सूरत शहर से सामने आई एक चौंकाने वाली घटना ने पिता और पुत्र के पवित्र रिश्ते को तार-तार कर दिया है। अपने 14 वर्षीय बेटे के लापता होने का ढोंग रचकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाने और न्याय के लिए गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाला व्यक्ति ही अपने बच्चे का हत्यारा निकला। घनश्याम बोरसे नाम के इस व्यक्ति ने कानूनी व्यवस्था को गुमराह करने और खुद को बेदाग साबित करने के लिए अदालत का सहारा लेने की पूरी योजना तैयार की थी।
गुमशुदगी की शिकायत से लेकर अदालत तक की साजिश
इस पूरे मामले की शुरुआत अगस्त 2025 में हुई थी, जब घनश्याम बोरसे ने सूरत के डिंडोली थाने में जाकर अपने 14 साल के बेटे की गुमशुदगी की आधिकारिक रिपोर्ट दर्ज कराई। खुद को एक बेबस पिता के तौर पर पेश करते हुए उसने यह दिखाने की कोशिश की कि वह अपने बच्चे की तलाश में हर मुमकिन कदम उठा रहा है। महीनों बीत जाने के बाद भी जब मामला सुलझा नहीं, तो उसने मार्च के महीने में गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया और वहां एक बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल कर दी।
अपनी इस याचिका में बोरसे ने स्थानीय पुलिस प्रशासन पर लापरवाही बरतने और हाथ पर हाथ धरे बैठने का आरोप लगाया। इतना ही नहीं, उसने शक की सुई अपनी तलाकशुदा पत्नी की तरफ मोड़ने की भी साजिश रची। उसने अदालत में दावा किया कि बच्चा महाराष्ट्र के जलगांव में रहने वाली उसकी पूर्व पत्नी के पास छिपाकर रखा गया हो सकता है। दोनों का अलगाव साल 2017 में ही हो चुका था, फिर भी उसने जांच अधिकारियों और अदालत को भटकाने के लिए यह झूठा शक जाहिर किया।
अदालत की सुनवाई में खुला हत्या का राज
गुजरात हाईकोर्ट में जब इस बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई शुरू हुई, तब जांच टीम ने अदालत के समक्ष ऐसी जानकारी रखी जिससे बेंच और वहां मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए। पुलिस ने कोर्ट को बताया कि याचिका दायर करने वाला पिता घनश्याम बोरसे खुद महाराष्ट्र पुलिस के पास गया था और उसने अपने ही 14 साल के बेटे की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया था।
जब यह तथ्य सामने आया कि जलगांव पुलिस ने बोरसे से पूछताछ की थी और उसने वहां अपने बेटे को मौत के घाट उतारने की बात कही थी, तब डिंडोली पुलिस भी पूरी तरह हरकत में आ गई और जांच को और कड़ा कर दिया गया। हालांकि, बाद में आरोपी ने गुजरात पुलिस के सामने अपने बयान से पलटते हुए दावा किया कि उसने वह कबूलनामा दबाव में दिया था और उसमें कोई सच्चाई नहीं थी।
याचिका वापस लेने का निर्देश और शव की तलाश
अदालत में इन परस्पर विरोधाभासी और गंभीर तथ्यों के सामने आने के बाद गुजरात हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया। अदालत ने आरोपी पिता को निर्देश दिया कि वह तुरंत अपनी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका वापस ले। कानूनी दांव-पेंच के जरिए खुद को बचाने की उसकी यह चाल पूरी तरह नाकाम हो गई।
हालांकि आरोपी ने पड़ोसी राज्य की पुलिस के सामने हत्या की बात स्वीकारी थी, लेकिन जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बच्चे के अवशेष ढूंढना बनी हुई है। पुलिस टीम अब तक मासूम का शव या घटना से जुड़ा कोई ठोस भौतिक सुराग बरामद नहीं कर सकी है। पुलिस बल अब अपराध स्थल और संबंधित इलाकों में बच्चे के शव की तलाश में सघन तलाशी अभियान चला रहा है ताकि पूरे मामले की कड़ियां जोड़ी जा सकें।



















