राजधानी दिल्ली में डिजिटल अरेस्ट के जरिए 1.64 करोड़ रुपये ऐंठने के एक सनसनीखेज साइबर अपराध की जांच करते हुए पुलिस ने एक ऐसे संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिसके काम करने का तरीका बेहद चौंकाने वाला है. इस गिरोह के सदस्य सीधे तौर पर तकनीकी हमलों के बजाय ग्रामीण भारत के भोले-भाले नागरिकों की मजबूरी और जरूरत को अपना हथियार बनाते थे. दूरदराज के देहाती इलाकों में कथित स्वास्थ्य शिविर आयोजित कर लोगों को कम दामों पर दवाएं देने का झांसा दिया जाता था और इसी बहाने उनके आधार कार्ड और बायोमेट्रिक ब्योरे जुटा लिए जाते थे. पहचान के इन आधिकारिक दस्तावेजों की मदद से हासिल किए गए मोबाइल नंबरों को डिजिटल ई-सिम में बदलकर साइबर अपराधियों के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय नेटवर्क को ऊंचे दामों पर बेच दिया जाता था. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस यानी आईएफएसओ इकाई ने इस सिंडिकेट की कड़ियां जोड़ते हुए उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले से दो मुख्य आरोपियों को अपनी हिरासत में ले लिया है.
चौदह दिनों तक डिजिटल अरेस्ट का खौफ और 1.64 करोड़ रुपये की उगाही
इस पूरे मामले का खुलासा उस समय हुआ जब श्रीनिवास नामक एक नागरिक को साइबर जालसाजों ने अपना निशाना बनाया. जालसाजों ने शिकायतकर्ता से व्हाट्सएप के माध्यम से संपर्क साधा और उन पर विभिन्न कानूनी मामलों में घिरने का गहरा दबाव बनाया. करीब दो सप्ताह तक उन्हें तथाकथित डिजिटल अरेस्ट की स्थिति में रखा गया, जिसके दौरान उन्हें लगातार गंभीर कानूनी नतीजों और गिरफ्तारी की धमकियां देकर मानसिक रूप से लाचार कर दिया गया. इस खौफनाक माहौल के बीच पीड़ित को इस कदर भयभीत कर दिया गया कि उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई बचाने की उम्मीद में अपराधियों की हर शर्त मान ली.
गंभीर दबाव में आकर पीड़ित व्यक्ति ने आरटीजीएस बैंकिंग सेवा का इस्तेमाल करते हुए छह अलग-अलग बैंक खातों में कुल 1 करोड़ 64 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि ट्रांसफर कर दी. जब पीड़ित को अपने साथ हुए धोखे का अहसास हुआ, तो उन्होंने कानून प्रवर्तन एजेंसियों से गुहार लगाई. इस संबंध में 1 सितंबर 2026 को दिल्ली पुलिस की आईएफएसओ इकाई में भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) और धारा 340 के तहत ई-एफआईआर दर्ज की गई, जिसके बाद तकनीकी जांचकर्ताओं ने धन के हस्तांतरण और इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों की गहन छानबीन शुरू की.
तकनीकी सुराग और मथुरा के गांव में आधी रात की छापेमारी
इस बड़े साइबर गिरोह को बेनकाब करने के लिए पुलिस अधिकारियों ने एक विशेष कार्यबल गठित किया. इस जांच दल में सब-इंस्पेक्टर अमित वर्मा, हेड कांस्टेबल गिरिराज तथा कांस्टेबल आशीष को शामिल किया गया था. जांच टीम ने ठगी के दौरान उपयोग में लाए गए मोबाइल नंबरों, संबंधित उपकरणों और इंटरनेट से जुड़े तकनीकी डेटा की बारीकी से पड़ताल की. इन तकनीकी कड़ियों को जोड़ने पर दिल्ली से शुरू हुआ जांच का रास्ता उत्तर प्रदेश के मथुरा और वृंदावन क्षेत्र की ओर मुड़ गया.
ठोस सुराग मिलने के बाद जांच दल ने 20 और 21 अक्टूबर 2026 की दरमियानी रात मथुरा जिले के अंतर्गत आने वाले फरह इलाके के कोटा गांव में दबिश दी. इस औचक छापेमारी के दौरान पुलिस ने दो व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए युवकों की पहचान 29 वर्षीय जितेंद्र सिंह और 21 वर्षीय ब्रजेश कुमार के तौर पर हुई है. ये दोनों आरोपी मथुरा जिले के फरह क्षेत्र स्थित फतीहा गांव के स्थायी निवासी हैं. गिरफ्तारी के तुरंत बाद विशेष टीम दोनों आरोपियों को आगे की पूछताछ और रिमांड के लिए दिल्ली ले आई.
सस्ती दवाओं की आड़ में बायोमेट्रिक और पहचान पत्र की हेराफेरी
आईएफएसओ की हिरासत में पूछताछ के दौरान दोनों आरोपियों ने अपने काम करने के तौर-तरीकों का विस्तार से खुलासा किया. उन्होंने स्वीकार किया कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में नकली हेल्थ कैंप लगाते थे. इन शिविरों में ग्रामीणों को बहुत कम कीमत पर जरूरी दवाइयां उपलब्ध कराने का लालच दिया जाता था. सस्ती दवाओं के मिलने की आस में जब ग्रामीण वहां पहुंचते थे, तो पंजीकरण के नाम पर उनसे उनके आधार कार्ड और फिंगरप्रिंट जैसे बायोमेट्रिक आंकड़े ले लिए जाते थे.
पुलिस का मानना है कि ग्रामीणों से धोखाधड़ी से लिए गए इन्हीं बायोमेट्रिक ब्योरों का उपयोग करके दूरसंचार कंपनियों से वैध फिजिकल सिम कार्ड जारी कराए जाते थे. पुलिस अब इस बात की पड़ताल में जुटी है कि आरोपियों ने ऐसे कितने कैंप लगाए थे, कितने मासूम ग्रामीणों के पहचान पत्र चुराए गए और अब तक कितने फर्जी सिम कार्ड जारी किए जा चुके हैं. इसके साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस फर्जीवाड़े में स्वास्थ्य सेवाओं या टेलीकॉम कंपनियों से जुड़ा कोई अन्य सहयोगी भी शामिल है या नहीं.
सिम से ई-सिम का रूपांतरण और सोशल मीडिया पर मुनाफाखोरी
आरोपियों की योजना केवल साधारण सिम कार्ड हासिल करने तक सीमित नहीं थी. वे सबसे पहले पहचान दस्तावेजों के जरिए असली फिजिकल सिम कार्ड लेते थे और उन्हें सक्रिय कराते थे. इसके बाद इन चालू नंबरों को ई-सिम प्रोफाइल में बदल दिया जाता था. ई-सिम बनते ही उससे जुड़ा क्यूआर कोड तैयार हो जाता था, जिसे किसी भी आधुनिक स्मार्टफोन में स्कैन करके तुरंत चालू किया जा सकता था. इसके बाद फेसबुक, इंस्टाग्राम और टेलीग्राम जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया माध्यमों के जरिए इन सक्रिय ई-सिम और उनके क्यूआर कोड्स को साइबर अपराधियों को ऑनलाइन बेच दिया जाता था.
जांच में यह आर्थिक पहलू भी सामने आया है कि एक सक्रिय सिम या ई-सिम को तैयार करने या प्राप्त करने में करीब 800 से 1,200 रुपये का खर्च आता था, जिसे यह गिरोह ऑनलाइन ग्राहकों को लगभग 2,000 रुपये प्रति सिम की दर पर बेचता था. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, पकड़े गए दोनों आरोपी पिछले करीब एक वर्ष से इस अवैध कारोबार को निरंतर चला रहे थे और उनका नेटवर्क देश भर में होने वाले डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन वित्तीय घोटालों को जरूरी डिजिटल ढांचा मुहैया करा रहा था.



















