भारतीय न्यायपालिका ने एक महत्वपूर्ण फैसले के तहत छह यूक्रेनी नागरिकों की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। इन आरोपियों ने हिरासत में रहते हुए अपने परिजनों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संवाद करने की गुहार लगाई थी। जेल प्रशासन से अनुमति न मिलने के बाद इन लोगों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं ने 26 दिसंबर 2022 के उस निर्देश को चुनौती दी थी जिसके तहत विदेशी बंदियों को ई-मुलाकात या वीडियो कॉल के माध्यम से परिवार से बातचीत करने से प्रतिबंधित किया गया है।
याचिका में इस नियम को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के विपरीत बताया गया था। अदालत के समक्ष दलील दी गई थी कि परिजनों से मिलने से वंचित रखना किसी भी कैदी की मानवीय गरिमा और मानसिक स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है तथा उसे बाहरी दुनिया से काट देता है। न्यायमूर्ति नवीन चावला की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को खारिज कर दिया और मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर को तय की है। इससे पहले भी इस अदालत ने एक अन्य याचिका को नामंजूर किया था जिसमें निचली अदालत के उस निर्णय को चुनौती दी गई थी जिसके जरिए इन विदेशी नागरिकों की जांच अवधि 90 दिनों से बढ़ाकर 180 दिन कर दी गई थी।
क्या है पूरा मामला और कैसे हुई गिरफ्तारियां
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत सात महीने पहले हुई जब भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने देश के अलग-अलग हवाई अड्डों से छह यूक्रेनी नागरिकों को हिरासत में लिया। इनमें से तीन को लखनऊ से और तीन को दिल्ली हवाई अड्डे से पकड़ा गया था। इसके अतिरिक्त ब्यूरो ऑफ इमग्रेशन ने कोलकाता से एक अमेरिकी नागरिक को भी दबोचा था। हालांकि उस समय यह स्पष्ट नहीं हो सका था कि वे म्यांमार की सीमा से आ रहे थे या वहां जा रहे थे। इसके तुरंत बाद 16 मार्च को इन सभी आरोपियों को पटियाला हाउस कोर्ट स्थित विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी अदालत में पेश किया गया।
इन सभी के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज की गई। अदालत ने शुरुआत में इन्हें 11 दिनों की हिरासत में भेजा था, जिसकी अवधि बाद में बढ़ाकर पहले तीन महीने और फिर छह महीने कर दी गई। केंद्रीय एजेंसी के अनुसार ये सभी व्यक्ति वैध वीजा पर भारत आए थे लेकिन इसके बाद मिजोरम के प्रतिबंधित क्षेत्रों में पहुंच गए। वहां से वे म्यांमार की सीमा पार कर गए और स्थानीय सशस्त्र उग्रवादी गुटों के संपर्क में आ गए।
विदेशी धरती पर सैन्य प्रशिक्षण और ड्रोन संचालन के आरोप
जांच एजेंसी का यह दावा है कि इन विदेशी नागरिकों ने म्यांमार में जाकर वहां के उग्रवादी संगठनों से प्रशिक्षण प्राप्त किया और बदले में वे उन समूहों को सैन्य ट्रेनिंग दे रहे थे। ये विद्रोही समूह भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय उग्रवादी संगठनों से भी जुड़े बताए जाते हैं। इसके अलावा इन पर यूरोप से ड्रोन की भारी खेप भारत लाने और उनका इस्तेमाल करने का भी गंभीर आरोप है।
जांच में पकड़े गए व्यक्तियों की पहचान अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरन वैनडाइक और पांच यूक्रेनी नागरिकों हुरबा पेट्रो, स्लीवियाक तारास, इवान सुकमनोव्स्की, स्टेफनकिव मारियन, होंचारुक मक्सिम तथा कामिन्स्की विक्टर के रूप में हुई है। अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरन वैनडाइक की निजी वेबसाइट के अनुसार उन्होंने पूर्व में इराक युद्ध और लीबिया के गृह युद्ध में भाग लिया था। वह वॉशिंगटन, डीसी स्थित एक सलाहकार फर्म के संस्थापक हैं। इस फर्म के संबंध में वेबसाइट पर जानकारी दी गई है कि यह संकटग्रस्त क्षेत्रों में सहायता और सुरक्षा संबंधी परामर्श सेवाएं उपलब्ध कराती है ताकि लोग विद्रोही समूहों से मुकाबला कर सकें।
पूर्वोत्तर के संवेदनशील क्षेत्रों में अनधिकृत प्रवेश
ये सभी आरोपी बिना किसी वैध परमिट के भारत के पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम में दाखिल हुए और वहां से गैरकानूनी ढंग से म्यांमार चले गए। जांच एजेंसी ने अदालत को पूर्व में अवगत कराया था कि ये विदेशी म्यांमार में उन सशस्त्र गुटों को ड्रोन युद्ध की तकनीक सिखाने गए थे जो वहां की सैन्य सरकार के खिलाफ संघर्षरत हैं। मणिपुर और मिजोरम जैसे भारतीय पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाएं म्यांमार के चिन राज्य से मिलती हैं जहां लंबे समय से जातीय संघर्ष जारी है।
इन राज्यों में सक्रिय जातीय समूह म्यांमार के भीतर भी सक्रिय हैं और वहां की सरकार से लोहा ले रहे हैं। यही कारण है कि सामरिक रूप से संवेदनशील इन पूर्वोत्तर राज्यों में प्रवेश करने से पहले विदेशी नागरिकों के लिए भारत सरकार से विशेष अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य होता है। इस मामले में आरोपियों की हरकतों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है।
किन कानूनी धाराओं के तहत की गई है कार्रवाई
इन सभी आरोपियों के विरुद्ध भारत की संप्रभुता, अखंडता और कानून व्यवस्था को खंडित करने के प्रयास के आरोप में मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इनमें मुख्य रूप से दो प्रमुख कानूनों का इस्तेमाल किया गया है।
पहला कानून गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम, 1967 है जो देश का प्रमुख आतंकवाद विरोधी कानून माना जाता है। इसकी धारा 18 के तहत भारत या किसी मित्र राष्ट्र में अशांति फैलाने और आतंकवादी कृत्यों की साजिश रचने का आरोप है। वहीं धारा 20 के तहत किसी प्रतिबंधित या सशस्त्र उग्रवादी संगठन का समर्थन करने और उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देने का मामला बनता है।
दूसरा कानून विदेशी अधिनियम, 1946 है। इसकी धारा 14, 14ए और 14बी के अंतर्गत बिना वैध दस्तावेजों या अनुमति पत्रों के भारत के प्रतिबंधित और संरक्षित क्षेत्रों में अनधिकृत रूप से प्रवेश करने तथा वीजा नियमों का उल्लंघन करने के आरोप लगाए गए हैं। इन तमाम गंभीर आरोपों के चलते इनकी मुश्किलें लगातार बनी हुई हैं।


















