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भारतीय सिनेमा में जब एक ही अभिनेता बने थे राम और सीता, सौ साल पहले इस मूक फिल्म की कमाई बोरियों में भरकर ले जाई गई थीमनोरंजन
30 अक्तू॰ 2026, 3:28 am (4 मिनट पहले)· 1

भारतीय सिनेमा में जब एक ही अभिनेता बने थे राम और सीता, सौ साल पहले इस मूक फिल्म की कमाई बोरियों में भरकर ले जाई गई थी

साल 1917 में रिलीज हुई दादासाहेब फाल्के की मूक फिल्म लंका दहन ने पर्दे पर रामायण की गाथा दिखाकर इतिहास रच दिया था, जिसमें अन्ना सालुंके ने राम और सीता दोनों का किरदार निभाया था।

वर्तमान दौर में जब पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं पर आधारित फिल्में सैकड़ों करोड़ रुपये के भारी भरकम बजट और आधुनिक विजुअल इफेक्ट्स के सहारे तैयार की जाती हैं, तब भारतीय सिनेमा के शुरुआती दिनों की कल्पना करना भी किसी अजूबे जैसा लगता है। साल 1917 का दौर भारतीय सिनेमाई इतिहास का वह स्वर्णिम काल था, जब फिल्में बोलना नहीं जानती थीं लेकिन अपनी मूक तस्वीरों से ही दर्शकों के दिलों में गहरा असर छोड़ती थीं। भारतीय सिनेमा के जनक माने जाने वाले दादासाहेब फाल्के ने सेल्युलाइड के पर्दे पर पहली बार हिंदू महाकाव्य रामायण की अमर गाथा को जीवंत किया था। उनकी इस ऐतिहासिक मूक फिल्म का नाम लंका दहन था, जिसने रिलीज होते ही पूरे देश में तहलका मचा दिया था।

राजा हरिश्चंद्र की सफलता के बाद फाल्के का नया प्रयोग

धुंधिराज गोविंद फाल्के, जिन्हें दुनिया आदर से दादासाहेब फाल्के के नाम से जानती है, उन्होंने साल 1913 में देश की पहली पूर्णकालिक फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनाकर भारतीय फिल्म उद्योग की मजबूत नींव रखी थी। इस ऐतिहासिक शुरुआत के बाद उन्होंने अपनी रचनात्मकता को और आगे बढ़ाने का फैसला किया। साल 1917 में उन्होंने रामायण के सबसे रोमांचक और लोकप्रिय प्रसंगों में से एक, यानी भगवान हनुमान द्वारा रावण की लंका को भस्म किए जाने की घटना को बड़े पर्दे पर उतारने का साहसिक संकल्प लिया। यह केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं था, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत और पौराणिक विश्वास के प्रति फाल्के की गहरी निष्ठा का प्रमाण भी था। इस कृति ने आगे चलकर भारतीय पौराणिक सिनेमा की पूरी दिशा ही हमेशा के लिए बदल दी।

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संवादों के बिना आंखों और भावों से कही गई महाकाव्य की कहानी

आज के दौर की फिल्मों की पहचान उनके भारी भरकम संवादों, बैकग्राउंड संगीत और कर्णप्रिय गीतों से होती है, मगर 1917 के दौर में सिनेमा पूरी तरह से मूक हुआ करता था। लंका दहन में अभिनेताओं की आवाज सुनाने की कोई गुंजाइश नहीं थी क्योंकि उस दौर में साउंड रिकॉर्डिंग की तकनीक मौजूद नहीं थी। दृश्य के बीच की कड़ी और प्रसंग को समझाने के लिए स्क्रीन पर अंग्रेजी, मराठी और हिंदी में लिखित पट्टियों यानी इंटरटाइटल का सहारा लिया जाता था। इसके बावजूद कलाकारों की भाव भंगिमा, शरीर की भाषा और आंखों के जीवंत अभिनय ने दर्शकों को इस कदर बांध लिया कि बिना किसी आवाज के भी रामायण की यह अमर गाथा हर दर्शक के अंतर्मन को छू गई।

एक ही पुरुष अभिनेता ने निभाया भगवान राम और माता सीता का किरदार

इस ऐतिहासिक फिल्म के निर्माण से जुड़ा सबसे चौंकाने वाला पहलू इसकी स्टारकास्ट थी। सौ साल से भी अधिक समय पहले समाज में महिलाओं का नाटकों या फिल्मों में अभिनय करना बेहद अपमानजनक और वर्जित माना जाता था। सामाजिक मान्यताओं और कड़े बंधनों के कारण कोई भी महिला कैमरे के सामने आने को तैयार नहीं थी। ऐसे विकट संकट में दादासाहेब फाल्के ने एक बेहद अनोखा और साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने पुरुष अभिनेता अन्ना सालुंके को न केवल भगवान श्री राम की मुख्य भूमिका सौंपी, बल्कि माता सीता के पावन किरदार के लिए भी उन्हीं का चयन किया। अन्ना सालुंके ने इन दोनों ही चरित्रों को इतनी शालीनता और सहजता से निभाया कि दर्शक चकित रह गए। इस तरह अन्ना सालुंके भारतीय सिनेमा के इतिहास के पहले ऐसे अभिनेता बने, जिन्होंने एक ही फिल्म में मुख्य नायक और मुख्य नायिका दोनों का डबल रोल सफलतापूर्वक निभाया था।

सीमित संसाधनों में रचे गए अविश्वसनीय विजुअल इफेक्ट्स

उस जमाने में जब फिल्म निर्माण के बुनियादी उपकरण भी भारत में बमुश्किल जुटाए जाते थे, दादासाहेब फाल्के ने अपनी अद्भुत तकनीकी कुशलता और बौद्धिक सूझबूझ से ऐसे विजुअल इफेक्ट्स तैयार किए जिनकी उस वक्त कल्पना करना भी नामुमकिन था। विशेष रूप से जब भगवान हनुमान आकाश मार्ग से उड़ते हैं और अपनी पूंछ से लंका नगरी में आग लगाते हैं, तो कैमरे की ट्रिक्स, स्टॉप मोशन और चतुर संपादन का इस्तेमाल किया गया था। आज के आधुनिक कंप्यूटर ग्राफिक्स के बिना भी फाल्के ने पर्दे पर जो अग्नि और विनाश का दृश्य पेश किया, उसने तत्कालीन दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया। फाल्के ने मूक सिनेमा के दौर में भी ड्रामा और एक्शन के बीच ऐसा सटीक तालमेल बैठाया जो उस युग में किसी तकनीकी चमत्कार जैसा था।

थिएटरों में टिकटों की बिक्री से बोरियां भर जाती थीं

लंका दहन की लोकप्रियता और सफलता का आलम यह था कि इसने तत्कालीन बॉक्स ऑफिस के सारे पुराने प्रतिमान ध्वस्त कर दिए थे। उस समय शहरों और कस्बों में सिनेमा हॉल बहुत कम हुआ करते थे, इसलिए इस मूक चमत्कार को देखने के लिए ग्रामीण इलाकों से लोग कई कई मील पैदल चलकर थिएटर पहुंचते थे। टिकट खिड़की पर दर्शकों का सैलाब इस कदर उमड़ता था कि टिकट बांटना और सिक्कों को संभालना मुश्किल हो जाता था। कई सिनेमाघरों में टिकट बिक्री से आने वाले तांबे और चांदी के सिक्कों को गिनने का वक्त नहीं बचता था, इसलिए थिएटर मालिक पैसों को बड़ी बड़ी बोरियों में भरकर ले जाते थे। इस भारी वित्तीय मुनाफे ने दादासाहेब फाल्के और उनकी निर्माण कंपनी को आर्थिक रूप से बेहद सशक्त बना दिया और यह साफ कर दिया कि भारत में पौराणिक आख्यानों के प्रति दर्शकों का जुड़ाव कितना अटूट है।

सिनेमा हॉल बना मंदिर, जूते उतारकर हाथ जोड़ते थे दर्शक

भारत में रामायण केवल एक महाकाव्य या साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि जन जन की आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। लंका दहन पहली बार इस पावन ग्रंथ के प्रसंग को साक्षात रूप में दर्शकों की नजरों के सामने लाई थी। जब सिनेमा के पर्दे पर पहली बार भगवान राम, लक्ष्मण और हनुमान के स्वरूप अवतरित हुए, तो दर्शकों ने इसे केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना। लोग पर्दे के सामने हाथ जोड़कर बैठ जाते थे और भाव विभोर होकर प्रणाम करते थे। अनेक शहरों में यह आलम था कि दर्शक थिएटर के अंदर प्रवेश करने से पहले अपने जूते चप्पल बाहर उतार देते थे, ठीक वैसे ही जैसे किसी पवित्र देवालय में प्रवेश करते वक्त किया जाता है। लंका दहन ने भारतीय सिनेमा को मात्र तमाशे की परिधि से बाहर निकालकर आस्था, परंपरा और संस्कृति के एक पवित्र माध्यम के रूप में स्थापित कर दिया।

सवाल-जवाब

फिल्म लंका दहन किस साल में रिलीज हुई थी?
यह ऐतिहासिक मूक फिल्म साल 1917 में दादासाहेब फाल्के के निर्देशन में रिलीज हुई थी।
लंका दहन में भगवान राम और माता सीता दोनों का किरदार किसने निभाया था?
उस दौर में महिलाओं के अभिनय पर पाबंदी के कारण अभिनेता अन्ना सालुंके ने राम और सीता दोनों की मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।
क्या लंका दहन एक बोलती फिल्म थी?
नहीं, यह एक मूक फिल्म थी जिसमें कोई संवाद नहीं थे और कहानी समझाने के लिए अंग्रेजी, मराठी और हिंदी इंटरटाइटल का इस्तेमाल किया गया था।
इस फिल्म की टिकट बिक्री को लेकर क्या अनोखा वाकया हुआ था?
फिल्म को देखने इतनी भारी भीड़ उमड़ी थी कि थिएटर मालिकों को टिकटों से मिले सिक्कों को बोरियों में भरकर ले जाना पड़ता था।
फिल्म देखने के दौरान दर्शकों का व्यवहार कैसा होता था?
दर्शक श्रद्धा से भर जाते थे, कई लोग हॉल में जूते उतारकर प्रवेश करते थे और पर्दे पर राम-हनुमान के दर्शन होते ही हाथ जोड़कर नमन करते थे।
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