उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर बरेली का औपनिवेशिक इतिहास काफी समृद्ध और गहरा रहा है। साल 1811 में बने छावनी क्षेत्र ने अंग्रेजी हुकूमत के दौर में एक प्रमुख सैन्य ठिकाने का रूप ले लिया था। दो शताब्दियों से भी अधिक पुरानी यह कैंटोनमेंट आज भी ब्रिटिश काल के स्थापत्य, सैन्य गतिविधियों और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की कई गाथाओं को खुद में समेटे हुए है।
लाल कुर्ती से बीआई बाजार बनने का किस्सा
अंग्रेजी शासन के दौरान बरेली छावनी को एक सुव्यवस्थित सैन्य केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। ब्रिटिश हुकूमत ने अपने अधिकारियों और सैनिकों के लिए विशाल बंगले, मेस, प्रशासनिक कार्यालय और मनोरंजन के लिए बरेली क्लब का निर्माण कराया। इसी दौर में प्रसिद्ध लाल कुर्ती बाजार अस्तित्व में आया, जिसे वर्तमान में बीआई बाजार के नाम से जाना जाता है। इस बाजार का नाम लाल कुर्ती पड़ने के पीछे एक खास वजह थी। उस समय परेड में शामिल होने वाले अंग्रेज सैनिक लाल रंग की वर्दी पहनते थे। इसी लाल वर्दी और सैन्य परेड की वजह से स्थानीय लोग इस पूरे इलाके को लाल कुर्ती बाजार कहने लगे।
औपनिवेशिक वास्तुकला और ऐतिहासिक गिरजाघर
बरेली के कैंट और सिविल लाइंस इलाकों में आज भी अंग्रेजों के जमाने की वास्तुकला साफ दिखाई देती है। वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. राजेश कुमार शर्मा के अनुसार, इस दौर में धार्मिक गतिविधियों और उपासना के लिए कई ऐतिहासिक चर्च बनवाए गए थे। इनमें बैपटिस्ट चर्च, मेथोडिस्ट चर्च, सेंट स्टीफन्स चर्च और फ्री विल बैप्टिस्ट चर्च शामिल हैं। ये इमारतें उस दौर की वास्तुकला की बेहतरीन मिसाल हैं। इसके अलावा बिआबानी कोठी और बरेली कॉलेज की मुख्य पुरानी इमारत भी उस जमाने के समृद्ध वास्तुशिल्प और प्रशासनिक ढांचे को उजागर करती हैं।
1857 की क्रांति और नकटिया का युद्ध
बरेली छावनी केवल एक सैन्य मुख्यालय ही नहीं थी, बल्कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की एक प्रमुख रणभूमि भी बनी। रोहिल्ला सरदार खान बहादुर खान ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का परचम लहराया था। उन्होंने अंग्रेजों को कड़ी टक्कर देते हुए बरेली को कुछ समय के लिए ब्रिटिश नियंत्रण से पूरी तरह आजाद करा लिया था। हालांकि, बाद में ब्रिटिश सेना ने दोबारा इस क्षेत्र पर कब्जा जमा लिया। खान बहादुर खान को गिरफ्तार कर लिया गया और पुरानी कोतवाली में उन्हें फांसी की सजा दी गई।
ऐतिहासिक कब्रिस्तान और औपनिवेशिक स्मृतियां
युद्ध और क्रांति के दौर की स्मृतियों को संजोए हुए बरेली का ऐतिहासिक ग्रेवयार्ड आज भी मौजूद है। 1857 के गदर और नकटिया के प्रसिद्ध युद्ध में मारे गए अंग्रेज अधिकारियों और सैनिकों को इसी कब्रिस्तान में दफनाया गया था। यहां स्थित पुरानी कब्रें औपनिवेशिक काल के उस खूनी संघर्ष और सैन्य इतिहास की गवाही देती हैं। आज भी बरेली कैंट की शांत गलियां, पुराने बंगले और गिरजाघर अतीत के उस दौर की याद दिलाते हैं।



















