सनातन धर्म में पितृपक्ष का पखवाड़ा पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और उनके कल्याण की कामना का सबसे पवित्र अवसर माना गया है। आमतौर पर लोग पितरों के निमित्त पिंडदान और श्राद्ध कर्म के लिए बिहार में स्थित गया तीर्थ को सबसे प्रमुख केंद्र मानते हैं। बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि गयाजी के पावन क्षेत्र में प्रवेश करने और वहां अनुष्ठान आरंभ करने से पहले एक और पुण्य स्थल पर हाजिरी लगाना धार्मिक विधि का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। पटना जिले के समीप बहने वाली पुनपुन नदी के किनारे पहला तर्पण और पिंडदान संपन्न करना बेहद आवश्यक माना गया है, जिसे परंपरा में पितृमोक्ष का प्रथम द्वार कहा जाता है।
मोक्ष के प्रथम पड़ाव के रूप में पुनपुन तट का महत्व
धार्मिक आस्था के अनुसार गयाजी में श्राद्ध कर्म की पूर्णता तभी मानी जाती है जब उसकी शुरुआत पुनपुन नदी के पावन तट से हो। श्रद्धालु फल्गु नदी के किनारे जाने से पहले पुनपुन के घाट पर स्नान करते हैं, अपने कुल के दिवंगत जनों के नाम जल अर्पित करते हैं और पहला पिंड दान करते हैं। गरुड़ पुराण में पुनपुन नदी की महत्ता का उल्लेख करते हुए इसे आदिगंगा की उपाधि से नवाजा गया है। ऐसा विश्वास है कि इस तट पर श्रद्धापूर्वक किए गए कार्यों से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और उनका उद्धार संभव होता है। इसके साथ ही अनुष्ठानकर्ता के कुल की सात पीढ़ियों को पुण्य और कल्याण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
भगवान राम और माता सीता से जुड़ी पावन कथा
पुनपुन नदी के इस घाट का सीधा संबंध रामायण काल से भी जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यानों में वर्णन मिलता है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम अपने पूज्य पिता राजा दशरथ के परलोक गमन के उपरांत उनका श्राद्ध और पिंडदान संपन्न करने के लिए निकले थे, तब उन्होंने सीधे गयाजी का रुख नहीं किया था। भगवान राम ने माता जानकी के साथ मिलकर सबसे पहले इसी पुनपुन नदी के शांत किनारे पर बैठकर अपने पितरों का आह्वान किया और पहला पिंड अर्पित किया था। इसके पश्चात ही दोनों ने गयाजी पहुंचकर फल्गु नदी के पावन तट पर शेष धार्मिक कर्मकांडों को शास्त्रसम्मत तरीके से पूरा किया था। यही कारण है कि आज भी तीर्थयात्री प्रभु राम के इसी पथ का अनुसरण करते हुए पुनपुन को मोक्ष का आरंभिक द्वार मानकर नमन करते हैं।
पितृपक्ष के दौरान पितरों का सान्निध्य और आशीर्वाद
शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष के इन पंद्रह दिनों में पूर्वज सूक्ष्म रूप से धरती पर अपने वंशजों के निकट आते हैं और उनके द्वारा समर्पित तिल, जल और जौ के पिंड को स्नेहपूर्वक स्वीकार करते हैं। परिवार के सदस्य जब मन, वचन और कर्म की पवित्रता के साथ उनके निमित्त श्राद्ध अनुष्ठान करते हैं, तो इससे कुंडली के पितृ दोष का निवारण होता है। संतुष्ट होकर पूर्वज अपने वंशजों को सुख, समृद्धि, पारिवारिक शांति और वंश वृद्धि का वरदान देते हैं। इसी मान्यता के चलते हर साल लाखों श्रद्धालु अपनी यात्रा की शुरुआत पुनपुन तट से करते हैं और वहां से आगे बढ़कर गया में पिंडदान की क्रिया संपन्न करते हैं।
वर्ष 2026 में पितृपक्ष का कैलेंडर और प्रमुख श्राद्ध तिथियां
साल 2026 में पितृपक्ष का आरंभ 26 सितंबर दिन रविवार को भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से हो रहा है। पूर्णिमा के दिन देहावसान को प्राप्त हुए पूर्वजों का श्राद्ध इसी दिन किया जाएगा। इसके उपरांत नियमित पितृपक्ष का चक्र 27 सितंबर दिन रविवार को आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से गति पकड़ेगा। यह पखवाड़ा 10 अक्टूबर दिन शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ संपन्न होगा, जिस दिन ज्ञात और अज्ञात सभी पितरों के निमित्त विदाई तर्पण किया जाता है।
साल 2026 के लिए श्राद्ध की दैनिक तिथियां इस प्रकार निर्धारित हैं
- पूर्णिमा श्राद्ध: 26 सितंबर, शनिवार
- प्रतिपदा श्राद्ध: 27 सितंबर, रविवार
- द्वितीया श्राद्ध: 28 सितंबर, सोमवार
- तृतीया श्राद्ध एवं महाभरणी: 29 सितंबर, मंगलवार
- चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध: 30 सितंबर, बुधवार
- षष्ठी श्राद्ध: 1 अक्टूबर, गुरुवार
- सप्तमी श्राद्ध: 2 अक्टूबर, शुक्रवार
- अष्टमी श्राद्ध: 3 अक्टूबर, शनिवार
- नवमी श्राद्ध: 4 अक्टूबर, रविवार
- दशमी श्राद्ध: 5 अक्टूबर, सोमवार
- एकादशी श्राद्ध: 6 अक्टूबर, मंगलवार
- द्वादशी और मघा श्राद्ध: 7 अक्टूबर, बुधवार
- त्रयोदशी श्राद्ध: 8 अक्टूबर, गुरुवार
- चतुर्दशी श्राद्ध: 9 अक्टूबर, शुक्रवार
- सर्वपितृ अमावस्या: 10 अक्टूबर, शनिवार
इस प्रकार निर्धारित तिथियों के अनुरूप अपने दिवंगत पुरखों की तिथि पर नियमपूर्वक तर्पण करने से घर-परिवार में मांगलिक ऊर्जा का संचार होता है और बाधाओं का शमन होता है।


















