असम में गौहाटी हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और जटिल मामले की सुनवाई करते हुए 38 दिन की बच्ची की कथित हत्या के आरोप में उम्रकैद भुगत रही मां को पूरी तरह बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस की मौजूदगी में लिए गए कथित कबूलनामे को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके साथ ही खंडपीठ ने इस बात पर भी गंभीरता से ध्यान दिलाया कि निचली अदालत में सुनवाई के दौरान बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं में पैदा होने वाली गंभीर मानसिक स्थिति यानी पोस्टपार्टम साइकोसिस की संभावना पर विचार तक नहीं किया गया था। इस कानूनी और चिकित्सकीय दृष्टिकोण के अभाव में ट्रायल कोर्ट का फैसला कानूनी समीक्षा के दायरे में टिक नहीं पाया।
साल 2016 की रात और बच्ची के लापता होने की घटना
यह पूरा कानूनी विवाद साल 2016 में शुरू हुआ था, जब परिवार के मुखिया यानी महिला के पति ने थाने में जाकर अपनी नवजात बच्ची के गायब होने की सूचना दी थी। पति की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत के मुताबिक, उनकी महज एक महीने और आठ दिन की बच्ची रात के वक्त रहस्यमय तरीके से घर से लापता हो गई थी। इस सूचना के बाद पुलिस दल हरकत में आया और घर के सभी सदस्यों से गहन पूछताछ का सिलसिला शुरू किया गया।
इसी जांच और पूछताछ की प्रक्रिया के दौरान पुलिस ने दावा किया कि महिला ने अपने बच्चे की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली थी। पुलिस के बयानों में यह बात दर्ज की गई कि महिला ने नवजात को पास बहने वाली दिकोह नदी में फेंक दिया था। इस इकबालिया बयान के आधार पर पुलिस ने मामले को सीधे तौर पर हत्या की धारा के तहत आगे बढ़ाया और कानूनी शिकंजा कस दिया।
पति के विरोधाभासी बयान और जांच की विसंगतियां
इस पूरे मामले में पुलिस की थ्योरी और पति के मूल बयान के बीच शुरुआत से ही एक गहरा विरोधाभास मौजूद था। पुलिस जहां महिला द्वारा खुद बच्ची को दिकोह नदी में फेंकने की बात कबूलने का दावा कर रही थी, वहीं महिला के पति ने पूछताछ में साफ तौर पर बताया था कि जब उसने अपनी पत्नी से बच्ची के बारे में पूछा, तो पत्नी का सीधा जवाब था कि उसे कुछ नहीं मालूम कि बच्ची कहां चली गई है।
घर के भीतर से गायब हुई बच्ची को लेकर परिवार के बयानों और पुलिस के दावों में जो यह बड़ा अंतर था, उसने कानूनी साक्ष्यों की मजबूती पर गंभीर संदेह खड़े कर दिए थे। इसके बावजूद निचली अदालत में मामले की नियमित सुनवाई जारी रही।
ट्रायल कोर्ट का फैसला और हाईकोर्ट में अपील
इस आपराधिक मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में कई वर्षों तक चली। इसके बाद सितंबर 2023 में निचली अदालत ने उपलब्ध बयानों और पुलिसिया दस्तावेजों के आधार पर महिला को भारतीय कानून के तहत हत्या का दोषी ठहरा दिया और उसे उम्रकैद की सख्त सजा सुना दी। इस फैसले के बाद महिला को जेल भेज दिया गया।
ट्रायल कोर्ट के इस सख्त फैसले के खिलाफ महिला ने गौहाटी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट में महिला का पक्ष अधिवक्ता डी बरुआ ने रखा। उन्होंने अदालत में दलील दी कि निचली अदालत का फैसला केवल पुलिस की मौजूदगी में लिए गए ऐसे बयान पर टिका है, जिसकी कानून की नजर में कोई साक्ष्य कीमत नहीं है। इसके साथ ही केस में मेडिकल और मानसिक स्वास्थ्य के पहलुओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया था।
हाईकोर्ट की खंडपीठ का हस्तक्षेप और पुलिस कबूलनामे पर सख्त रुख
मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद 6 अक्टूबर को जस्टिस एम जोथांगखुमा और जस्टिस राजेश मजूमदार की खंडपीठ ने महिला की आपराधिक अपील को स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस के सामने दर्ज कथित कबूलनामे की कानूनी वैधता पर अत्यंत कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने रेखांकित किया कि जिस समय महिला का बयान दर्ज किया जा रहा था, उस दौरान मौके पर एक महिला हेड कांस्टेबल मौजूद थी और उसी हेड कांस्टेबल ने उस बयान के कागज पर हस्ताक्षर भी किए थे।
न्यायाधीशों ने टिप्पणी की कि जब एक पुलिसकर्मी खुद बयान दर्ज कराने के समय मौजूद हो और उस पर दस्तखत करे, तो किसी भी सूरत में यह नहीं माना जा सकता कि बयान देने वाली महिला पुलिस के अनुचित दबाव, भय या प्रभाव से मुक्त थी। भारतीय साक्ष्य कानून के सिद्धांतों के तहत पुलिस हिरासत या प्रभाव में दर्ज ऐसे इकबालिया बयान अदालत में स्वीकार्य सबूत नहीं होते। खंडपीठ ने दो टूक कहा कि जब सजा का सबसे मुख्य आधार ही कानूनी तौर पर शून्य और अमान्य हो, तो केवल उसी के सहारे किसी नागरिक को हत्या की आजीवन सजा में नहीं रखा जा सकता।
पोस्टपार्टम साइकोसिस का गंभीर पहलू और मेडिकल संभावना
इस फैसले के दौरान गौहाटी हाईकोर्ट ने मातृत्व के बाद होने वाली गंभीर मानसिक व्याधि पोस्टपार्टम साइकोसिस को लेकर बेहद अहम और संवेदनशील टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जब किसी मामले में यह तथ्य सामने आता है कि एक मां अपने नवजात शिशु के प्रति लगाव महसूस नहीं कर रही थी या उसे नापसंद करने की बात कह रही थी, तो न्याय के तकाजे से मानसिक स्वास्थ्य के गंभीर पहलुओं की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
अदालत ने समझाया कि पोस्टपार्टम साइकोसिस एक दुर्लभ लेकिन अत्यंत गंभीर मानसिक स्थिति है, जो प्रसव के तुरंत बाद किसी महिला में बेहद तेजी से उभर सकती है। यह सामान्य पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बिल्कुल भिन्न और कहीं अधिक खतरनाक होती है। इस अवस्था में महिला के भीतर गहरा भ्रम, गलत धारणाएं, मतिभ्रम, मूड में तीव्र उतार-चढ़ाव और सोचने-समझने की सामान्य क्षमता में गंभीर विकृति आ जाती है।
न्यायाधीशों ने यह भी रेखांकित किया कि इस मानसिक परेशानी के लक्षण कभी-कभी बहुत कम समय के लिए सामने आते हैं और फिर अपना रूप बदल लेते हैं। ऐसी विषम स्थिति में महिला अपने बच्चे की देखरेख करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाती है और कई बार अपने मतिभ्रम या अवास्तविक धारणाओं के वशीभूत होकर खतरनाक कदम भी उठा सकती है। रिसर्च के हवाले से अदालत ने बताया कि यद्यपि यह स्थिति दुर्लभ है और प्रति एक से दो हजार महिलाओं में से किसी एक में देखी जाती है, फिर भी इसकी गंभीरता मां और बच्चे दोनों की जान के लिए अत्यंत घातक साबित हो सकती है।
निर्णय का कानूनी दायरा और अंतिम रिहाई
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्टीकरण भी दिया कि वह इस महिला को चिकित्सकीय रूप से पोस्टपार्टम साइकोसिस से पीड़ित घोषित करने का कोई अंतिम मेडिकल निष्कर्ष नहीं दे रहा है। अदालत का मुख्य बिंदु यह था कि ट्रायल कोर्ट को इस तरह के संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान इस मानसिक संभावना की जांच अवश्य करनी चाहिए थी, जो कि नहीं की गई।
इसके अलावा अदालत ने यह भी व्यवस्था दी कि सजा सुनाए जाने की प्रक्रिया के दौरान यदि महिला के मुंह से कोई बात निकली भी थी, तो उसे हत्या के आरोप को सिद्ध करने वाला कोई स्वतंत्र और अतिरिक्त सबूत नहीं माना जा सकता। इन सभी कानूनी खामियों और साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए गौहाटी हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के सितंबर 2023 के दोषसिद्धि आदेश और उम्रकैद की सजा को पूरी तरह निरस्त कर दिया तथा महिला को बरी करने का फैसला सुनाया।



















