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बेंगलुरु की लापता छात्रा को खोजने में मददगार बना सरकारी योजना का ओटीपी, सहेली की तलाश में जुटी सीआईडीअपराध
12 सित॰ 2026, 8:34 pm (18 दिन पहले)· 1

बेंगलुरु की लापता छात्रा को खोजने में मददगार बना सरकारी योजना का ओटीपी, सहेली की तलाश में जुटी सीआईडी

बेंगलुरु में सात महीने पहले लापता हुई 18 वर्षीय छात्रा को सीआईडी ने एक सरकारी योजना के पंजीकरण के दौरान आए ओटीपी के जरिए खोज निकाला, हालांकि उसकी नाबालिग सहेली अब भी गायब है।

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से लगभग सात महीने पहले गायब हुई 18 वर्षीय छात्रा को ढूंढने में पुलिस को एक अप्रत्याशित सुराग ने सफलता दिलाई है। तकनीकी जांच के तमाम पारंपरिक रास्ते बंद होने के बाद, सरकारी स्वास्थ्य योजना के पंजीकरण के दौरान आया एक ओटीपी इस गुत्थी को सुलझाने का जरिया बना। आपराधिक जांच विभाग (सीआईडी) ने इस सुराग का पीछा करते हुए लड़की का पता लगाने में कामयाबी हासिल की। हालांकि, इस कहानी का एक हिस्सा अब भी रहस्य बना हुआ है, क्योंकि तनिष्का के साथ लापता हुई उसकी नाबालिग सहेली का अभी तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है और जांच एजेंसियां उसकी खोज में लगातार जुटी हुई हैं।

31 जनवरी की सुबह और दो लड़कियों का लापता होना

यह पूरा मामला बेंगलुरु के विद्यारण्यपुरा इलाके का है। वहां रहने वाली तनिष्का, जो पीयूसी सेकेंड ईयर की छात्रा थी, अपनी एक नाबालिग सहेली के साथ 31 जनवरी को सामान्य दिनों की तरह घर से निकली थी। दोनों सहेलियों ने अपने परिजनों को बताया था कि वे कॉलेज जा रही हैं। जब शाम होने के बाद भी दोनों छात्राएं घर वापस नहीं लौटकर आईं, तो उनके परिवारों की चिंता बढ़ने लगी। उन्होंने अपने स्तर पर हर संभावित जगह पर पूछताछ की, लेकिन लड़कियों का कुछ पता नहीं चला।

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जांच में यह बात सामने आई कि दोनों सहेलियों ने घर छोड़ने की योजना बेहद सावधानी से बनाई थी। वे अपने मोबाइल फोन और एटीएम कार्ड घर पर ही छोड़ गई थीं। उनके पास केवल उनके आधार कार्ड और कॉलेज के बैग थे। किसी भी प्रकार का संचार उपकरण या डिजिटल लेन-देन का साधन पास न होने के कारण, पुलिस के लिए उनकी शुरुआती लोकेशन का पता लगा पाना एक बड़ी चुनौती बन गया था। जब स्थानीय स्तर पर कोई सफलता नहीं मिली, तो परिवार की शिकायत के आधार पर विद्यारण्यपुरा थाने में गुमशुदगी की प्राथमिकी दर्ज की गई।

शुरुआती कॉल और पुलिस की नाकाम कोशिशें

जांच के शुरुआती दिनों में पुलिस को एक सुराग मिला, जब यह पता चला कि घर छोड़ने के कुछ दिनों बाद दोनों लड़कियों ने अपने कुछ दोस्तों से संपर्क किया था। उन्होंने एक संक्षिप्त फोन कॉल के जरिए अपने दोस्तों को बताया कि वे चामराजनगर जिले की माले महादेश्वर पहाड़ियों में सुरक्षित हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि वे करीब एक सप्ताह के बाद दोबारा संपर्क करेंगी। हालांकि, इस बातचीत के बाद उनका कोई फोन नहीं आया, जिससे उनके दोस्तों और परिजनों की घबराहट और ज्यादा बढ़ गई।

बेंगलुरु पुलिस ने इन लड़कियों को खोजने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया था। इसके तहत 10 पुलिसकर्मियों की एक समर्पित टीम का गठन किया गया। इस टीम ने कर्नाटक और उसके पड़ोसी राज्यों में फैले लगभग 100 से अधिक संभावित स्थानों पर छापेमारी और तलाशी अभियान चलाया। तमाम कोशिशों के बावजूद पुलिस को लड़कियों का कोई पुख्ता सुराग हाथ नहीं लगा। महीनों बीत जाने के बाद भी जब कोई नतीजा नहीं निकला, तो हताश होकर पीड़ित परिवारों ने न्याय के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सीआईडी को जिम्मेदारी और आत्महत्या की कोशिश का खुलासा

मामले की गंभीरता को देखते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने अप्रैल महीने में जांच का जिम्मा विद्यारण्यपुरा पुलिस से लेकर सीआईडी को सौंप दिया। सीआईडी ने नए सिरे से जांच की रूपरेखा तैयार की और लड़कियों के गायब होने के दिन से लेकर उनके संभावित संपर्कों की गहनता से पड़ताल शुरू की। सीआईडी की तफ्तीश में दोनों छात्राओं के सफर की एक पूरी श्रृंखला सामने आई। वे बेंगलुरु से निकलने के बाद सबसे पहले मैसूरु गईं, जहां से वे चामराजनगर के एक प्रसिद्ध मंदिर पहुंचीं और अंततः माले महादेश्वर पहाड़ियों पर चली गईं।

जांच के दौरान सीआईडी के वरिष्ठ अधिकारियों को एक चौंकाने वाली जानकारी मिली। दोनों लड़कियां पढ़ाई और पारिवारिक माहौल से परेशान होकर आत्महत्या करने के इरादे से उन पहाड़ियों पर गई थीं। वे वहां अपने जीवन का अंत करने वाली थीं, लेकिन तभी पहाड़ियों पर उनकी मुलाकात दो अज्ञात युवकों से हो गई। उन युवकों ने दोनों लड़कियों को समझाया और उन्हें ऐसा घातक कदम उठाने से रोक दिया। इसके बाद, दोनों लड़कियां अलग-अलग रास्तों पर निकल गईं और उन दोनों युवकों के साथ रहने लगीं।

कनकपुरा में नया जीवन और तकनीकी रूप से छिपना

तनिष्का जिस युवक के साथ गई थी, उसके परिवार ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया। इसके बाद तनिष्का ने उस युवक के साथ एक मंदिर में विवाह कर लिया। शादी के बाद दोनों कनकपुरा तालुक के अंतर्गत आने वाले एक सुदूर गांव में पति-पत्नी की तरह रहने लगे। तनिष्का के पास अपना कोई मोबाइल फोन या निजी सिम कार्ड नहीं था, जिसके कारण वह पुलिस की पारंपरिक साइबर सेल की निगरानी से पूरी तरह बची रही। पुलिस को कई महीनों तक इस बात का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि वह किस क्षेत्र में या किस हाल में रह रही है।

बिना किसी डिजिटल फुटप्रिंट के किसी व्यक्ति को ढूंढना सीआईडी के लिए बेहद जटिल काम था। लेकिन सीआईडी को यह अच्छी तरह पता था कि तनिष्का अपने साथ अपना आधार कार्ड लेकर गई थी। अधिकारियों ने आधार कार्ड के उपयोग से जुड़े विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी डेटाबेस की निगरानी शुरू की। इसी दौरान उन्हें पता चला कि तनिष्का ने कनकपुरा में रहने के दौरान अपने आधार कार्ड का उपयोग करके एक सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत लाभ लेने के लिए पंजीकरण के लिए आवेदन किया था।

सरकारी योजना का ओटीपी और बरामदगी

तनिष्का के पास अपना कोई फोन नंबर न होने के कारण, उसने स्वास्थ्य योजना के आवेदन पत्र में अपने पति का मोबाइल नंबर दर्ज कराया था। सरकारी प्रक्रिया के नियम के अनुसार, पंजीकरण को सत्यापित करने के लिए उस मोबाइल नंबर पर एक ओटीपी भेजा गया था। सीआईडी के जासूसों ने आधार डेटाबेस के जरिए इस आवेदन और उससे जुड़े मोबाइल नंबर को ट्रैक कर लिया। नंबर हाथ आते ही सीआईडी ने उसकी लोकेशन ट्रेस की, जिससे वे सीधे कनकपुरा के उस गांव में तनिष्का के पति तक पहुंच गए। इसके बाद गहन पूछताछ और सत्यापन की प्रक्रिया के बाद पुलिस को तनिष्का का सही ठिकाना मिल गया और वह सुरक्षित बरामद कर ली गई।

कोर्ट में पेशी, गर्भावस्था और पारिवारिक उपेक्षा

तनिष्का को ढूंढने के बाद सीआईडी की टीम ने उसे कानूनी प्रक्रियाओं के तहत कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया। अदालत के निर्देशों के अनुसार, उसे बाद में उसके माता-पिता को सौंप दिया गया। पूछताछ और काउंसलिंग के दौरान तनिष्का ने सीआईडी को बताया कि वह वर्तमान में गर्भवती है। उसने घर छोड़ने के पीछे के कारणों का भी खुलासा किया। तनिष्का का कहना था कि पढ़ाई में अच्छे अंक न लाने के कारण उसके माता-पिता उसे अक्सर डांटते थे। इसके अतिरिक्त, उसे महसूस होता था कि उसके माता-पिता उसकी बड़ी बहन को उससे अधिक प्यार करते हैं और उसे घर में उपेक्षित समझा जाता था।

इस मामले का एक दुखद पहलू यह है कि तनिष्का की नाबालिग सहेली अभी भी लापता है। उसने भी घर छोड़ने से पहले अपनी सहेली से घरेलू उपेक्षा की बात साझा की थी। पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि सहेली के परिवार में बेटा पाने की चाहत को लेकर अक्सर तनाव का माहौल रहता था, जिससे वह मानसिक रूप से काफी परेशान थी। सीआईडी अब अपनी पूरी ताकत उस नाबालिग लड़की को सुरक्षित ढूंढ निकालने में लगा रही है ताकि इस दोहरे लापता मामले का पूरी तरह से पटाक्षेप हो सके।

सवाल-जवाब

सीआईडी ने सात महीने बाद लापता छात्रा का पता कैसे लगाया?
सीआईडी ने उसका पता तब लगाया जब उसने एक सरकारी स्वास्थ्य योजना के लिए अपने आधार कार्ड का उपयोग किया और अपने पति का मोबाइल नंबर दिया, जिस पर ओटीपी भेजा गया था।
तनिष्का ने बेंगलुरु में अपना घर क्यों छोड़ा था?
उसने शैक्षणिक दबाव, पढ़ाई को लेकर माता-पिता की डांट और अपनी बड़ी बहन की तुलना में घर में उपेक्षित महसूस करने के कारण घर छोड़ा था।
घर छोड़ने के बाद दोनों लड़कियों ने क्या करने की योजना बनाई थी?
सीआईडी के अनुसार, दोनों लड़कियां अपनी जान देने के इरादे से माले महादेश्वर पहाड़ियों पर गई थीं, लेकिन दो युवकों ने उन्हें रोक लिया।
तनिष्का के साथ लापता हुई नाबालिग सहेली का क्या हुआ?
नाबालिग सहेली अभी भी लापता है, और सीआईडी उसे ढूंढने के लिए लगातार तलाशी अभियान चला रही है।
आत्महत्या के प्रयास से रोके जाने के बाद तनिष्का ने क्या किया?
उसने मदद करने वाले युवक के साथ मंदिर में शादी कर ली और वे कनकपुरा तालुक के एक गांव में रहने लगे।
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