 रनों की पारी आज भी विश्व क्रिकेट के सबसे आक्रामक तिहरे शतकों में गिनी जाती है।
वनडे और टी20 प्रारूप में विस्फोटक बल्लेबाजी का जलवा
सीमित ओवरों के क्रिकेट में भी सहवाग की बल्लेबाजी का दबदबा पूरी तरह से कायम रहा। उन्होंने अपने करियर में 251 वनडे अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले, जिनमें 35.05 के औसत और 104 से अधिक के बेहतरीन स्ट्राइक रेट के साथ 8,273 रन बनाए। वनडे क्रिकेट में उनके नाम 15 शतक और 38 अर्धशतक दर्ज हैं। इंदौर के स्टेडियम में वेस्टइंडीज के खिलाफ लगाया गया 219 रनों का दोहरा शतक वनडे इतिहास के सबसे विध्वंसक दोहरे शतकों में शामिल है।
टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के शुरुआती दौर में भी सहवाग ने भारतीय टीम के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 19 टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले, जिनमें दो अर्धशतकों की मदद से 394 रन बनाए। शुरुआती पावरप्ले ओवरों में गेंदबाजों पर हावी होकर तेज शुरुआत दिलाने की उनकी क्षमता ने भारत को कई मैचों में मजबूत स्थिति में पहुंचाया।
2007 और 2011 विश्व कप की खिताबी जीत में योगदान
सहवाग का योगदान केवल व्यक्तिगत आंकड़ों और शतकों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि वे भारतीय क्रिकेट के उस ऐतिहासिक युग के मुख्य स्तंभ थे जिसने देश को दो विश्व कप खिताब दिलाए। वर्ष 2007 में दक्षिण अफ्रीका की धरती पर आयोजित पहला टी20 विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम के वे प्रमुख सदस्य थे।
इसके पश्चात वर्ष 2011 में जब भारतीय टीम ने 28 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद अपनी घरेलू सरजमीं पर वनडे विश्व कप की ट्रॉफी उठाई, तब भी सहवाग ने अपनी एक अनोखी परंपरा कायम रखी। उस पूरे टूर्नामेंट के दौरान लगभग हर मुकाबले में पारी की पहली ही गेंद पर चौका जड़कर भारत को तूफानी शुरुआत दिलाना सहवाग की पहचान बन गया था।



















