नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे गंभीर चुनौतियों में मस्तिष्क से संबंधित विकार शामिल हैं, जिनमें सेरेब्रल पाल्सी एक बड़ा खतरा बनकर सामने आता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो लगभग प्रति एक हजार नवजात बच्चों में से तीन बच्चे इस विकार के शिकार बनते हैं। जिस बच्चे को यह परेशानी होती है, उसका सीधा असर उसके पूरे जीवन पर पड़ता है और अधिकांश बच्चों को उम्र भर दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस बीमारी से जूझने वाले बच्चों को चलने, फिरने, सामान्य रूप से खेलने और बोलने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जबकि गंभीर मामलों में स्थिति और भी ज्यादा जटिल हो जाती है।
यह मस्तिष्क विकार आमतौर पर उस समय पनपता है जब शिशु मां के गर्भ में पल रहा होता है या फिर उसके जन्म के ठीक बाद विकसित होता है। गर्भावस्था के दौरान किसी तरह का गंभीर संक्रमण होना अथवा गर्भस्थ शिशु तक ऑक्सीजन की आवश्यक मात्रा न पहुंच पाना इसके प्रमुख कारणों में शामिल है। ऐसी दशा में दिमाग का वह विशिष्ट हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाता है जो शारीरिक गतिविधियों, संतुलन और मांसपेशियों के संकुचन को नियंत्रित करता है। जन्म के तत्काल बाद होने वाली व्यावहारिक चूकें भी इस जोखिम को कई गुना बढ़ा देती हैं।
प्रसव प्रबंधन और स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भूमिका
भारत में मातृत्व स्वास्थ्य के क्षेत्र में पहले के मुकाबले महत्वपूर्ण प्रगति हुई है और शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इसके बावजूद प्रसव प्रबंधन को लेकर अब भी व्यापक सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर देखा जाता है कि प्रसव केवल सामान्य एमबीबीएस डॉक्टरों या अप्रशिक्षित कर्मियों की निगरानी में संपन्न होता है, जबकि वहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की मौजूदगी अनिवार्य होनी चाहिए। विशेषज्ञ देखरेख की कमी से आपात स्थिति में जटिलताएं बढ़ जाती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, सेरेब्रल पाल्सी के लगभग 90 प्रतिशत मामलों को उचित सतर्कता बरतकर पूरी तरह रोका जा सकता है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि 90 प्रतिशत मामले गर्भावस्था तथा प्रसव के दौरान की जाने वाली चिकित्सकीय चूकों और अनदेखी के चलते पैदा होते हैं। इसमें गर्भवती महिला की कोई व्यक्तिगत गलती नहीं होती, बल्कि प्रसव कराने की प्रक्रिया और प्रबंधन में कमियां जिम्मेदार होती हैं। इन गलतियों के कारण शिशु के मस्तिष्क तक ऑक्सीजन का प्रवाह कम हो जाता है, जिससे तंत्रिका तंत्र को भारी क्षति पहुंचती है।
गर्भ में रहने के दौरान शिशु गर्भनाल के जरिए सांस लेता है और ऑक्सीजन प्राप्त करता है। जन्म लेते ही मां से यह प्राकृतिक संबंध विच्छेद हो जाता है और बच्चे को अपने फेफड़ों के सहारे पहली सांस लेनी होती है। इसी अत्यंत नाजुक मोड़ पर सबसे अधिक जटिलताएं पैदा होती हैं। यदि प्रसव किसी उच्च प्रशिक्षित एवं विशेषज्ञ डॉक्टर की देखरेख में हो, तो वे किसी भी आपात स्थिति को कुशलतापूर्वक संभाल लेते हैं। इसके विपरीत, सामान्य व्यवस्था में कराई जाने वाली डिलीवरी में ऑक्सीजन संकट और अन्य गड़बड़ियों की संभावना काफी बढ़ जाती है।
किन स्थितियों में बढ़ता है सेरेब्रल पाल्सी का खतरा
प्रसव और गर्भावस्था के दौरान कई ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं जो शिशु के मस्तिष्क तक ऑक्सीजन की पहुंच को बाधित करती हैं। इन जटिलताओं के चलते बच्चे का तंत्रिका तंत्र स्थायी रूप से प्रभावित हो सकता है
- मेकोनियम एस्पिरेशन: जन्म की प्रक्रिया के दौरान यदि नवजात शिशु अपने मुंह में मल ले लेता है, तो श्वास नली अवरुद्ध हो जाती है और फेफड़ों तक ऑक्सीजन का प्रवाह रुक जाता है।
- गर्भनाल का गले में फंसना: डिलीवरी के वक्त गर्भनाल का बच्चे की गर्दन में लिपट जाना या दब जाना रक्त संचार और ऑक्सीजन आपूर्ति को धीमा कर देता है, और प्रसव लंबा खिंचने पर यह मस्तिष्क को गहरा नुकसान पहुंचाता है।
- सिर में चोट लगना: प्रसव कराते समय बच्चे के सिर पर किसी भी प्रकार का आघात या दबाव पड़ने से मस्तिष्क तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो सकती है।
- अपरिपक्व प्रसव: गर्भावस्था के 37 सप्ताह पूरे होने से पहले ही शिशु का जन्म हो जाना, जिससे उसके नाजुक मस्तिष्क का विकास अधूरा रह जाता है।
- गर्भावस्था में संक्रमण: गर्भकाल के दौरान महिला को रूबेला, टॉर्च संक्रमण, खांसी, तेज बुखार, जुकाम, चिकनपॉक्स या टायफायड जैसी संक्रामक बीमारियों की चपेट में आने पर गर्भस्थ शिशु के दिमाग पर विपरीत असर पड़ सकता है।
- कम वजन: जन्म के समय शिशु का शारीरिक वजन 2.5 किलोग्राम से काफी कम होना भी इस तंत्रिका संबंधी विकार की आशंका को तेज करता है।
- गंभीर पीलिया: जन्म के तुरंत बाद नवजात को अत्यधिक पीलिया हो जाना और बिलीरुबिन के स्तर का मस्तिष्क के संवेदनशील ऊतकों तक पहुंच जाना अत्यंत हानिकारक सिद्ध होता है।
- मां की स्वास्थ्य समस्याएं: गर्भवती महिला में थायराइड का असंतुलन, दौरे पड़ना अथवा हाई ब्लड प्रेशर यानी प्री-क्लैम्पसिया की स्थिति मस्तिष्क विकार के जोखिम को बढ़ा देती है।
- दिमागी संक्रमण: जन्म के उपरांत शिशु का मेनिनजाइटिस अथवा एन्सेफलाइटिस जैसी गंभीर दिमागी सूजन और संक्रमण की चपेट में आ जाना।
- रक्त के थक्के और ब्लीडिंग: जन्म से ठीक पहले या जन्म के तत्काल बाद बच्चे के मस्तिष्क की सूक्ष्म नसों में थक्का जमना अथवा रक्तस्राव होना।
- मल्टीपल प्रेगनेंसी: गर्भ में एक से अधिक बच्चे होने की स्थिति में पोषण का असमान वितरण और गर्भ में पर्याप्त स्थान की कमी भी तंत्रिका विकास में बाधा डालती है।
नियमित जांच और कुशल प्रसव प्रबंधन से रोकथाम
गर्भावस्था के दौरान नियमित अल्ट्रासाउंड कराना बेहद आवश्यक माना जाता है क्योंकि इससे गर्भस्थ शिशु के विकास का सिलसिलेवार आकलन संभव होता रहता है। सोनोग्राफी जांच के माध्यम से डॉक्टर यह आसानी से परख लेते हैं कि भ्रूण का शारीरिक और मानसिक विकास तय मानकों के अनुरूप हो रहा है या कहीं कोई विकास संबंधी रुकावट तो नहीं आ रही है। इसके जरिए यह भी स्पष्ट हो जाता है कि गर्भ में शिशु की स्थिति सही है, गर्भनाल उसकी गर्दन में तो नहीं उलझी है, और उसे रक्त प्रवाह के जरिए पर्याप्त ऑक्सीजन मिल पा रही है अथवा नहीं।
इसके अलावा, मां को होने वाले किसी भी संक्रमण का शिशु पर पड़ने वाला प्रभाव भी नियमित जांच से समय रहते पकड़ा जा सकता है। एक कुशल स्त्री रोग विशेषज्ञ मामूली जटिलता दिखने पर भी तत्काल सही चिकित्सीय कदम उठा लेते हैं। इसलिए पूरे गर्भकाल में किसी योग्य विशेषज्ञ की सलाह लेना अनिवार्य है। प्रसव के समय प्रशिक्षित कर्मियों का होना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां नियोनेटल गायनेकोलॉजिस्ट की देखरेख में प्रशिक्षित नर्सें गर्भनाल को सही तकनीक से अलग करती हैं। जन्म के तुरंत बाद शिशु का रोना सबसे आवश्यक संकेत है क्योंकि रोने के साथ ही उसके फेफड़े खुलते हैं और वह स्वतंत्र सांस लेना शुरू करता है। आपातकालीन स्थिति में तुरंत सी-सेक्शन या विशेष देखभाल की आवश्यकता पड़ सकती है, जिसके लिए अस्पताल में आईसीयू, नियोनेटल केयर और पीडियाट्रिक विशेषज्ञ टीम की उपलब्धता जीवनरक्षक सिद्ध होती है।



















